जिंदगी के सफर में हम सभी को हमसफर की तलाश जरूर होती है और जब कोई सच्चा हमसफर मिल जाता है, तो जिंदगी के मायने की बदल जाते हैं। दो लोग साथ मिलकर एक नए सफर की शुरुआत करते हैं, एक-दूसरे के लाइफ पार्टनर बनते हैं और उस रिश्ते को दिल से निभाने के हजारों वादें करते हैं। बेशक ये सब बहुत खूबसूरत होता है और अगर रिश्ते निभाने की कोशिश दोनों तरफ से की जाए, तो शायद कोई भी रिश्ता कभी टूट नहीं सकता, बशर्ते कोशिश दोनों तरफ से बराबरी की है। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि बराबरी के इस रिश्ते में महिलाओं से उम्मीदें ज्यादा रखी जाती हैं। रिश्ते को निभाना हो या टूटने से बचाना, महिलाओं से ही सारी अपेक्षाएं रखी जाती हैं, लेकिन आखिर ऐसा क्यों?

माफ करने की उम्मीद

आमतौर पर महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि अगर उनका पति, उनका लाइफ पार्टनर कोई गलती करता है, तो वो बस उसे माफ कर दें। माफ करना गलत नहीं है, लेकिन यह बात दोनों पर लागू होनी चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। पति चाहे छोटी सी बात का बड़ा मुद्दा क्यों न बना ले, उस पर कोई सवाल नहीं उठता, लेकिन महिलाएं अगर किसी गलती पर झुकने या माफ करने से इंकार कर दें, तो उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

घर और बाहर की जिम्मेदारियों को निभाने की उम्मीद


"अरे वाह...कितना अच्छा पति मिला है...तुम्हारे लिए चाय बना रहा है।" आपने कई बार इस तरह की बातें सुनी होंगी। असल में पुरुषों को रसोई में देखना समाज के कई लोगों को अब भी बहुत गलत लगता है और ऐसे में अगर कोई पति अपनी पत्नी का घर के कामों में हाथ बंटा रहा है, तो उसकी तारीफों के पुल बांध दिए जाते हैं। यहां भी उम्मीदें महिलाओं से ही हैं। पत्नी घर भी संभाले, बाहर जाकर नौकरी भी करे और बच्चों पर भी पूरा ध्यान दे और अगर उससे कोई गलती हो जाए, तो उसे लापरवाह पत्नी का टैग देने में देर नहीं की जाती है।

खुद टूटकर भी रिश्ता बचाने की उम्मीद

"क्या हो गया...इतनी सी बात पर कोई रिश्ता तोड़ता है क्या...तुम्हें किसी भी हालत में अपनी शादी बचानी चाहिए।" ये बातें कई बार महिलाओं को तब सुनने को मिलती हैं, जब वो रिश्ते में हो रहे गलत के खिलाफ आवाज उठाती हैं। यहां पुरुषों से ये उम्मीद नहीं की जाती है कि वो अपनी पत्नी के हिसाब से खुद को ढालने की कोशिश करें, बल्कि महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वो किसी भी हालत में रिश्ते को बचाएं।

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उम्मीदों का पलड़ा अक्सर महिलाओं की तरफ ज्यादा भारी क्यों होता है?


असल में यह सोच नई नहीं है। यह सालों से हमारे अंदर पनप रही पितृसत्तात्मक सोचक का परिणाम है। रिश्ता बराबरी का है, पति-पत्नी गाड़ी के दो पहिए हैं, ये बातें हम कह जरूर देते हैं, लेकिन महिलाओं से जुड़ी पारंपरिक अपेक्षाएं अभी भी कम नहीं हुई हैं। वक्त बदलने के साथ उनके ऊपर नई जिम्मेदारियां डाली जाती रहीं, लेकिन पुरानी जिम्मेदारियां कम नहीं हुईं। इसका एक कारण ये भी है कि एक वक्त तक पत्नी को आर्थिक और सामजिक तौर पर पति पर निर्भर माना जाता था और यही वजह थी कि उनसे रिश्ते को निभाने और बचाने की सारी उम्मीदें रखी जाती हैं। 

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