आजकल हर पेरेंट्स की सबसे बड़ी टेंशन है बच्चे का मोबाइल ज्यादा देखना। सभी जानते हैं कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के लिए अच्छा नहीं है, लेकिन जब घर में रिश्तेदारों का दखल बढ़ जाता है, तो अच्छी परवरिश करना काफी मुश्किल हो जाता है। कभी दूर रहने वाले रिश्तेदार वीडियो कॉल पर बात करते हैं तो आप स्क्रीन रोक नहीं सकते, तो कभी घर आए दादा-दादी के सामने बच्चा जिद करने लगता है और शांत कराने के लिए फोन देना पड़ जाता है। ऐसे में पेरेंट्स कंफ्यूज हो जाते हैं कि बच्चे की सुनें या रिश्तेदारों की? एम्स दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट और BSF में एमिनेंट फैकल्टी डॉक्टर विधि पिलनिया ने इस पर अपनी राय दी है और रिश्तेदारों के लिए कुछ बातें बताई है। आइए यहां जानते हैं।
पेरेंट्स के लिए क्या है सबसे बड़ी मुसीबत?
अक्सर ऐसा होता है कि अधिकतर लोगों ने अपने बच्चे के लिए एक फिक्स स्क्रीन टाइम रखा होता है, जैसे दिन में सिर्फ 30 मिनट या 1 घंटा, लेकिन जब कोई रिश्तेदार घर आता है और कहता है 'अरे दे दो फोन, बच्चा रो रहा है', तो उनकी वजह से सारा रूटीन बिगड़ जाता है और पेरेंट्स के लिए मुसीबत हो जाती है। इससे पेरेंटिंग में इनकंसिस्टेंसी आती है और बच्चा भी कंफ्यूज हो जाता है कि फोन देखना सही है या गलत, क्योंकि कभी आप मना करती हैं, तो कभी रिश्तेदारों के कहने पर फोन दे देती हैं।
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अनचाही सलाह ज्यादा खतरनाक
एक्सपर्ट के मुताबिक, बच्चों का स्क्रीन टाइम तो कंट्रोल किया जा सकता है, लेकिन रिश्तेदारों की अनचाही सलाह पेरेंट्स के मेंटल हेल्थ पर ज्यादा बुरा असर डालती है। इससे मां-बाप में गिल्ट, गुस्सा और एंग्जायटी बढ़ती है, जो सीधे बच्चे पर असर करती है। स्क्रीन से आंखें खराब होती हैं, लेकिन रोज-रोज की नसीहत से पेरेंट्स का कॉन्फिडेंस खराब होता है।
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पेरेंट्स इन बातों का रखें ध्यान
पेरेंट्स को बच्चों के लिए इन बातों का ध्यान रखना काफी जरूरी है। देखें लिस्ट।
- अपने तय किए हुए स्क्रीन टाइम रूल पर टिके रहें, किसी के कहने पर उसे न तोड़ें।
- रिश्तेदारों को प्यार से, लेकिन साफ शब्दों में अपनी बाउंड्री बता दें।
- बच्चे के टैंट्रम्स को फोन से नहीं, बल्कि गेम्स या स्टोरी से शांत करने की आदत डालें।
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बच्चों का स्क्रीन टाइम और रिश्तेदारों की अनचाही सलाह दोनों ही पेरेंट्स के लिए स्ट्रेस की वजह हैं, लेकिन स्क्रीन टाइम को तो आप लगाकर कंट्रोल कर सकती हैं।
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