आजकल अधिकतर पेरेंट्स और स्टूडेंट्स की यही शिकायत रहती है कि बच्चों पर पढ़ाई और एक्टिविटीज में नंबर वन बने रहने का बहुत ज्यादा प्रेशर है, इसी वजह से वे तनावग्रस्त रहते हैं। एक यूट्यूब चैनल द्वारा आयोजित टॉक शो में क्रिकेटर कपिलदेव ने स्कूली बच्चों के लिए कहा था कि अगर वे अपने कार्यों के प्रति रुचि पैदा करें, तो प्रेशर को बहुत आसानी से प्लेजर में बदला जा सकता है। चाहे पढ़ाई हो या खेलकूद जैसी कोई दूसरी एक्टिविटी, अगर वे उसे बोझ समझकर पूरा करने की कोशिश करेंगे, तो इससे उन्हें तनाव होगा। अगर वे उन कार्यों को अपना पैशन बना लेंगे, तो उन्हें जरा भी थकान महसूस नहीं होगी, और न ही उनके मन में इस बात का तनाव होगा कि कहीं हार गए या परीक्षा में कम मार्क्स आए तो लोग क्या कहेंगे। इसके लिए हमने चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट पूनम कामदार से बात की है।
मौका दें खुद को सीखने का
दरअसल, यह नजरिया से जुड़ा मामला है। जब माता-पिता बच्चे के रिजल्ट को लेकर खुद चिंतित रहते हैं, तो वे अनजाने में उनके सामने ही कई ऐसे बातें दोहराते हैं, जो उनके कोमल मन में गहराई से बैठ जाते हैं। फिर आज के माता-पिता उस पीढ़ी से आते हैं, जब परिवारों में सिंपल जीवनशैली और कड़े अनुशासन का माहौल होता था। कई बार तो मनपसंद खिलौनों या कपड़ों के लिए उन्हें महीनों तक इंतजार करना पड़ता था।
चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट पूनम कामदार कहती हैं कि आजकल माता-पिता शुरू से ही अपने बच्चों को कंफर्ट जोन में रखते हैं। उन्हें अपने प्रयासों से कुछ भी सीखने का मौका नहीं देते। "कहीं मेरे बच्चे को चोट न लग जाए, कहीं उसके दोस्त उसे परेशान न करें, बारिश या धूप से उसकी तबीयत खराब हो जाएगी"... ऐसी बातें सोचकर कुछ लोग अपने बच्चों को खेलने के लिए पार्क में या घर से बाहर नहीं भेजते, जिससे उनका सामाजिक विकास सही ढंग से नहीं हो पाता।
दूसरों से बातचीत करने का तरीका, अपनी बारी का इंतजार करना और दोस्तों के साथ होने वाले झगड़े को आपसी सहमति से सुलझाना आदि कई ऐसे जरूरी सोशल स्किल्स हैं, जिन्हें आज के बच्चे सीख नहीं पाते। फिर बाद में उच्च शिक्षा के लिए जब वे घर से दूर जाते हैं, तो उन्हें वहां के नए माहौल के साथ एडजस्ट करने में बहुत परेशानी होती है। वे रोजमर्रा की दिनचर्या से जुड़े जरूरी कामकाज जैसे अपने कमरे की सफाई और कपड़ों को व्यवस्थित रखना भी सीख नहीं पाते।
शेयरिंग भी है जरूरी
आमतौर पर जिन परिवारों में इकलौते बच्चे होते हैं, वहां उन्हें बिना मांगे ही सब कुछ बहुत आसानी से मिल जाता है। अधिक लाड़-प्यार के कारण बच्चे की आदतें बिगड़ जाती हैं और वे जिद्दी हो जाते हैं। दिल्ली की बैंकर संजना शर्मा कहती हैं कि सिंगल चाइल्ड को शेयरिंग सिखाना बहुत जरूरी होता है, अन्यथा वे स्वार्थी और आत्मकेंद्रित बन जाते हैं। मैं अपनी आठ वर्षीय बेटी को शुरू से ही अपने उन दोस्तों के घर पर लेकर जाती हूं, जहां उसकी उम्र के बच्चे होते हैं। मैं पड़ोस के बच्चों को अक्सर अपने घर पर बुलाती हूं, ताकि वह दूसरों के साथ अपने खिलौने शेयर करना सीखे।
