जब भी बच्चों की परवरिश का जिक्र होता है, तो अधिकतर लोगों के मन में यही सवाल उठता है कि आखिर इसके लिए कौन सा तरीका अपनाया जाए? कुछ लोग उन्हें कड़े अनुशासन में रखने की सिफारिश करते हैं, तो कुछ उनके साथ दोस्ताना व्यवहार रखने की सलाह देते हैं। मैं दो बच्चों की मां हूं, मेरी बेटी आन्या 12 और बेटा आदि 6 वर्ष का है।

हर बच्चा होता है खास

अपने अनुभवों के आधार पर मुझे ऐसा महसूस होता है कि हर बच्चा दूसरे से अलग होता है, इसलिए परवरिश का कोई एक निश्चित नियम नहीं होता, जिसे सब पर समान रूप से लागू किया जा सके। चाहे बेटा हो या बेटी, माता-पिता के लिए उसकी हर संतान बहुत खास होती है। हमारी बेटी परिवार की पहली संतान है, इसलिए उसे सभी सदस्यों का भरपूर लाड़-प्यार मिला। हालांकि, मां के लिए पहले बच्चे की परवरिश बहुत चुनौतीपूर्ण होती है।

उसकी जरूरतों, आदतों को समझने में और उसके साथ भावनात्मक बंधन को महसूस करने में वक्त लगता है क्योंकि डिलीवरी के तुरंत बाद हर मां की शारीरिक अवस्था ऐसी नहीं होती कि वह पहले दिन से ही शिशु की देखभाल करने लगे। हॉस्पिटल से घर लौटने के बाद जब मैं अपनी बेटी से जुड़े सभी कार्य खुद करने लगी, तो उसके साथ मेरी इमोशनल बॉन्डिंग मजबूत होने लगी।

समय देना है जरूरी

जब मेरी बेटी ने स्कूल जाना शुरू कर दिया, तो मुझे उसके व्यवहार में कुछ बदलाव महसूस होने लगा। पहले वह बहुत चंचल थी, लेकिन उस दौरान वह थोड़ी गुमसुम सी रहने लगी थी। पेरेंट्स-टीचर्स मीटिंग में उसकी मैम ने बताया कि वह नए दोस्त भी नहीं बनाती और स्पोर्ट्स जैसी एक्टिविटीज में शामिल होने से बचती है। तब मैंने सचेत तरीके से उसके साथ ज्यादा वक्त बिताना शुरू किया। रात को सोने से पहले रोज उसे कहानियां सुनाती, उससे स्कूल के बारे में बातचीत करती। उन दिनों वह अक्सर मुझसे यही कहती थी कि अपने दोस्तों की तरह मुझे भी साथ खेलने के लिए छोटा भाई या बहन चाहिए। उसकी ऐसी बातें सुनने के बाद हमें भी ऐसा लगा कि बच्चों के लिए घर में एक भाई या बहन का होना बहुत जरूरी है, ताकि उसे दूसरों के साथ शेयरिंग और एडजस्टमेंट सीखने का मौका मिले।

मजबूत हुआ भावनात्मक बंधन

जब बिटिया साढ़े छह वर्ष की थी, तभी उसके छोटे भाई का जन्म हुआ। मैं नवजात शिशु की देखभाल में व्यस्त रहने लगी। वैसे तो, छोटे भाई को देखकर वह बहुत खुश थी, लेकिन कई बार उसे ऐसा महसूस होता था कि मम्मी अब मुझे पहले की तरह प्यार नहीं करतीं। ऐसी समस्या के समाधान के लिए बेटे की देखभाल से जुड़े अधिकतर कार्यों में उसे भी शामिल करने लगी। शाम को उसे पार्क में लेकर जाती थी, जहां कुछ नए बच्चों से उसकी दोस्ती हो गई। जब उसका भाई बोलना-चलना सीखने लगा, तो इस कार्य में वह उसकी मदद करने लगी।

उन दिनों वह हर पल को खूब एंजॉय करती थी। जब बेटा थोड़ा बड़ा हो गया, तो खाने के लिए दोनों बच्चों को हमेशा एक साथ बैठाती थी। शुरू से ही मैं अपनी बेटी को यही सिखाती थी कि भाई अभी बहुत छोटा है, लेकिन तुम समझदार हो इसलिए तुम्हें उसका ख्याल रखना चाहिए। अपने बेटे से मैं कहती हूं कि दीदी के साथ तुम्हें भी अपनी चीजें शेयर करनी चाहिए। बच्चों के बीच मामूली नोकझोंक स्वाभाविक है, लेकिन हमारे घर में दोनों भाई-बहन एक-दूसरे के प्रति बहुत केयरिंग हैं।

पेरेंटिंग के 5 नियम

  • दूसरों से तुलना न करें।
  • उन्हें शेयरिंग सिखाएं।
  • डांटने के बजाय प्यार से समझाएं।
  • घरेलू कार्यों में सहयोग लें।
  • खुद उनके लिए रोल मॉडल बनें।

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Images: magnific