पिछले हफ्ते हमने धन से जुड़ी बचपन की यादों की बात की। हम इतने बड़े होते कि उसे लेकर कोई सवाल कर पाते, उससे पहले ही वे विश्वास के तौर पर अंतर्मन में पुख्ता हो गए। इस हफ्ते मैं अपना अनुभव साझा करना चाहूंगी।
यह इसलिए नहीं है, क्योंकि मेरी कहानी में कुछ विशिष्ट है। वास्तव में बहुत मायनों में वह बहुत आम है, जिसकी वजह से उसे साझा करना उपयोगी हो जाता है। मैंने भी वही गलतियां कीं जो बहुत सी भारतीय महिलाएं करती हैं। बहुत सी बातें मैंने बहुत देर से सीखीं। बाद में कुछ बातों को लेकर जो मानसिक स्पष्टता आई, वह किसी सही पुस्तक को पढ़ने या सही सलाहकार के संपर्क में आने का परिणाम नहीं थी, बल्कि जो खामियाजा मुझे भुगतना पड़ा, उससे मिले सबक मूल्यवान साबित हुए। तब मुझे समझ आया कि कौन-सी गलतियों को दोहराने से बचना है।
मैं ऐसे घर-परिवार में पली-बढ़ी हूं, जहां धन का प्रबंधन बड़ा सोच-विचारकर व शांत तरीके से किया जाता था। मेरी माँ को किफायत से चलने की आदत थी। परिवार में अक्सर चीजों के मूल्य की बात होती थी, इस पर शायद ही कभी चर्चा होती थी कि उनसे क्या नया बनाया जा सकता है। बचत को गुण माना जाता था। यह माना जाता था कि निवेश उनके लिए है, जिनके पास पहले से ही आवश्यकता से अधिक धन है। हमारे पास अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त था, लेकिन यह विचार हमारे बीच नहीं था कि धन को यूँ ही रखे रहने के बजाय बढ़ाने की सोचना चाहिए।
जब मैंने कमाना शुरू किया, तो बचपन से जो सीख मिली थी, उसी के अनुरूप बचत करना आरंभ किया। मैंने फिक्स्ड डिपॉजिट अकाउंट खोला और एक प्रकार से जिम्मेदार महसूस कर रही थीं। बहुत लंबे समय तक मैंने बाजार में निवेश नहीं किया। शेयर बाजार किसी जुए की तरह लगता था। म्यूचुअल फंड्स जटिल प्रतीत होते थे। गोल्ड में निवेश सुरक्षित लगता था। इस प्रकार जिन वर्षों में सही निवेश से चक्रवृद्धि ब्याज के जरिए बड़ी धनराशि खड़ी हो सकती थी, उस दौरान मेरा धन बचत खाते में रखा रह गया, जिस पर मिलने वाला ब्याज इतना नहीं था कि उससे बढ़ती महंगाई का मुकाबला किया जा सके।
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पहला सबक, जिसे सीखने में मुझे काफी समय लग गया-सतर्कता बरतने और चीजों से बचने के प्रयास में फर्क है। मुझे लगा था कि मैं सतर्क हूँ। दरअसल, धन को सुरक्षित रखने से अधिक जोर मैं तनाव से बचने पर दे रही थी। अपने आर्थिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए जो सही रूपरेखा होनी चाहिए, उसमें स्थायित्व के साथ ही सही अनुपात में बढ़त पर ध्यान देना भी जरूरी है। मैं उनमें से एक की कीमत पर दूसरे को दांव पर लगा रही थी। इसका अहसास मुझे बाद में तब हुआ जब मैंने आकलन किया कि धन को यूं ही एक जगह पर रखने से मुझे कितनी हानि हुई है।
दूसरा सबक-यह अहसास ही नहीं था कि मेरे पास क्या है। जब मेरी शादी हुई, तो मैंने सवाल नहीं किए। बहुत सी चीजों की तरफ देखा तक नहीं। मैं बात कर रही हूँ निवेशों, पॉलिसियों और अकाउंट्स की। मुझे यह लगा था कि इनका प्रबंधन करना किसी और के हाथ में है, यह मेरा कार्यक्षेत्र नहीं है। अपनी ही वित्तीय यात्रा को लेकर मेरा निष्क्रिय रवैया था। मुझे इसका अहसास भी नहीं था, क्योंकि इन बातों को लेकर निष्क्रिय रवैया बड़ी सामान्य बात थी। यह लगता था कि चीजों के प्रबंधन का तरीका ही यही है।
