इंड‍ियन ट्रेनों में ट्रैवल करते समय आपने 'लेडीज डिब्बा' यानी महिलाओं के लिए आरक्षित बोगी जरूर देखी होगी। हालांक‍ि, आज के समय में जब भी कोई ट्रेनों में अलग लेडीज कोच देखता है, तो उन्‍हें लगता है क‍ि यह महिलाओं की सुरक्षा और सहूलियत के लिए ही बनाया गया है, लेकिन क्या आप जानती हैं कि इसका इतिहास सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है?

अंग्रेजों के जमाने यानी ब्रिटिश काल में जब भारत में रेल पटरियों का जाल बिछाया जा रहा था, तब सामाजिक मान्यताओं और पर्दा प्रथा को ध्यान में रखते हुए पहली बार महिलाओं के लिए अलग डिब्बे की मांग उठी थी और इसे शुरू किया गया था। आज हम आपको अपने इस लेख में व‍िस्‍तार से बता रहे हैं क‍ि ट्रेनों में लेडीज डिब्बा शुरू करने की असली वजह क्‍या थी? आइए जानते हैं-

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ट्रेनों में लेडीज डिब्बा शुरू करने का इत‍िहास

आपकाे बता दें क‍ि अंग्रेजों की हुकूमत के दौरान जब भारत में पहली बार ट्रेनें चलनी शुरू हुईं, तो उस समय का भारतीय समाज आज जैसा बिल्कुल नहीं था। उस दौरान महिलाओं का घर से बाहर निकलना और किसी गैर-पुरुष के सामने आना सामाजिक मर्यादा के खिलाफ माना जाता था। उस समय समाज में पर्दा प्रथा भी काफी कड़ाई से लागू थी।

ऐसे में जब ट्रेनों का विस्तार होने लगा, तो अंग्रेज अधिकारियों और भारतीय समाज सुधारकों के बीच यह बड़ी बहस छिड़ गई कि महिलाएं मर्यादा और पर्दा प्रथा के नियमों का पालन करते हुए ट्रेनों में कैसे सफर करेंगी? इसी बहस और सामाजिक सोच की वजह से रेलवे में महिलाओं के लिए अलग बोगियां बनाने का ख्‍याल आया।

सुरक्षा ही नहीं, पर्दे से जुड़ी थी वजह

शुरुआत में अंग्रेजों का मानना था कि अगर महिलाओं को पुरुषों के साथ एक ही बोगी में बिठाया गया, तो इससे सामाजिक नियमों का उल्‍लंघन होगा। इसलिए महिलाओं को बिना किसी संकोच के यात्रा करने का मौका देने के लिए लेडीज डिब्बों का प्रस्ताव रखा गया था।

ट्रेनों में अलग तरह से डिजाइन किए जाते थे मह‍िलाओं के कोच

बताया जाता है क‍ि उस दौरान ट्रेनों में महिलाओं के डिब्बों का डिजाइन आज के डिब्बों से काफी अलग था। उस समय कई ऐसे प्रस्ताव आए थे जिनमें बोगियों को चारों तरफ से लकड़ी या लोहे की स्क्रीन से ढकने की प्‍लानि‍ंग थी। इनमें पर्दे भी लगाए जाते थे ताकि जब महिलाएं ट्रेन में चढ़ें या उतरें, तो कोई गैर-पुरुष उन्हें देख न सके।

मह‍िलाओं के डिब्बों में दिखता था जाति और वर्ग का असर

ट्रेनों में महिलाओं के लिए अलग डिब्बे बनाने की मांग सिर्फ उन्हें पुरुषों से अलग रखने तक ही सीमित नहीं थी। उस जमाने में समाज में जात-पात और ऊंच-नीच का फर्क भी बहुत मैटर करता था। इसका असर ट्रेनों में भी साफ दिखाई देता था। ऐसा भी कहा जाता है कि अलग बोगी बनाने की मांग के पीछे एक शर्त यह थी कि अलग-अलग जातियों और अलग-अलग तबके की महिलाएं एक ही जगह बैठकर एक साथ सफर न करें।

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शर्तों के साथ मिली सफर की आजादी

महिलाओं के लिए ट्रैवल करना कभी भी इतना आसान नहीं था, उनके बाहर निकलने पर समाज की कई पाबंदियां लगी रहती थीं। उस दौर में ट्रेन से सफर करने के लिए भी महिलाओं को समाज के तौर-तरीकों और कायदों को ध्यान में रखना पड़ता था। अगर हम इतिहास को महिलाओं के नजरिए से देखें, तो पता चलता है कि आज भले ही ट्रेन का लेडीज डिब्बा महिलाओं की सुरक्षा के लिए लगता हो, लेकिन इसकी शुरुआत के पीछे समाज की पुरानी सोच, पर्दा प्रथा और कई बंदिशें जुड़ी हुई थीं।

लेडीज कोच से जुड़े कुछ फैक्‍ट्स              

हमने आपको लेड‍ीज ड‍िब्‍बे का इत‍िहास तो बता द‍िया। अब इससे जुड़ी द‍िलचस्‍प बातें भी जान लें-

  • ब्रिटिश दौर में ट्रेनों के इन लेडीज डिब्बों को आम बोलचाल और रेलवे के आधिकारिक दस्तावेजों में जनाना कोच कहा जाता था।
  • भारत में पहली ट्रेन 1853 में चली थी। हालांक‍ि, सामाजिक मांगों के बाद 1860 के दशक में ही ईस्ट इंडिया रेलवे और जीआईपीआर ने लंबी दूरी की ट्रेनों में महिलाओं के लिए अलग बोगियां जोड़नी शुरू कर दी थी।
  • उस जमाने में सिर्फ डिब्बे ही अलग नहीं थे बल्कि स्टेशनों पर महिलाओं के लिए अलग जनाना वेटिंग रूम और टिकट खरीदने के लिए अलग खिड़कियां भी बनाई जाती थीं।
  • शुरुआती दौर में अमीर या उच्च वर्ग की महिलाओं की सुविधा और प्राइवेसी का ख्याल रखने के लिए रेलवे कुछ लेडीज डिब्बों में महिला अटेंडेंट की तैनाती भी करता था।

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