दशहरे पर रावण दहन, पूजा-पाठ और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने की परंपरा तो आपने देखी होगी, लेकिन क्या आपको पता है कि इस दिन कुछ जगहों पर लोग एक-दूसरे को सोना समझकर आपटा के पत्ते दिए जाते हैं? दरअसल, यह परंपरा मुख्य रूप से महाराष्ट्र से जुड़ी है। यहां विजयादशमी के दिन लोग आपटा के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों को देते हैं। इसके पीछे धन, खुशहाली और आपसी प्रेम की कामना से जुड़ी एक रोचक लोककथा है। नीचे लेख में जानें इसके पीछे की कहानी।
आपटा के पत्तों को सोना मानने के पीछे क्या है कहानी?
आपटा के पत्तों को सोना मानकर बांटने के पीछे एक प्रचलित लोककथा है, जिसका संबंध कौत्स नाम के एक विद्वान, उनके गुरु और राजा रघु से बताया जाता है। कथा के अनुसार, कौत्स ने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद गुरु वरतंतु को गुरु दक्षिणा देने की इच्छा जताई। गुरु ने उनसे 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं मांगीं।
इतनी बड़ी रकम जुटाना कौत्स के लिए आसान नहीं था। वह सहायता मांगने के लिए राजा रघु के पास पहुंचे। राजा रघु अपनी उदारता के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उस समय वह अपना सारा धन दान कर चुके थे। कौत्स की सहायता करने के लिए राजा रघु ने धन के देवता कुबेर से मदद मांगी।
लोककथा के अनुसार, इसके बाद आपटा और शमी के पेड़ों से जुड़ी स्वर्ण मुद्राओं की घटना हुई। कौत्स ने अपने गुरु को दक्षिणा दी और बची हुई मुद्राएं लोगों में बांट दी गईं। इसी कथा को दशहरे पर पेड़ के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर बांटने की परंपरा से जोड़ा जाता है।
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पत्तों को सोना मानकर देने का क्या है मतलब?
दशहरे पर आपटा के पत्ते देना केवल एक रस्म निभाना नहीं है। इसके पीछे कुछ खास भावनाएं जुड़ी हैं। सोना धन और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पत्ते देकर लोग एक-दूसरे के सुखी और समृद्ध जीवन की कामना करते हैं। त्योहार पर रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों से मिलना और उन्हें पत्ते देना आपसी मेल-जोल बढ़ाता है। इस परंपरा में महंगे उपहार की जरूरत नहीं होती। एक छोटा-सा पत्ता भी शुभकामना और अपनापन जताने का माध्यम बन जाता है। पत्ते देते समय लोग मराठी में 'सोना घ्या, सोन्यासारखे रहा' जैसी शुभकामना भी कहते हैं। इसका भाव है कि सोना स्वीकार करें और सोने की तरह अच्छे बने रहें।
दशहरे पर शमी के पेड़ की पूजा क्यों की जाती है?
आपटा के पत्तों को सोना मानकर बांटने की परंपरा के साथ शमी के पेड़ का धार्मिक महत्व भी जुड़ा है। महाभारत की मान्यता के अनुसार, पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान अपने हथियार शमी के पेड़ में छिपाए थे। अज्ञातवास पूरा होने के बाद उन्होंने अपने हथियार वापस लिए और युद्ध में विजय हासिल की।
इस वजह से शमी को साहस, सुरक्षा और विजय का प्रतीक माना जाता है। दशहरे के दिन कुछ क्षेत्रों में शमी के पेड़ की पूजा की जाती है। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में पूजा की विधि और पत्तों से जुड़ी परंपराएं अलग हो सकती हैं।
क्या दूसरे राज्यों में भी निभाई जाती है यह परंपरा?
भारत में दशहरा अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में आपटा के पत्तों को सोना मानकर बांटना खास परंपरा है। वहीं, उत्तर भारत के कई हिस्सों में रावण दहन और रामलीला को विशेष महत्व दिया जाता है। कुछ क्षेत्रों में शमी पूजन, शस्त्र पूजन और सीमोल्लंघन जैसी परंपराएं भी निभाई जाती हैं।
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इन सभी रीति-रिवाजों में एक बात समान है विजय, सुख-समृद्धि और नए काम की अच्छी शुरुआत की कामना। इस तरह दशहरा केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व नहीं, बल्कि लोगों के बीच खुशियां और शुभकामनाएं बांटने का अवसर भी है।
डिस्कलेमर
ऊपर लेख में बताई गई कथा एक प्रचलित धार्मिक लोककथा है। इसके अलग-अलग रूप मिलते हैं। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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'सांस्कृतिक मंत्रालय, भारत सरकार' (Ministry of Culture, Govt. of India) के प्रकाशन और अभिलेख। 'निर्णय सिंधु' और 'धर्मसिंधु' ग्रंथ इसमें 'शमी पूजन' और 'अपता पत्र पूजन' के नाम से इसका उल्लेख है।
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