शारदीय नवरात्रि के मौके पर मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। जगह-जगह पर माता रानी के भव्य पंडाल लगाए जाते हैं और पूरे नौ दिनों तक भजन-कीर्तन और जागरण का आयोजन किया जाता हैं। यहां पर मां दुर्गा की भव्य मूर्ति भी स्थापित की जाती है। हम सब ने मां दुर्गा की मूर्ति या कोई प्रतिमा देखते हैं, तो उनके चरण के पास असुर होता है, जिसके वक्ष के आर-पार मां का त्रिशूल होता है। हम में से कुछ लोगों को इसके पीछे के पौरणिक कथा भी पता हो, लेकिन क्या आपको पता है कि मां दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी क्यों कहा जाता है? अगर नहीं, तो नीचे लेख में वाराणसी के पंडित राघवेंद्र तिवारी से जानें। 

महिषासुर को मिले वरदान के कारण बढ़ा अहंकार

पौराणिक कथाओं के अनुसार, रंभा नामक असुर के पुत्र महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। महिषासुर की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उसे अमर होने का वरदान मांगने को कहा। महिषासुर अमर तो नहीं होना चाहता था, इसलिए उसने यह वरदान मांगा कि "पृथ्वी पर कोई भी देवता, दानव या पुरुष उसका वध न कर सके। उसकी मृत्यु केवल किसी स्त्री के हाथों ही हो सकती है।"

महिषासुर को विश्वास था कि कोई भी स्त्री युद्ध में उसे हरा नहीं सकती। इस वरदान को पाकर वह अजेय हो गया और उसने तीनों लोकों स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल पर भयानक अत्याचार करना शुरू कर दिया। उसने देवराज इंद्र को सिंहासन से हटाकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया और देवताओं को प्रताड़ित करने लगा। हर तरफ भय, पीड़ा और अधर्म का साम्राज्य स्थापित हो गया।

मां दुर्गा का महिषासुर मर्दिनी रूप

देवता जब अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो गए, तब उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास जाकर अपनी परेशानी सुनाई। सभी देवताओं के भीतर से निकली क्रूरता-विरोधी सकारात्मक ऊर्जा और तेज से मां दुर्गा (आदिशक्ति) के रूप में अवतरित हुई। देवताओं ने मां दुर्गा को अपने शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्र भेंट किए। भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, विष्णु जी ने चक्र, वरुण देव ने शंख, और अन्य देवताओं ने तलवार, धनुष-बाण और गदा प्रदान की। इन तमाम दिव्य शक्तियों से सुसज्जित होकर मां दुर्गा ने सिंह पर सवार होकर रणक्षेत्र में प्रवेश किया और महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा।

नौ दिनों के युद्ध के बाद मिली विजय

मां दुर्गा और महिषासुर के बीच लगातार नौ दिनों और नौ रातों तक भीषण युद्ध चला। महिषासुर अपनी मायावी शक्तियों का इस्तेमाल करके बार-बार अपना रूप बदल रहा था। वह कभी वह भयानक भैंसे का रूप धारण करता, तो कभी सिंह या हाथी बनकर मां को भ्रमित करने का प्रयास करता।

दसवें दिन, जब महिषासुर ने एक बार फिर भैंसे का रूप बदलकर मां दुर्गा को डराने का प्रयास किया, तब मां ने अपने त्रिशूल से उसके सीने पर प्रहार कर उसका वध कर दिया। इस महासंहार के बाद से मां दुर्गा महिषासुर मर्दिनी के नाम से पूरे ब्रह्मांड में पूजा जाने लगा।

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