हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए तीज के व्रतों का बहुत बड़ा महत्व है। सावन और भाद्रपद के महीने में आने वाले इन व्रतों में अक्सर लोग हरियाली तीज और हरतालिका तीज को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों पर्वों में जमीन-आसमान का अंतर है। जहां हरियाली तीज का संबंध प्रकृति के श्रृंगार, हरियाली और भगवान शिव के साथ माता पार्वती के मिलन की खुशी से जुड़ा है। वहीं हरतालिका तीज का व्रत कठिन नियमों के साथ माता पार्वती द्वारा शिवजी को पाने के लिए किए गए कठोर तप को समर्पित है। दोनों की कथा और महत्व पूरी तरह से अलग हैं। नीचे लेख में पंडित राघवेंद्र तिवारी से जानें-

हरियाली तीज क्या और कब मनाया जाता है?

सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। इस दिन चारों तरफ फैली हरियाली सुहागिनों के जीवन में खुशियों का प्रतीक बनती है। इस मौके पर महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, हरे रंग के कपड़े पहनती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और मिलकर झूला झूलती हैं। यह दिन प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने और वैवाहिक जीवन में प्रेम व मिठास बढ़ाने का एक खूबसूरत अवसर माना जाता है।

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हरियाली तीज पर सिंधोरा की परंपरा खास

इस व्रत में माता पार्वती और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाती है। हालांकि, कुछ जगहों पर महिलाएं इस दिन निर्जला उपवास रखती हैं, लेकिन कई जगहों पर फलाहार का भी विधान है। यह पर्व पारिवारिक उल्लास, गीत-संगीत और सांस्कृतिक उल्लास से भरपूर होता है, जिसमें नवविवाहित महिलाओं को उनके मायके से सिंधारा की परंपरा निभाई जाती है। इसमें कपड़े, श्रृंगार का सामान और मिठाइयां होती हैं।

हरतालिका तीज क्यों और किस तिथि को मनाया जाता है?

हरतालिका तीज भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है, जिसे साल की सबसे कठिन तीज माना जाता है। यह पर्व इस वर्ष 14 सितंबर को पड़ रहा है। पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती की सखियों उनका अपहरण करके उन्हें जंगल में ले गई थीं ताकि वे अपने मन मुताबिक शिव जी को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या कर सकें। इस व्रत में महिलाएं माता पार्वती और शिव-पार्वती की बालू (रेत) की मूर्तियां बनाकर उनकी पूरी रात जागरण करते हुए पूजा करती हैं।

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हरतालिका तीज का अर्थ

हरतालिका तीज शब्द का शाब्दिक अर्थ और इसका पूरा महत्व इसकी पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। यह नाम दो शब्दों से मिलकर बना है 'हरत' और 'आलिका' है।

हरत- इसका अर्थ है हरण करना या अपहरण करके दूर ले जाना।

आलिका- इसका अर्थ है सखी या सहेली ।

हरतालिका तीज व्रत का पारण कब होता है?

हरतालिका तीज व्रत पूरी तरह से निर्जला रखा जाता है और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही इसका पारण किया जाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी और धार्मिक नियमों के लिहाज से भी यह व्रत बहुत ही कड़ा माना जाता है। इसमें जल की एक बूंद भी ग्रहण करने की मनाही होती है और सुहागिनें अपने पति की लंबी उम्र, अखंड सौभाग्य तथा सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए यह कठिन उपवास रखती हैं।

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हरतालिका तीज का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हरतालिका तीज के दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और दांपत्य सुख की कामना के लिए निर्जला व्रत रखती है। इसके साथ ही सोलह श्रृंगार करती हैं। मान्यता है कि इस दिन जो सुहागन महिलाएं विधि-विधान से भगवान शिव और माता गौरी की पूजा करती हैं।

रात्रि के समय जागरण करती हैं उन्हें भगवान शिव के समान पति की प्राप्ति होती है। साथ ही साथ जीवन हमेशा खुशहाल रहता है। सुहागिन जो महिलाएं सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करती हैं उन्हें भगवान शिव और माता पार्वती से सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद मिलता है।

अगर आपको भी अभी तक ये दोनों पर्व एक जैसे लगते थे, तो यकीनन यहां दी गई जानकारी से आपको अंतर पता चल गया होगा।अगर आपको यह लेख अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें। इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए जुड़ी रहें आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ।

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