जब भी किसी फिल्म का कोई गाना सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है, तो लोग उसके प्लेबैक सिंगर का नाम सर्च करने लग जाते हैं। लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल जैसे गायकों ने अपनी हजारों गानों में अपना आवाज दी है। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि पहले की फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग का कोई चलन नहीं था। उस समय सिंगर को कैमरे के सामने खुद ही गाना गाने के लिए आना पड़ता था। लेकिन फिर एक ऐसी फिल्म आई, जिसने भारतीय सिनेमा में संगीत की दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया। प्लेबैक सिंगिंग के नए दौर की शुरुआत कर दी।
प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत किस फिल्म से हुई?
साल 1935 में मिला फिल्म ‘धूप छांव’ से इसकी शुरुआत मानी जाती है। इस दौर की शुरुआत डायरेक्टर नितिन बोस ने की थी। सबसे पहले उनके दिमाग में प्लेबैक सिंगिंग का ख्याल आया था। उन्होंने पहले स्टूडियो में गाना रिकॉर्ड करवाया और बाद में एक्टर्स को उन गानों पर केवल लिप्सिंग करने को कहा। उनके इस एक आइडिया ने इंडियन फिल्म में म्यूजिक की रूप ही बदल दिया। इसके बाद कलाकारों के लिए अच्छा गायक होना जरूरी नहीं रहा, क्योंकि प्लेबैक सिंगिंग से अब फिल्मों की शूटिंग भी आसान हो गई थी।
प्लेबैक सिंगिंग से शूटिंग कैसे आसान हो गई?
- इसके बाद एक्टर को लाइव गाने के साथ-साथ एक्टिंग करने की जरूरत नहीं पड़ती। पहले कलाकारों को कैमरे के सामने अभिनय के साथ-साथ गाना भी लाइव गाना पड़ता था, जिसमें बहुत ज्यादा समय लगता था।
- रीटेक कम होने लगे, क्योंकि अगर गाना गाते समय रिकॉर्डिंग में कोई गलती होती, तो फिर से पूरा सीन दोबारा शूट करने की जरूरत नहीं होती। इससे समय और मेहनत दोनों बचते हैं।
- अच्छी एक्टिंग पर फोकस ज्यादा होने लगा। एक्टर को गाना गाने की चिंता नहीं रहती, जिससे वह अपनी एक्टिंग पर ध्यान दे पाते।
- हर एक्टर को सिंगर होना जरूरी नहीं रहा। पहले फिल्मों में उन्ह एक्टर को ज्यादा पसंद किया जाता था, जो एक्टिंग के साथ-साथ गाना भी गा सकते थे।
‘धूप छांव’ फिल्म में क्या था खास?
यह फिल्म एक बंगाली फिल्म 'भाग्य चक्र' का हिंदी रीमेक थी। दोनों फिल्मों का निर्देशन नितिन बोस ने ही किया था, लेकिन प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत की वजह से यह बहुत ज्यादा पॉपुलर हो गई।
- इस फिल्म का नाम 'धूप छांव' इसलिए रखा गया था, क्योंकि इसकी कहानी जीवन में भी खुशियां और कठिनाइयों का प्रतीक है। फिल्म का संदेश था कि जैसे धूप और छांव बारी-बारी से आते हैं, वैसे ही हर इंसान के जीवन में सुख और दुख का दौर भी आता-जाता रहता है।
- फिल्म सुख-दुख, संघर्ष, उम्मीद और रिश्तों के उतार-चढ़ाव को दिखाती है। इसमें दिखाया गया है कि इंसान को मुश्किल परिस्थितियों में भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
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Image Credit : magnific
