कुछ वर्ष पहले एक महिला मुझसे मिलने आईं। वह शिक्षित और व्यावहारिक रूप से दक्ष थीं। करीब 35 साल से अपने घर को इतना अच्छे से चला रही थीं कि बहुत से संस्थानों को चलाने वाले भी उनकी इस सूझबूझ के कायल हो जाएंगे। उनके पति की अकस्मात मृत्यु हो गई थी। वह दुख में डूबी थीं, पर मुझसे मिलने का कारण दुख साझा करना नहीं, बल्कि दूसरा था। दरअसल, उन्हें यह नहीं पता था कि उनका धन किस बैंक में है। धन कितना है, इसका भी अंदाजा नहीं था।
धन था, अकाउंट था, निवेश भी थे। सामान्य नजर से देखें तो सबकुछ व्यवस्थित था, पर सबकुछ उनके पति के नाम पर था, संबंधित चीजें उनके फोन में थीं, पासवर्ड के साथ बैंक खातों का संचालन भी वही करते थे। वह पति पर पूरा विश्वास करती थीं। इसी विश्वास की वजह से आज उनके वित्तीय जीवन में मुश्किल स्थिति पैदा हो गई। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि किस तरह वह इस समस्या से उबरें।
उनके जैसी बहुत सी महिलाओं के साथ मेरी मुलाकात और बातें हुईं। ये महिलाएं सबकुछ अच्छी तरह संभालती थीं। वे घर, बच्चे, करियर, रिलेशनशिप सबकुछ अच्छे से संभालने का हुनर रखती हैं, पर उस समय असहाय हो जाती हैं जब उनके सामने ऐसे दस्तावेजों की बात आती है, जिन्हें उन्होंने कभी खोलकर ही नहीं देखा। ऐसा नहीं कि वे बुद्धिमान नहीं हैं या उनमें क्षमता की कोई कमी है, बल्कि बहुत से भारतीय घरों में अपनों से अत्यधिक प्यार और एक वाक्य दोहराए जाने के परिणामस्वरूप ऐसी स्थितियां बन जाती हैं।
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मैं हूं ना
ये तीन शब्द सबसे खूबसूरत लगते हैं, पर धीरे-धीरे सबसे खतरनाक भी बन जाते हैं।
ये शब्द पति अपनी पत्नी से कहता है, पिता अपनी पुत्री से, भाई अपनी बहन से और बेटा अपनी मां कहता है। तू चिंता मत कर, मैं हूं ना, सब देख लूंगा। हर बार ये शब्द बेहद संजीदगी से कहे जाते हैं। हर बार उन शब्दों के साथ भावों की गर्माहट होती है, सुरक्षा का आश्वासन होता है। प्यार का भरोसा होता है, लेकिन हर बार उनके साथ ही धीरे-धीरे निर्भरता भी पैदा होने लगती है, जिसकी वजह से काफी कुछ तहस-नहस भी हो सकता है।
क्योंकि मैं हूं ना की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। कोई नहीं बताता कि उसकी समाप्ति कब होगी।
मैं हूं ना का आश्वासन तब काम नहीं आता जब इसका भरोसा दिलाने वाला आईसीयू में हो। जब शादी टूटती है, तब इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। न ही तब जब पिता जा चुके हों और बेटी वकील के सामने बैठकर सवालों का जवाब दे रही हो। इन शब्दों के पीछे प्रेम का भाव होता है, पर यह समझना चाहिए कि सुरक्षा का आश्वासन हमेशा सशक्त होने का पर्याय नहीं होता। प्रियजनों द्वारा खयाल रखा जाना एक बात है, पर किसी भी स्थिति के लिए तैयार होना काफी अलग है।
भारतीय महिलाओं की आयु औसतन पुरुषों से तीन साल अधिक होती है। इसका अर्थ है कि अधिकांश महिलाओं को किसी न किसी मोड़ पर अपने वित्तीय जीवन को स्वयं ही संभालना होगा। यहां निराशावादी होने जैसा कुछ नहीं है। यह तो अंकगणित को समझने की बात है। सवाल यह नहीं कि वह दिन कब आएगा, बल्कि महत्वपूर्ण है कि जब वो समय आए तो आप उसके लिए कितना तैयार होती हैं। क्या आपको पता है कि खाते कहां हैं? इंश्योरेंस पालिसियां, म्यूचुअल फंड्स, संपत्ति के दस्तावेज, पासवर्ड और नामिनी के बारे में पता है? बहुत से परिवार सोचते हैं कि उन्होंने सब चीजें व्यवस्थित कर रखी हैं। उसमें अंतर आने की वजह बेफिक्री नहीं है, बल्कि अत्यधिक प्रेम के कारण ऐसा हो जाता है। ये भाव और विश्वास बड़ा होता है कि खयाल रखने के लिए कोई है हमेशा।
