आज के समय में हेल्थ इंश्योरेंस सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। आमतौर पर लोग 5 लाख या 10 लाख रुपये का फैमिली फ्लोटर प्लान लेकर निश्चिंत हो जाते हैं कि वे सुरक्षित हैं। लेकिन जिस रफ्तार से अस्पतालों का खर्च बढ़ा है, खासकर बड़े शहरों में, जहां अस्पताल अब फाइव-स्टार सुविधाओं जैसे हो चुके हैं, वहां यह कवरेज अक्सर नाकाफी साबित होता है।
कैंसर, हार्ट डिजीज या ऑर्गन ट्रांसप्लांट जैसी गंभीर बीमारियों में कुछ ही दिनों में इलाज का खर्च लाखों रुपये तक पहुंच जाता है। ऐसे में यदि आप सिर्फ बेसिक हेल्थ इंश्योरेंस पर निर्भर हैं, तो आर्थिक झटका लगना तय है। हालांकि, अगर सही प्लानिंग की जाए तो कम प्रीमियम में भी बड़ा हेल्थ कवरेज हासिल किया जा सकता है। इसका सबसे कारगर तरीका है बेसिक हेल्थ इंश्योरेंस के साथ टॉप-अप या सुपर टॉप-अप प्लान लेना। दोनों ही कम प्रीमियम में बड़ा कवरेज देने का दावा करते हैं, लेकिन इनके काम करने का तरीका अलग है। यही फर्क तय करता है कि आपके लिए कौन-सा विकल्प बेहतर रहेगा।
टॉप-अप पॉलिसी क्या है?
टॉप-अप हेल्थ इंश्योरेंस एक ऐसी पॉलिसी होती है, जो आपके मौजूदा हेल्थ इंश्योरेंस कवर की सीमा खत्म होने के बाद अतिरिक्त कवरेज देती है। इसमें एक तय सीमा होती है, जिसे 'डिडक्टिबल' कहा जाता है। डिडक्टिबल वह तय रकम होती है, जो इलाज या नुकसान की स्थिति में बीमा क्लेम से पहले आपको खुद वहन करनी होती है या आपकी बेसिक पॉलिसी से कवर होती है। उसके बाद ही बीमा कंपनी बाकी खर्च का भुगतान करती है।
सुपर टॉप-अप पॉलिसी क्यों है बेहतर?
सुपर टॉप-अप पॉलिसी भी टॉप-अप की तरह ही काम करती है, लेकिन इसका तरीका कहीं ज्यादा लचीला और फायदेमंद होता है। सुपर टॉप-अप में डिडक्टिबल पूरे साल के कुल मेडिकल खर्च पर लागू होती है, न कि सिर्फ एक ही क्लेम पर। यानी अगर साल में कई बार अस्पताल में भर्ती होने के बाद आपका बेसिक हेल्थ कवर खत्म हो जाता है, तो उसके बाद होने वाला सारा खर्च सुपर टॉप-अप पॉलिसी से कवर किया जाएगा।
कम प्रीमियम में बड़ा फायदा
सुपर टॉप-अप का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बहुत कम प्रीमियम में आपको 50 लाख या 1 करोड़ रुपये तक का हेल्थ कवरेज मिल सकता है। अगर आप सीधे इतना बड़ा बेसिक हेल्थ प्लान लेंगे, तो उसका प्रीमियम आपकी जेब पर भारी पड़ेगा। लेकिन अगर आप 5 या 10 लाख रुपये का बेसिक प्लान लेकर उसके ऊपर सुपर टॉप-अप जोड़ते हैं, तो सालाना सिर्फ 4-5 हजार रुपये अतिरिक्त देकर बड़ा कवरेज पा सकते हैं। चार सदस्यों वाले परिवार (दो बड़े और दो बच्चे) के लिए यह एक बेहद किफायती और समझदारी भरा विकल्प है।
डिडक्टिबल चुनते समय रखें सावधानी
डिडक्टिबल लिमिट आप खुद तय कर सकते हैं। बेहतर यही होता है कि डिडक्टिबल आपके बेसिक हेल्थ इंश्योरेंस के बराबर हो, ताकि किसी भी स्थिति में आपको अपनी जेब से खर्च न करना पड़े। उदाहरण के तौर पर, अगर आपका बेस प्लान 20 लाख रुपये का है और आपने सुपर टॉप-अप में 10 लाख रुपये की डिडक्टिबल तय की है, तो 10 लाख रुपये से ऊपर का खर्च सुपर टॉप-अप से कवर हो जाएगा और आपके बेस प्लान में भी कुछ कवरेज बचा रहेगा।
टैक्स में भी मिलेगी राहत
टॉप-अप और सुपर顶-अप हेल्थ इंश्योरेंस पर भी इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80डी के तहत टैक्स छूट मिलती है। यानी सुरक्षा के साथ-साथ आपको टैक्स बचत का फायदा भी मिलता है।
कितने रुपये का कवर लेना सही है?
यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस शहर में रहते हैं और वहाँ के बड़े अस्पतालों में गंभीर बीमारियों का इलाज कितना महंगा है। मेट्रो शहरों में रहने वालों के लिए 50 लाख से 1 करोड़ रुपये तक का कुल हेल्थ कवरेज आज के समय में व्यावहारिक माना जा रहा है।
कहां से लें सुपर टॉप-अप प्लान?
सबसे बेहतर विकल्प यही है कि आप उसी कंपनी से सुपर टॉप-अप लें, जिससे आपने बेस हेल्थ प्लान लिया है। इससे पेपरवर्क कम होता है और क्लेम सेटलमेंट आसान रहता है। हालांकि, अगर कोई दूसरी कंपनी बेहतर शर्तों पर कम प्रीमियम में सुपर टॉप-अप दे रही है, तो उसे भी चुना जा सकता है।
टॉप-अप और सुपर टॉप-अप के प्रीमियम में बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता। कई मामलों में सुपर टॉप-अप का प्रीमियम थोड़ा ही ज्यादा होता है, लेकिन कवरेज और सुविधा कहीं अधिक मिलती है। चार सदस्यों वाले परिवार के लिए 50 लाख रुपये तक का सुपर टॉप-अप कवर महज 4 से 6 हजार रुपये सालाना में मिल सकता है, जो इसे बेहद किफायती बनाता है।
यदि बात केवल एक बड़े मेडिकल खर्च की हो, तो टॉप-अप पॉलिसी भी काम की हो सकती है। लेकिन आज के समय में जब इलाज बार-बार और लंबे समय तक चल सकता है, तब सुपर टॉप-अप हेल्थ इंश्योरेंस ज्यादा सुरक्षित और समझदारी भरा विकल्प साबित होता है। कम प्रीमियम में बड़ा कवरेज और बार-बार क्लेम की सुविधा ही सुपर टॉप-अप की असली ताकत है।
प्लान चुनते समय किन बातों का ध्यान रखें?
- रूम रेंट लिमिट बेस पॉलिसी से मेल खाती हो।
- बीमारियों का वेटिंग पीरियड जरूर चेक करें।
- सिर्फ सस्ता प्रीमियम देखकर प्लैन न चुनें।
- किसी बीमारी पर सब-लिमिट तो नहीं है, यह देखें।
- फैमिली मेडिकल हिस्ट्री ईमानदारी से बताएं।
- नेटवर्क हॉस्पिटल बेस प्लैन जैसे हों।
- अलग-अलग कंपनियों की पॉलिसी हो तो एडमिशन के समय दोनों की जानकारी दें।
लेखिका- सुमन गुप्ता (वित्तीय मामलों की जानकार)
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