मनाली एक ऐसी खूबसूरत पहाड़ी जगह है, जहां के केवल रास्ते या पहाड़ नहीं बल्कि ऐतिहासिक इमारतें भी लोगों को आकर्षित करती हैं। मनाली के पुराने हिस्सों में आज भी कुछ ऐसी इमारतें नजर आती हैं, जिन्हें देखकर आपको अंदाजा होगा कि शुरू से ही पहाड़ों में घर बनाने का तरीका मैदानी इलाकों से कितना अलग रहा है। आप भी अगर यहां घूमने गई हैं और इस जगह के सिर्फ मॉल रोड, कैफे और होटल देखकर वापस आ गई हैं, तो शायद आपने इस जगह की एक बेहद खास कहानी को मिस कर दिया है। आज के इस आर्टिकल में हम आपको विस्तार से बताएंगे कि आखिर मनाली की पुरानी इमारतें केवल लकड़ी और पत्थर से ही क्यों बनाई जाती थी?
मनाली की पुरानी इमारतें लकड़ी और पत्थर से क्यों बनती थी?
आज के घरों में जहां सीमेंट, कंक्रीट और लोहे का इस्तेमाल ज्यादा होता है वहीं हिमाचल की इस खूबसूरत पहाड़ी जगह के घरों की दीवारें स्थानीय पत्थर और मजबूत लकड़ी से बनती थी। यह सिर्फ मजबूरी में अपनाया गया तरीका नहीं था, बल्कि भूकंप से बचने के लिए भी इसे तैयार किया गया था।
- पुराने समय में कारीगरों के पास आधुनिक इंजीनियरिंग उपकरण नहीं हुआ करते थे। ऐस में निर्माण के लिए उन्हें ऐसे ऑप्शन चुनने पड़ते थे, जो उन्हें प्राकृतिक परिस्थितियों में बचा सके।
- इन तकनीकों को पहाड़ों में रहने वाले लोगों ने अपने अनुभव से विकसित किया है।
भूकंप से क्यों जोड़ा जाता है इसे?
भूकंप के दौरान जमीन हिलती है। ऐसे में अगर इमारत बहुत कठोर होगी, तो इसमें दरारें आ सकती हैं और टूट भी सकती है। इसलिए यहां लकड़ी और पत्थर से घर बनाए जाते थे।
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काठ-कुणी संरचना में बनते थे घर
प्राकृतिक परिस्थितियों से बचने के लिए पहले के समय में घर काठ-कुणी संरचना में बनते थे। इसमें पहले लकड़ी के बीम और इंटरलॉकिंग जोड़ को हल्का हिलने-डुनले की स्थिती में रखा जाता था, ताकि झटका लगने पर घर गिरे नहीं। लकड़ी के बीम वो बड़े और मोटे टुकड़े होते हैं, जो छत या फर्श पर पड़ने वाले भारी वजन को संभालने के लिए यूज होते हैं।
- इंटरलॉकिंग जोड़ में कील या पेंच का यूज नहीं होता, इसमें लकड़ी के हिस्सों को ही इस तरह से काटा जाता है कि वह एक-दूसरे में कसकर फंस जाते हैं।
इससे आप समझ गए होंगे कि पहाड़ों पर इमारतों की बनावट में कैसे मजबूती लाई जाए, उसमें कितना ध्यान रखा जाता था। भूकंप से बचने के लिए लोगों ने खुद ही ऐसी तकनीक निजात की जिससे, वह अपनी सेफ्टी कर सकें।
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