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तलाक के विषय में चर्चा करना ही कठिन होता है। हमारी संस्कृति में इस शब्द का उल्लेख करना ही परिवार में अप्रिय स्थिति को न्यौता देना माना जाता है। मैंने देखा है कि जिन महिलाओं को अलगाव में ज्यादातर तकलीफों का सामना करना पड़ा, वे अपने रिश्ते में बहुत दुखी रही हों, ऐसा नहीं था। ये वो महिलाएं थीं जो सहज थीं, जिन्होंने कभी सवाल नहीं किए। दस्तावेजों को देखने की जरूरत नहीं समझी। जिन्हें अपने अधिकारों की जानकारी नहीं थी, क्योंकि उन्हें ऐसे किसी संवाद का हिस्सा ही नहीं बनाया गया था। वित्तीय विषयों को लेकर सवाल करना अविश्वास नहीं है। संपत्ति के दस्तावेजों में अपना नाम दर्ज कराने के लिए कहना निराशावादी होना नहीं है। ऐसा नहीं है कि जिस महिला को इन बातों की जानकारी व समझ होती है, वो परिवार पर अविश्वास करती है। इसके उलट ये समझना चाहिए कि ऐसी महिला जीवन की किसी भी परिस्थिति में असहाय नहीं होगी।
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अब मैं उन पुरुषों से कुछ कहना चाहूंगी जो इस स्तंभ के पाठक हैं।
मैं हूं ना कहकर अपने प्रियजनों को सुरक्षा का एहसास देने से अधिक महत्वपूर्ण भी कुछ है। वित्तीय चीजों से जुड़ी फाइलें लेकर उनके साथ बैठें। उन्हें सबकुछ दिखाएं और बताएं। यह सुनिश्चित करें कि उनका नाम संपत्ति के दस्तावेजों पर हो। पासवर्ड शेयर करें। उन विषयों पर बात करें, जिनसे अधिकांश परिवार कई दशकों तक बचने का प्रयास करते हैं। पति अपनी पत्नी से, पिता अपनी पुत्री से, बेटा अपनी मां से इन विषयों पर बात करे। ये संवाद इसलिए नहीं होता कि कहीं कुछ गलत है या होने की आशंका है, बल्कि उन्हें मजबूत बनाने के इरादे से ऐसा करें। आप चाहेंगे कि जिनसे आप बेहद प्यार करते हैं वे आपकी अनुपस्थिति में भी सब चीजों का प्रबंधन भली प्रकार कर सकें। ये सब इसलिए नहीं है कि आप उन्हें छोड़कर जाने की योजना बना रहे हैं, बल्कि ये समझना चाहिए जिंदगी हमेशा अनुमति नहीं मांगती।
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मैंने बहुत से पुरुषों को बिना किसी आग्रह या नाटकीयता के ऐसा करते देखा है, क्योंकि उन्होंने प्रेम के असल मायने समझे। जब कठिन परिस्थितियां उत्पन्न हुईं तो उनके परिवार टूटकर बिखरे नहीं, क्योंकि उन्होंने पूर्व में ही सबकुछ सुनिश्चित किया था। उन्होंने इस बात को समझा कि वास्तविक सुरक्षा मैं हूं ना के आश्वासन में नहीं है। प्रियजनों के भीतर किसी भी परिस्थिति में आत्मनिर्भरता के साथ किस प्रकार निर्णय लेने हैं, इसकी जानकारी व मजबूती का यह बोध उत्पन्न करना महत्वपूर्ण है। ये परिवार में आपकी भूमिका के समक्ष खतरा नहीं है, बल्कि उसी जिम्मेदारी की मुखर अभिव्यक्ति है।
इस हफ्ते, चाय के बहाने साथ बैठें और तीन सवालों का जवाब दें। सभी वित्तीय दस्तावेज कहां रखे हैं? प्रत्येक खाते, पालिसी और संपत्ति पर किसका नाम है। यदि कल आपको कुछ हो जाए तो परिवार के लिए कौन सी जानकारियां अहम होंगी। क्या उन्हें ये पता है कि सभी जानकारियों को कहां सुरक्षित रखा गया है?
इस संवाद के लिए मात्र 30 मिनट देने होंगे, पर उससे बचने के फेर में 30 सालों तक मूल्य चुकाना पड़ सकता है।
यह कालम केवल शैक्षिक एवं वित्तीय जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है।
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