सनातन धर्म में कार्तिक मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन न सिर्फ गंगा स्नान और दान-पुण्य का महत्व है, बल्कि कार्तिक पूर्णिमा वाले दिन वाराणसी में एक ऐसा उत्सव मनाया जाता है जिसकी चर्चा पूरे देश-भर में होती है। वाराणसी के घाटों की भव्य छटा को देखने के लिए दूर-दूर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। इस अद्भुत पर्व को देव दीपावली भी कहा जाता है।

कार्तिक पूर्णिमा की शाम को भगवान शिव की नगरी काशी के सभी 84 ऐतिहासिक घाटों पर लाखों मिट्टी के दीए जलाए जाते हैं और भव्य गंगा आरती की जाती है। आज इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली के बीच क्या धार्मिक संबंध है और ये दोनों पर्व इतने खास क्यों माने जाते हैं।

कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली का धार्मिक कनेक्शन

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को ही देव दीपावली का पर्व मनाया जाता है। इन दोनों पर्वों का आपस में गहरा धार्मिक और पौराणिक कनेक्शन है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिपुरासुर नाम के एक अत्याचारी राक्षस ने अपने तप के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था और ऋषि-मुनियों तथा देवताओं का जीना दुश्वार कर दिया था। इस अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए सभी देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की, और कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर का वध किया था।

त्रिपुरासुर के वध का जश्न

त्रिपुरासुर के आतंक से मुक्ति मिलने के बाद सभी देवी-देवता बेहद प्रसन्न हुए और उन्होंने भगवान शिव की नगरी काशी में आकर मां गंगा के घाटों पर दीए जलाकर जश्न मनाया था। देवताओं द्वारा मनाई गई इसी दीपावली को देव दीपावली यानी देवताओं की दीपावली कहा जाता है, जो हर साल कार्तिक पूर्णिमा की शाम को काशी में मनाई जाती है।

भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक पूर्णिमा की तिथि को ही भगवान विष्णु ने सृष्टि को जल प्रलय से बचाने के लिए अपना पहला मत्स्य अवतार धारण किया था। यही वजह है कि इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करने का विशेष विधान माना गया है।

काशी के घाटों पर क्यों जलाए जाते हैं लाखों दीए?

अगर आपके मन में यह सवाल है कि देव दिवाली वाले दिन काशी के घाटों पर ही दीए क्यों जलाए जाते हैं? तो इसके पीछे एक सुंदर मान्यता है। वाराणसी जिला प्रशासन के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा की शाम को स्वर्ग लोक से सभी देवी-देवता अदृश्य रूप में काशी के घाटों पर आते हैं और गंगा स्नान करते हैं। देवताओं के इसी पावन आगमन और स्वागत के लिए प्राचीन बनारस के घाटों पर लाखों की संख्या में दीए जलाए जाते हैं। काशी के अस्सी घाट से लेकर दशाश्वमेध घाट, मणिकर्णिका घाट और सभी 84 घाटों पर दीपदान की यह अलौकिक परंपरा निभाई जाती है।

निष्कर्ष:  कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली का यह पावन पर्व हमारी संस्कृति, गहरी आस्था और पौराणिक परंपराओं का एक बेहतरीन संगम है। त्रिपुरासुर का वध और देवताओं द्वारा काशी में जश्न मनाना ही कार्तिक पूर्णिमा और देव दीपावली के संबंध को आपस में जोड़ता है। यह पर्व हर साल हमारे दिलों में भक्ति और उल्लास की नई रोशनी लेकर आता है। यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहे हर जिंदगी से।

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