एक दिन बैठकर मैंने विस्तृत सूची बनाई, जिसमें सभी खातों, सभी पॉलिसियों और सभी निवेशों को लिखा, फिर स्वयं से सवाल किया कि प्रत्येक से मुझे क्या लाभ है? उसी दिन से कुछ चीजों में बदलाव की शुरुआत हुई। कुछ चीजें मुझे उपयोगी लगीं, तो कुछ को समाप्त करने की आवश्यकता महसूस हुई। कुछ खर्च तो ऐसी मदों में थे, जिन पर किसी का ध्यान भी नहीं था। जब स्वयं देखा-समझा, उसी दिन से उनका स्वामित्व अपने हाथ में लेने की शुरुआत हुई। इस स्तंभ के पाठकों के पत्रों में भी लोगों ने ऐसे ही अनुभव साझा किए। एक पाठक ने लिखा कि परिवार में संकट उत्पन्न हुआ तो उन्हें पता चला कि एक भी दस्तावेज के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है; एक अन्य का कहना था कि उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि अगर पति को कुछ हो गया, तो परिवार के लिए जोड़े गए धन का उपयोग किस प्रकार किया जाएगा। अपनी अज्ञानता से उपजी उनकी ये चिंताएं वास्तविक थीं। आप उन चीजों का प्रबंधन किस प्रकार करेंगे, जिनकी ओर कभी देखा ही न हो? बहुत लंबे समय तक तो यह लगता रहता है कि धन प्रबंधन को लेकर दूसरों पर भरोसा है, इसलिए सब ठीक है, जबकि यह जरूरत के समय अनुपस्थित रहने का विषय है।
तीसरा सबक बहुत व्यक्तिगत है। कई सालों तक मैंने अपने वित्तीय पहलुओं को लेकर मित्रों या परिवार में किसी से चर्चा नहीं की। सार्वजनिक जीवन में भी इस बारे में कोई बात नहीं की। धन को हम इतना निजी मान लेते हैं कि इसकी चर्चा में भी संकोच होता है। आपके पास धन होना, उसकी अधिक चाह और उसके विषय में समझ होना, मानो आपके लालच को दर्शाता हो। यह समझने में मुझे बहुत समय लगा कि यह चुप्पी ही आपकी वित्तीय यात्रा में अवरोधक है। मौन में आप अच्छे सवाल नहीं पूछ सकते। चुप्पी के बीच आप अन्य लोगों से सीख नहीं सकते। जब आप बोलेंगे ही नहीं, तो गलतियों को सुधार भी नहीं सकते। मौन का निजता से कोई संबंध नहीं है। मौन रहने की वजह से आपको साल-दर-साल धन का खामियाजा भुगतना पड़ता है।
ये सबक अनूठे नहीं हैं। ये तो उस व्यवस्था का परिणाम हैं, जहाँ हममें से अधिकांश लोगों को धन से वास्तविक संबंध के विषय में सिखाया ही नहीं जाता। जब आप यह बात समझ लेते हैं, तो अज्ञानता को लेकर शर्म और संकोच दूर होने लगते हैं। आपके मन में जानने की उत्कंठा पैदा होती है।
मेरी निजी कहानी एक बड़ा कारण है कि इस स्तंभ के माध्यम से मैं आपके बीच हूं। प्रोफेशनल होना उससे इतर पहलू है। मैंने वित्तीय क्षेत्र में 15 वर्ष दिए हैं। निवेश पर काम किया है, पोर्टफोलियो बनाए हैं, परिवार के व्यवसाय व ऑफिस को चलाया है, अवसरों का आकलन किया है और देश के बड़े अनुभवी वित्तीय जानकारों के साथ आमने-सामने बैठकर चर्चा की है। इन वर्षों में लगभग सभी पृष्ठभूमि और आय वर्ग की महिलाओं ने अक्सर मुझसे एक सवाल किया कि कहां से शुरुआत करूं? उन्होंने यह नहीं पूछा कि कौन-सा फंड या पॉलिसी लेनी चाहिए? उनका पहला सवाल था कि शुरुआत कैसे हो?
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उसी सवाल का उत्तर देने के लिए इस स्तंभ की शुरुआत की गई। जिस उद्देश्य के लिए मैं इतने समय से काम कर रही थी, वही मुझे यहाँ खींच लाया।
इस हफ्ते, अपने वित्तीय जीवन के तीन पड़ावों को लिखें, जहाँ आप गलत हुईं। यहां आंकड़ों को न लाएं, बस अपने व्यवहार को समझें-किन चीजों से बचने का प्रयास किया, जो सवाल कभी नहीं पूछ सकीं और जो संवाद कभी नहीं किया। यह सूची आपके निवेश स्टेटमेंट से अधिक ईमानदारी से वास्तविकता को सामने रखेगी। यहीं से आपकी वास्तविक वित्तीय यात्रा की शुरुआत होगी।
अगले हफ्ते: मैं आपसे साझा करूँगी कि इस यात्रा में कौन-सी चीजें विकसित हुई हैं। वित्तीय क्षेत्र में 15 वर्ष के काम, इस स्तंभ और आपके लिखे पत्रों में पूछे गए सवाल कि शुरुआत कैसे हो, इन सभी से जो चीजें निकलकर आईं, उन्हें सामने रखने का प्रयास होगा। कुछ ऐसा जिसे आप सदैव साथ लेकर चल सकें।
उम्मीद करती हूं कि आपको भी इसकी प्रतीक्षा रहेगी।
धन से जुड़े सवाल व अनुभव साझा करने के लिए हमें लिखें- iamolaxmi@gmail.com
