अक्सर स्कूल से लौटने के बाद बच्चे से जब पूछा जाता है कि आज का दिन कैसा रहा, तो उनका एक ही जवाब होता है, "कुछ नहीं"। कई बार बच्चे सिर्फ थके होने की वजह से ऐसा कहते हैं, लेकिन हर बार बात इतनी मामूली नहीं होती। कभी-कभी यह खामोशी इस बात का इशारा होती है कि बच्चा अपनी परेशानी को बयां नहीं कर पा रहा है। उसे डर होता है कि माता-पिता उसकी बात पर उसे डांटेंगे, आंकेंगे या दुखी हो जाएंगे। इसके लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं आगे...
बता दें कि स्कूल की अपनी एक अलग दुनिया होती है, जहां टीचर्स, क्लासमेट्स, पढ़ाई का कॉम्पिटिशन, दोस्तियां और सोशल प्रेशर सब शामिल होता है। उम्र के साथ बच्चे इन परिस्थितियों को अलग-अलग तरीके से महसूस करते हैं।
बच्चों की हिचकिचाहट और डर के कारण
अक्सर माता-पिता बिजी होने के कारण सिर्फ काम की बातें पूछते हैं, जैसे "आज क्लास में क्या पढ़ा?" या "मार्क्स कितने आए?" इससे बच्चे असहज महसूस करने लगते हैं। साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत के मुताबिक, बच्चे अक्सर अपनी परेशानियां इसलिए नहीं बताते क्योंकि उन्हें डांट, सजा या माता-पिता को निराश करने का डर होता है।
पढ़ाई का प्रेशर, दोस्तों के साथ अनबन, बॉडी इमेज और स्कूल का माहौल कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर बच्चे खुलकर बात करने से कतराते हैं।
उदासी ही नहीं, इन संकेतों से भी पहचानें बच्चे की परेशानी
हर बच्चा उदास होकर अपनी परेशानी नहीं जाहिर करता। परेशानी में होने पर बच्चों के व्यवहार में कई तरह के बदलाव दिख सकते हैं-
- चिड़चिड़ापन और गुस्सा: बच्चा बिना किसी वजह के चिड़चिड़ाने लगता है या छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होता है।
- पसंदीदा चीजों से दूरी: जिन खेलों या गतिविधियों में पहले उसका मन लगता था, उनसे अचानक दूरी बना लेना।
- खाने-पीने और सोने के पैटर्न में बदलाव: नींद न आना, बहुत ज्यादा या बहुत कम खाना।
- सिरदर्द या पेट दर्द की शिकायत: बिना किसी बीमारी के बार-बार शारीरिक तकलीफ का बहाना बनाना।
- पढ़ाई और दोस्तों से दूरी: ग्रेड्स अचानक गिरने लगना और दोस्तों से बात न करना।
ये बदलाव हमेशा किसी गंभीर मानसिक बीमारी का संकेत नहीं होते, लेकिन अगर ऐसा लंबे समय तक चले तो इस पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।
बच्चे के लिए 'इमोशनल सेफ स्पेस' कैसे बनाएं?
जब बच्चा अपनी कोई परेशानी आपके सामने रखे, तो सबसे महत्वपूर्ण यह होता है कि आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या है।
- तुरंत समाधान देने से बचें: बच्चा जब अपनी बात कह रहा हो, तो उसे तुरंत सलाह देने या समस्या सुलझाने की जल्दी न करें। उसे बस यह महसूस होना चाहिए कि आप उसकी बात सुन रहे हैं।
- सवाल पूछने का तरीका बदलें: "तुमने ऐसा क्यों किया?" या "पहले क्यों नहीं बताया?" जैसे तीखे सवाल पूछने के बजाय प्यार से पूछें- "मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूं?" या "किस चीज से तुम्हें बेहतर महसूस होगा?"
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कब तुरंत मदद की जरूरत होती है?
अगर बच्चा खुद को नुकसान पहुंचाने या अपनी जिंदगी खत्म करने जैसी बातें करे, तो इसे कभी भी हल्के में न लें। बच्चे को अकेला न छोड़ें और तुरंत किसी प्रोफेशनल या चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से संपर्क करें।
निष्कर्ष
बच्चे के लिए सबसे बड़ा सहारा यही होता है कि उसके पास कोई ऐसा इंसान हो जो उसकी बात बिना डांटे सुन सके। हर समस्या को तुरंत ठीक करने की हड़बड़ी के बिना, बस अपने बच्चे के पास बैठना, उसकी बात को ध्यान से सुनना और उसे यह भरोसा दिलाना कि आप हर हाल में उसके साथ हैं- यही एक मजबूत और सुरक्षित रिश्ता बनाता है।
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