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मैं जानबूझकर अपनी बेटी को चिप्स का एक बड़ा पैकेट देकर कहती हूं कि वह दोस्तों के साथ मिलजुलकर खाए। हालांकि, कोविड काल के दौरान लगभग दो वर्षों तक सारी सामाजिक गतिविधियां ठप पड़ गई थीं और निश्चित रूप से बच्चों पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ा। इसलिए अब मैं दोबारा अपनी बेटी को नए दोस्त बनाने के लिए प्रेरित कर रही हूं।
नंबर वन की होड़
हर माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए बहुत ऊंचे ख्वाब देखते हैं। इसीलिए उनकी उम्मीदें भी बढ़ने लगती हैं। वे हर क्षेत्र में अपने बच्चों को प्रथम स्थान पर देखना चाहते हैं। मनोवैज्ञानिक सलाहकार पूनम कामदार आगे कहती हैं कि वास्तव में माता-पिता अपने अधूरे सपने बच्चों के माध्यम से साकार कराना चाहते हैं, जो सर्वथा अनुचित है।
ऐसे पेरेंट्स को एक बात यह भी याद रखनी चाहिए कि क्या वे भी हमेशा अपनी क्लास में फर्स्ट आते थे और खेलकूद, नृत्य-संगीत जैसी गतिविधियों में हमेशा सबसे आगे रहते थे? नहीं ना? तो फिर जो कार्य कभी आपके लिए असंभव होते थे, उसके लिए आप बच्चों से उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वे हर क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करें? इसलिए सबसे पहले अपने बच्चे की रुचियों को पहचान कर उसे उसी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। हो सकता है कि पहले प्रयास में उसे सफलता न मिले, फिर भी निराश हुए बिना उसे अपनी कोशिश जारी रखनी चाहिए।
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हार स्वीकारना सिखाएं
चाहे खेलकूद हो या पढ़ाई, यह जरूरी नहीं है कि हर एक्टिविटी में बच्चे की परफॉर्मेंस हमेशा एक जैसी अच्छी रहे। उसमें थोड़ा उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है। इसलिए बच्चे पर हमेशा फर्स्ट आने का दबाव न बनाएं क्योंकि वे खुद ही इस बात को लेकर तनावग्रस्त रहते हैं कि अगर मुझे परीक्षा में अच्छे मार्क्स नहीं मिले या किसी स्पोर्ट्स एक्टिविटी में मैं हार गया तो लोग क्या कहेंगे।
ऐसी बातों के बारे में सोचकर अगर कभी आपका बच्चा उदास हो, तो आप उसे समझाएं कि कोई बात नहीं, जीत की तरह हार भी हमारी जिंदगी का जरूरी हिस्सा है। अगली बार तुम पूरे उत्साह के साथ कोशिश करना, तुम्हें सफलता जरूर मिलेगी। चाहे तुम्हें कम अंक मिले हों, लेकिन तुमने पूरी ईमानदारी के साथ कोशिश की, हमारे लिए यही काफी है। बच्चों को यह एहसास दिलाना जरूरी है कि हारना बुरी बात नहीं होती, लेकिन हार के डर से कोशिश छोड़ देना गलत है।
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मन से मजबूत बनाएं बच्चे
आजकल एकल परिवारों में रहने वाले अधिकतर बच्चे मोबाइल के साथ ज्यादा वक्त बिताते हैं क्योंकि कामकाजी माता-पिता के पास उनके लिए समय नहीं होता है। उनकी यह आदत केवल पढ़ाई में बाधक नहीं होती, बल्कि इससे बच्चे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं और दूसरों के साथ अपनी भावनाएं शेयर नहीं कर पाते। इसका नुकसान यह होता है कि कॉलेज जाने की उम्र में पहुंचने के बाद ऐसे बच्चों के मन में दुविधा की स्थिति पैदा होने लगती है और वे सही निर्णय नहीं ले पाते।
यह भी न भूलें
- बच्चे की रुचि को पहचानें।
- टाइम मैनेजमेंट सिखाएं।
- रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखें।
- घरेलू कार्यों में सहयोग लें।
- बचत की अहमियत बताएं।
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- विनीता
Images: magnific/sakhi
