भारत में कानों के आभूषणों का इतिहास सिर्फ फैशन या सजने-संवरने की कहानी नहीं है। यहां कुंडल, कर्णफूल और झुमके कभी धार्मिक पहचान, कभी सामाजिक हैसियत और कभी राजसी शान का हिस्सा रहे हैं। खास बात यह है कि कानों में आभूषण पहनने की परंपरा प्राचीन भारतीय मूर्तिकला और पुरातात्विक अवशेषों में भी दिखाई देती है। समय के साथ इनके आकार, धातु और डिजाइन बदलते रहे, लेकिन भारतीय पहनावे में इनकी जगह बनी रही।
क्या है झुमकों का इतिहास?
एक दौर था जब भारी सोने के कुंडल और रत्नों से जड़े कर्णाभूषण शाही ठाठ की पहचान माने जाते थे। आज वही परंपरा छोटे स्टड, हूप्स और हल्के झुमकों के रूप में नए अंदाज में दिखती है। आइए The Science and cultural significance of ornaments & piercings की रिसर्च से जानते हैं कान के झुमकों की दिलचस्प कहानी।
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हड़प्पा सभ्यता में भी पहने जाते थे कान के गहने
भारत में कानों में आभूषण पहनने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। हड़प्पा सभ्यता के दौरान भी पुरुष और महिलाएं अलग-अलग तरह के गहने पहनते थे। उस समय सोने, चांदी, तांबे, हाथी दांत, हड्डी और मिट्टी से आभूषण बनाए जाते थे। मोहनजोदड़ो और लोथल जैसे पुरातात्विक स्थलों से सोने के झुमके और सिर के आभूषण मिले हैं। इससे पता चलता है कि उस दौर में भी लोग सजने-संवरने के शौकीन थे।
प्राचीन भारत में कुंडल थे शान की पहचान
प्राचीन भारत में कान के आभूषणों को कुंडल कहा जाता था। इनका जिक्र महाभारत और रामायण जैसे ग्रंथों में भी मिलता है। महाभारत में कर्ण के कुंडलों की कहानी काफी प्रसिद्ध है। वहीं, भगवान और राजाओं की मूर्तियों में भी बड़े-बड़े कुंडल दिखाई देते हैं।
ईसा पूर्व पहली सदी के आसपास के सातवाहन काल का एक सोने का कुंडल आज न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट में मौजूद है। इसे प्राकारवप्र कुंडल कहा जाता है। इसकी बनावट बेल जैसी है और इसे सोने की तार और बारीक कारीगरी से तैयार किया गया था। इससे उस समय के सुनारों की कला का अंदाजा लगाया जा सकता है।
धार्मिक परंपराओं से भी जुड़ा रहा कान का आभूषण
भारत में कान छिदवाने की परंपरा केवल गहने पहनने के लिए नहीं थी। इसे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी दिया जाता था। हिंदू परंपरा में बच्चों के कान छिदवाने की रस्म को कर्णवेध संस्कार कहा जाता है। बौद्ध मूर्तियों में भी लंबे कानों का खास महत्व दिखाई देता है। भगवान बुद्ध की कई मूर्तियों में उनके कान लंबे नजर आते हैं। माना जाता है कि राजकुमार के रूप में वे भारी और कीमती कुंडल पहनते थे, लेकिन राजसी जीवन छोड़ने के बाद उन्होंने आभूषण त्याग दिए। इस तरह लंबे कान त्याग और वैराग्य का प्रतीक बन गए।
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मुगल दौर में कुंदन और मीनाकारी ने बदला डिजाइन
मुगल काल में भारतीय आभूषणों की कारीगरी को नया रूप मिला। इस दौर में सोने के गहनों में कीमती पत्थर जड़ने की कुंदन तकनीक काफी लोकप्रिय हुई। 16वीं सदी के आखिरी दौर में मुगल दरबार के कारीगरों ने कुंदन और मीनाकारी को मिलाकर गहनों के नए डिजाइन तैयार किए। इन आभूषणों में सामने की तरफ हीरे, पन्ने और दूसरे कीमती रत्न लगाए जाते थे, जबकि पीछे की तरफ रंगीन मीनाकारी की जाती थी। इससे गहने देखने में और भी खूबसूरत लगते थे। झुमके और दूसरे कान के आभूषण भी इस शाही कारीगरी का हिस्सा बने।
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चांदबाली और झुमकों ने बनाई अलग पहचान
समय के साथ भारतीय कान के आभूषणों में कई तरह के डिजाइन देखने को मिले। झुमके, कर्णफूल, बाली, कुंडल और चांदबाली महिलाओं के बीच लोकप्रिय हुए। खासतौर पर चांदबाली का डिजाइन अपनी अलग पहचान रखता है। मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम में 1850 से 1900 के बीच बनी सोने की चांदबालियों की एक जोड़ी मौजूद है। ये लखनऊ और हैदराबाद के दरबारी नृत्य और संगीत से जुड़ी कलाकारों के पहनावे का हिस्सा थीं। इनके डिजाइन में सोने और कीमती पत्थरों की खूबसूरत कारीगरी दिखाई देती है।
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आज भी फैशन में कायम है हजारों साल पुरानी परंपरा
आज कान के आभूषणों के डिजाइन पहले से कहीं ज्यादा बदल गए हैं। रोजाना पहनने के लिए छोटे स्टड, ऑफिस के लिए हल्की बालियां और शादी-पार्टी के लिए बड़े झुमके पसंद किए जाते हैं। हूप्स, ड्रॉप ईयररिंग्स और डायमंड स्टड भी फैशन का हिस्सा हैं। खास बात यह है कि आज के आधुनिक डिजाइन में भी पुराने भारतीय गहनों की झलक मिल जाती है। यानी हड़प्पा काल से शुरू हुआ कान के आभूषणों का यह सफर आज भी जारी है।
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झुमका सिर्फ एक फैशन एक्सेसरी नहीं है, ये हड़प्पा से लेकर मुगलों तक की हजारों साल की कहानी है। कभी ये राजाओं की शान था, कभी त्याग का प्रतीक बना और आज हर लड़की के इयररिंग बॉक्स की जान है। इसलिए अगली बार जब आप झुमका पहनें, तो समझिए आप सिर्फ सज नहीं रही हैं, एक पूरी विरासत को पहन रही हैं। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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