आज के समय में हमारे पारंपरिक लोकगीत बहुत कम जगहों पर सुनने को मिलते हैं। हालांकि, आज के समय में किसी भी खास मौके पर आधुनिक गाने ही बजाए जाते हैं, लेकिन कुछ शहर और राज्य ऐसे हैं जहां आज भी पुराने और पारंपरिक गीतों की धुनें सुनाई देती हैं, खासकर बिहार में। यहां शादी-ब्याह, मुंडन, कर्णछेदन और छठ पर्व जैसे अवसरों पर महिलाएं आज भी पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। आज के इस लेख में हम आपको अंगिका और मगही लोकगीत के बारे में बताने जा रहे हैं।
अंगिका और मगही लोकगीत क्या है?
अंगिका और मगही लोकगीत बिहार के उन पारंपरिक और क्षेत्रीय संगीत रूपों को कहा जाता है जो अंगिका और मगही बोलियों में गाए जाते हैं। ये गीत वहां के जनजीवन, संस्कृति, रीति-रिवाजों और लोक-आस्था का सुंदर उदाहरण हैं।
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अंगिका लोकगीत कहां गाए जाते हैं?
अंगिका लोकगीत मुख्य रूप से बिहार के 'अंग' क्षेत्र जैसे जमुई, बांका, भागलपुर, मुंगेर और खगड़िया में गाए जाते हैं। इसकी खास बात यह है अंगिका भाषा में एक खास मिठास और कोमलता है। यहां के लोकगीतों में प्रकृति प्रेम, मां गंगा की महत्ता, कृषि जीवन और दैनिक संघर्षों की झलक मिलती है। ये मुख्य रूप से विवाह के गीत (सोहर, विवाह गीत), वर्षा ऋतु के गीत (लगनी), और पर्व-त्योहारों से गीत जुड़े हैं।
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मगही लोकगीत कहां गाए जाते हैं?
मगही लोकगीत 'मगध' क्षेत्र जैसे गया, नालंदा, पटना, जहानाबाद और जमुई के कुछ हिस्सों में प्रचलित हैं। इसकी खासियत मगही भाषा अपने ओज, ठेठपन और मिठास के लिए जानी जाती है। इसके लोकगीतों में वीर रस के साथ-साथ पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट और सामाजिक उल्लास साफ झलकता है। इसमें प्रमुख कारमा गीत, फगुआ (होली के गीत), चैती, सोहर और देवी-देवताओं की स्तुति वाले गीत शामिल हैं।
छठ पर्व पर गए जाते हैं ये गीत
बिहार का लोक पर्व 'छठ' जमुई में भी उतनी ही श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है और इस दौरान यहां के लोकगीतों की गूंज हर तरफ सुनाई देती है।
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"कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जायं" जैसे पारंपरिक छठ गीत जब घाटों पर गूंजते हैं। ये गीत सूर्य भगवान और छठी मईया की महिमा का बखान करते हैं और व्रत की कठिन साधना को आसान बनाते हैं। इसके अलावा होली, तीज और जिउतिया जैसे अन्य पर्वों पर भी यहां पारंपरिक गीत गाने की गहरी परंपरा है।
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निष्कर्ष
ये गीत पीढ़ियों जैसे दादी-नानी से माताओं और फिर बेटियों को हस्तांतरित होते आए हैं। इन्हें आम तौर पर किसी लिखित लिपि की जरूरत नहीं पड़ी। इन्हें ज्यादातर महिलाएं ढोलक, मंजीरा या थाली की थाप पर सामूहिक रूप से गाती हैं। जन्म से लेकर खेती-किसानी तक और त्योहारों के साथ-साथ हर खास मौके के लिए अंगिका और मगही में अलग लोकगीत मौजूद हैं।
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