स्कूल से लौटने के बाद कई बार बच्चे चुपचाप अपना रिपोर्ट कार्ड या आंसर शीट बैग में छिपा देते हैं और इस बारे में किसी से बात नहीं करते। कई बार माता-पिता के परीक्षा के बारे में पूछने पर वे बात को टाल देते हैं या खुद नंबर दिखाने के बजाय घर में किसी के खुद पूछने का इंतजार करते हैं। आमतौर पर हमें लगता है कि बच्चा कम नंबर आने पर नाखुश है या अपनी गलती छुपा रहा है, लेकिन मनोविज्ञान का मानना है कि इसके पीछे सिर्फ खराब स्कोर न स्वीकार करने की जिद्द नहीं होती, बल्कि इसके पीछे बच्चों का वह डर होता है जो वे रिजल्ट सामने आने के बाद मां-बाप के रिएक्शन के रूप में देखते हैं। ऐसे में ये जानना तो बनता है कि बच्चों के बर्ताव के पीछे क्या कारण जिम्मेदार हैं? इसके लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं इनके बारे में...

बच्चों के बर्ताव के कौन जिम्मेदार है?

क्या आपका बच्चा स्कूल की हर बात आपसे खुलकर शेयर करता है? एक्सपर्ट के अनुसार, बच्चे अपने माता-पिता के साथ संबंधों को जैसा महसूस करते हैं, उसी के आधार पर वे स्कूल में मिलने वाली असफलताओं से निपटना सीखते हैं। अगर किसी बच्चे को 48 नंबर मिले हैं, तो उसे खुद इस बात का एहसास है कि उसका रिजल्ट खराब है। ऐसे में तनाव तब और बढ़ जाता है जब रिजल्ट मिलते ही उस पर तीखे सवालों की बौछार कर दी जाती है। “इतने कम नंबर क्यों आए?” या “तुम्हारे दोस्त के कितने आए हैं?” जैसे सवाल बच्चे को डरा देते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए कई बच्चे अपने पेपर को छिपाना ही बेहतर समझते हैं।

जब नंबर बच्चे की पहचान बन जाते हैं

मार्क्स का असल मकसद यह बताना होता है कि छात्र ने पढ़ाई के किसी हिस्से को कितना समझा है, लेकिन लगातार परसेंटेज, रैंक और दूसरों से तुलना करने की आदत बच्चों के मन में यह बैठा देती है कि उनके नंबर ही उनकी असलियत तय करते हैं। ऐसे में जब बच्चों को यह लगने लगता है कि उनके माता-पिता का प्यार और सम्मान केवल अच्छे नंबर लाने पर ही टिका है, तो उनके अंदर परीक्षा का डर कई गुना बढ़ जाता है। बच्चा सिर्फ यह नहीं सोचता कि उसे 55 नंबर मिले हैं, बल्कि वह यह सोचने लगता है कि अब माता-पिता उसके बारे में क्या सोचेंगे।

हमेशा सजा देना जरूरी नहीं

बच्चों पर अकादमिक दबाव बनाने के लिए हमेशा चिल्लाना या सजा देना जरूरी नहीं है। कई बार अच्छे नंबर लाने के लिए बोलना, दूसरे बच्चों से तुलना करना या भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा उम्मीदें बांधना भी मानसिक दबाव का रूप ले लेता है। 

जब बच्चे को डांट या गुस्से का अंदेशा हो

कम स्कोर बड़ी समस्या बन जाता है। यदि बच्चे को यह डर है कि कम नंबर आने पर उसे डांट या ताने सुनने पड़ेंगे, तो वह अपनी गलती सुधारने के बजाय उस पर पर्दा डालने की कोशिश करने लगता है। इसलिए परीक्षा का पेपर छिपाने वाले बच्चे को पढ़ाई की परवाह होती तो है, लेकिन वह यह जता रहा होता है कि वह मां-बाप के गुस्से का सामना करने से घबरा रहा है।

पेरेंट्स को क्या करना चाहिए?

जब बच्चा खुद अपनी असफलता सामने रखे, तो सबसे पहले उस पर भड़कने के बजाय कुछ अलग तरीके से बात की जानी चाहिए। जैसे- “कौन सा हिस्सा कठिन लगा?” या “क्या तुम्हें चैप्टर समझ नहीं आया था?” इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि खराब प्रदर्शन को नजरअंदाज कर दिया जाए। पढ़ाई का अनुशासन और गंभीरता अपनी जगह जरूरी है, लेकिन मुख्य बात यह है कि बच्चे को यह यकीन हो जाए कि खराब नंबर आने से उसके माता-पिता का उसके प्रति प्यार या नजरिया नहीं बदलेगा।

निष्कर्ष

कम नंबर स्कूल के सफर का सिर्फ एक हिस्सा हैं। जब बच्चों को यह सुरक्षित माहौल मिलता है कि वे बिना किसी डर या तुलना के अपनी गलतियों के बारे में खुलकर बात कर सकें, तो वे न केवल अपनी कमियों को स्वीकार करना सीखते हैं बल्कि उनमें सुधार करने के लिए दोगुनी मेहनत भी करते हैं।

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Main Images: magnific