प्रभा से बात करते हुए सपना पूरी तरह से टूट चुकी थी। उसने कहा कि पति के साथ मेरी हमेशा दो-चार कड़वी बातें होतीं और फिर दोनों के बीच कई दिनों तक बातचीत बंद हो जाती। रिश्ता जैसे बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया था। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। सुख-सुविधाएं भी थीं, लेकिन फिर भी मन को चैन नहीं मिलता था। आखिर ऐसा क्या रह जाता है, जो मन की शांति छीन लेता है? मन का दर्द और बेचैनी मुझे साहित्य की ओर ले गई। मेरे मन की तकलीफ को मैंने कविता और कहानियों के रूप में लिखना शुरू कर दिया, लेकिन उनके लिए मेरा लिखना सिर्फ बेकार की बात थी। डाक से जब भी पाठकों के प्रशंसा-पत्र आते, तो वे उन्हें इस तरह फेंक देते कि सारे पत्र कमरे में बिखर जाते। मुझे अपमानित करने का यह उनका नया तरीका था। मैं सोचती, आखिर मेरा अपमान क्यों किया जाता है? मैं अपने ही जीवन के खालीपन की पीड़ा झेल रही थी।
इस खालीपन को भरने की बस एक ही उम्मीद थी, मेरा बेटा सिद्धांत। वह बड़ा हो रहा था। मुझे लगता था कि वह मां के प्रति अपने पिता का व्यवहार समझ रहा होगा। मुझे विश्वास था कि वह मेरा साथ देगा और मेरे अकेलेपन को दूर करेगा। सिद्धांत की पढ़ाई पूरी होने के बाद हमने उसकी शादी बड़े धूमधाम से करवाई। मुझे लगा कि अब मेरे घर-आंगन का माहौल बदल जाएगा। कुछ समय तक ऐसा लगा भी, क्योंकि सब बदलने लगा था। बहू के आने से घर फिर से खुशियों से भर गया था, लेकिन एक दिन अचानक सिद्धांत बहुत बिजी रहने लगा। मैंने उसे अक्सर समर के साथ किसी न किसी बात पर चर्चा करते देखा था, तब मुझे नहीं पता था कि क्या हो रहा है। सारी तैयारियां पूरी होने के बाद मुझे पता चला कि बेटा विदेश जा रहा है और इस बारे में मुझसे किसी ने पूछा तक नहीं। मैं सन्न रह गई। तुम सोचो इस घर में मेरी क्या जगह थी? मेरी ममता का अपमान हुआ था। मेरे दिल को बहुत ठेस पहुंची थी।
पति से मिली उपेक्षा के बाद अब उस उम्मीद ने भी मेरा साथ छोड़ दिया था, जिसके भरोसे मैंने इतने कठिन दिन काटे थे। मुझे लगा था पति न सही, लेकिन बेटा तो साथ निभाएगा। अब मुझे घर की सारी सुख-सुविधाएं भी मुझे बिच्छू के डंक जैसी लगती थीं। मैं बस खुद को ढो रही थी। सिद्धांत को गए अभी एक साल भी नहीं हुआ था, लेकिन मुझे ऐसा लग रहा था जैसे एक पूरा जमाना बीत गया हो। जब वह जा रहा था, तो मेरे आंसू नहीं रुक रहे थे, मुझे रोता देखकर बेटे ने कहा था, "रो क्यों रही हो मां?"
मैंने कहा था, "बेटा, मैं तो बिल्कुल अकेली हो जाऊंगी। हमें छोड़कर क्यों जा रहे हो?" बेटे को लेकर जो सपने मैंने देखे थे, वे कांच की तरह टूट गए थे। उनकी चुभन मैं हर पल महसूस कर रही थी। मैं जिंदगी नहीं, मजबूरी जी रही थी। बेटे के जाने के बाद पूरी रात मैं पुरानी यादों में खोई रही। प्रभा से अभी फोन पर बात हो ही थी, कि घर के बाहर से गाड़ी की आवाज आई। सुबह होने में अभी कुछ ही घंटे बाकी थे कि समर की गाड़ी आकर रुकी। प्रभा को फोन काटने के बाद मैंने दरवाजा खोला, तो देखा कि समर लड़खड़ाते हुए अंदर आए और मुझे हल्का-सा धक्का देते हुए बिस्तर पर जाकर गिर पड़े। उनके कपड़ों से किसी महिला के परफ्यूम की तेज खुशबू आ रही थी।
अगले दिन मैंने फैसला किया कि मैं प्रभा से मिलने आश्रम जाऊंगी। आश्रम पहुंचकर उसकी भव्यता देखकर मैं हैरान रह गई। वहां एक बड़ी इमारत थी और श्रद्धालुओं के रहने की भी स्थायी व्यवस्था थी। मुझे प्रभा का कमरा बताया गया। जैसे ही मैं वहां पहुंची, प्रभा आगे बढ़ी और मुझे गले लगा लिया। मैंने पूछा, "कैसी हो प्रभा? तुम इस आश्रम में कैसे और क्यों आई? जब से तुम्हारा फोन आया है, तब से मैं सब कुछ जानने के लिए बहुत बेचैन हूं।"
प्रभा ने मुस्कुराते हुए कहा, "घर-परिवार की जिम्मेदारियों में हम दोनों इतने उलझ गए कि एक-दूसरे का हाल-चाल भी नहीं पूछ पाए। पत्रिकाओं में तुम्हारा नाम देखा, तो तुमसे मिलने की इच्छा और बढ़ गई। तुम तो बहुत अच्छी लेखिका बन गई हो।" मैंने कहा, "बस, लिखना मेरे लिए समय बिताने का एक सहारा है। तुम बताओ, इस आश्रम में कब से हो और यहां क्यों आई?"
सपना अपने जीवन की तकलीफों से जूझ रही थी, लेकिन आश्रम में प्रभा से मुलाकात के बाद क्या वह भी अपना घर छोड़ देगी। उसे वहां सभी को देखकर एहसास हुआ कि सिर्फ वही नहीं, बल्कि कई महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपनों से गहरे घाव खाए हैं। क्या सपना भी घर छोड़ देगी, जानने के लिए इंतजार करें अगले पार्ट का
यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।
लेखक- सुशीला द्विवेदी
सभी पेंटिंग्स : आशीष कच्छवाह
Main image credit- Gemini
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