मोबाइल फोन आजकल हम सभी की जिंदगी की बेसिक जरूरत बन गया है। इसके बिना एक दिन तो क्या, एक घंटा बिताना भी कई बार मुश्किल लगता है। बेशक इसने हमारी कई मुश्किलों को दूर किया है और हमारे लिए दुनिया से जुड़ना बहुत आसान बना दिया है, लेकिन इसका अधिक इस्तेमाल सेहत पर बुरा असर डाल सकता है। आजकल कहीं न कहीं लोग इस बात को समझने लगे हैं, इसलिए काफी लोग दिन के कुछ घंटे मोबाइल से पूरी तरह दूरी बनाकर रखते हैं, जो कि सही भी है। आज के वक्त में 'नो-फोन मॉर्निंग' भी एक नया वेलनेस ट्रेंड बनकर सामने आया है। आजकल काफी लोग इसे फॉलो करते हैं और ऐसा माना जाता है कि इससे मेंटल हेल्थ पर अच्छा असर होता है और मूड बेहतर होता है। क्या वाकई ऐसा है, चलिए इसका जवाब एक्सपर्ट से जानते हैं। इस बारे में Dr. Vighnesh Y, Sr. Consultant General Physician, Yashoda Hospitals, Secunderabad जानकारी दे रहे हैं।

नो-फोन मॉर्निंग ट्रेंड क्या है?

'नो-फोन मॉर्निंग ट्रेंड' हेल्दी लाइफस्टाइल से जुड़ी एक आदत है। इसमें लोग सुबह सोकर उठने के बाद कम से कम एक घंटे तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करते हैं। इस दौरान ईमेल, सोशल मीडिया या किसी भी तरह के मैसेजेस से पूरी तरह दूरी बनाकर रखी जाती है। ऐसा माना जाता है कि अगर आप इसे कुछ समय तक फॉलो करती हैं, तो इससे दिमाग शांत होता है और मूड भी बेहतर होता है।

क्या सुबह उठते ही फोन न देखने से बेहतर होता है मूड?

'नो-फोन मॉर्निंग' ट्रेंड से न केवल मूड बेहतर होता है, बल्कि यह दिनभर बेहतर फोकस बनाने में आपकी मदद करता है। इसका मेंटल हेल्थ पर पॉजिटिव असर होता है।

  • एक्सपर्ट का कहना है कि सुबह-सुबह स्क्रीन देखने से दिमाग बहुत ज्यादा उत्तेजित हो सकता है, कोर्टिसोल का लेवल बढ़ सकता है और पूरी तरह जागने से पहले ही एंग्जायटी हो सकती है, इसलिए 'नो-फोन मॉर्निंग' (सुबह फोन न इस्तेमाल करना) का चलन बढ़ रहा है।
  • अगर आप सुबह जागने के बाद लगभग एक घंटे तक फोन का इस्तेमाल नहीं करती हैं, तो इससे फोकस बढ़ता है, मूड शांत होता है और फैसले लेना आसान होता है।
  • दूसरी ओर, सुबह सोशल मीडिया चेक न करने की आदत इमोशनल कंट्रोल को बेहतर बनाती है। इससे आप दूसरों से तुलना नहीं करते हैं और एंग्जायटी कम होती है और मूड बेहतर होता है।
  • एक्सपर्ट का कहना है कि सुबह सबसे पहले फोन देखने की जगह हल्की एक्सरसाइज करें, गहरी सांस लें, जर्नलिंग करें और सुबह की धूप लें।
  • फोन को बेडरूम के बाहर चार्ज करने और एक छोटी सी माइंडफ़ुल रूटीन के बाद फोन देखने का समय तय करने से, बिना किसी बड़े डिटॉक्स के मूड और प्रोडक्टिविटी में काफी सुधार हो सकता है।

 

यह भी पढ़ें- मन भारी है तो जी भरकर रो लेना, मेंटल हेल्थ के लिए कितना सही?


यह भी पढ़ें- 'कुछ नहीं हुआ, मैं ठीक हूं...', महिलाएं अपनी तकलीफ छिपाती क्यों हैं? जानिए साइकोलॉजी


हर जिंदगी के वेलनेस सेक्शन में हम इसी तरह अपने आर्टिकल्स के जरिए स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं, हेल्दी खान-पान और मेंटल हेल्थ के बारे में आप तक सही जानकारी पहुंचाने की कोशिश करते रहेंगे। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
Image Credit:Freepik, Shuttersotck