दूर तक दिखते बर्फ से ढके पहाड़, पहाड़ों पर घुप्प धुंध, सूरज की दस्तक के साथ ढलान पर छनकर आती धूप, चारों ओर दूर-दूर तक फैली हरियाली, घने देवदार के जंगल और धूमिल सुबह सब कुछ इतना सम्मोहक था कि मन वहीं कहीं बसने को बेताब हो गया। सच में, जब पहली बार शोजा गए, तो कुछ ऐसा ही महसूस हुआ था। करीब 8750 फीट की ऊंचाई पर स्थित शोजा हिमाचल प्रदेश का छोटा-सा गांव है। हिमाचल की सेराज घाटी में बसी यह जगह इतनी खूबसूरत है कि मन वहां से वापस आने का होता ही नहीं। यहां न सिर्फ शिमला और नरकंडा से जाया जा सकता है, बल्कि कुल्लू और मनाली की ओर से भी पहुंचा जा सकता है। मुझे इस जगह के बारे में एक दोस्त ने बताया था, जो जलोरी पास होते हुए शोजा पहुंचे थे। उनके बताए अनुसार ही हम शोजा पहुंचे और लकड़ी के बने एक घर में ठहरे, जिसके चारों ओर हरे-भरे जंगल ही जंगल थे।
खूबसूरत और बेमिसाल शोजा की सुबह एनर्जी बूस्ट करने वाली है और अनुभव इतना कमाल का कि आप इसे अंदर तक आत्मसात कर लेंगे। ब्रेकफस्ट के बाद बस दूर-दूर तक वॉक करना, घास के मैदानों तक यूं ही निकल जाना, घने जंगल वाले पहाड़ी ढलान का रोमांचक अनुभव और देवदार की एक लय, यह सब पहले कभी देखी नहीं थी। शोजा की पहली सुबह हम गेस्टहाउस के आस-पास ही निकल गए। यहां एक छोटा-सा लकड़ी का मंदिर था, जिसके पास मैदान भी था। यहीं हमने दर्शन किए और ढलान पर आराम किया। वहां बैठे हुए ऐसा महसूस हो रहा था, मानो वह जगह सिर्फ हमारे लिए ही हो। देवदार के पेड़ों से घिरी वह जगह आज भी ज़ेहन में बसी है।
जलोरी पास
अगली सुबह हमने जलोरी पास जाने के बारे में सोच रखा था, तो सुबह-सुबह नाश्ता करके सीधे वहीं निकल गए। शोजा से 5 किलोमीटर की दूरी पर जलोरी पास था, जो करीब 10500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह ड्राइव कमाल की और एकदम चढ़ाई वाली थी। हम वहां सितंबर के महीने में गए थे, फिर भी हमें सेराज घाटी से बादल से ढके पहाड़ साफ दिख रहे थे। टॉप पर से पूरा दृश्य शानदार और कमाल का था। यहां से हिमालय का खूबसूरत दृश्य साफ-साफ दिखता है। ऐसा अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य देखने का अवसर बड़े संयोग से मिलता है। हमने अपने साथ थोड़ा खाने का सामान रखा था, तो वह खाया, क्योंकि भूख काफी लग रही थी। जलोरी पास से रोड सैन्ज और शिमला तक जाती है। रोड के साथ-साथ सतलज बहती रहती है। यहीं पर रघुपुर किला और सेरोल्सर लेक भी है। यहीं पर दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर की फिल्म 'ये जवानी है दीवानी की शूटिंग हुई थी।
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तीर्थन घाटी
तीर्थन घाटी शोजा से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां का ठंडा और शांत माहौल एडवेंचर प्रेमियों और स्व की तलाश में रहने वाले लोगों के लिए आदर्श है। यहीं पर तीर्थन नदी बहती है, जो जंगल के बीचोंबीच स्थित है। नदी की आवाज़ सुनना और छोटे पत्थरों पर इसका पानी गिरने से होने वाली आवाज़ मन को शांत करती है। यहां लोग फिशिंग का लुत्फ भी उठाते हैं।
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रघुपुर किला
इस प्राचीन किले के अवशेष अभी भी यहां हैं। यह एक ऐतिहासिक जगह है। इसके बारे में कहा जाता है कि इसे मंडी के शासकों ने खुद की सुरक्षा के लिए बनवाया था। इस किले की बाहरी दीवार अब तक बिलकुल सही है। इसकी ऊंचाई करीब 11700 फीट पर है। जलोरी पास से यहां पहुंचने के लिए 3 किलोमीटर की ट्रैकिंग करनी पड़ती है, जो कठिन, लेकिन बहुत रोमांचक है। पैदल जाने पर इस दूरी को पूरा करने में हमें करीब डेढ़ घंटे का समय लग गया था। किले के ठीक नीचे हिमालय का विहंगम दृश्य इतना आकर्षित कर रहा था कि कुछ और देखने का मन ही नहीं किया।
सेरोल्सर लेक
रघुपुर किले को अंदर से देखने का समय ज़्यादा नहीं बचा था, क्योंकि हमें सेरोल्सर लेक भी जाना था। सेरोल्सर लेक के ट्रैक को पूरा करने में लगभग 2 घंटे लग गए थे, जो 5 किलोमीटर जंगल के अंदर था। पूरा रास्ता इतना खूबसूरत कि मोबाइल फोन का कैमरा थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। शुरुआत का रास्ता बहुत ऊंचा था, जिस पर चढऩे में मुझे बहुत दिक्कत हुई, लेकिन थोड़ी देर बाद रास्ता बराबर हो गया था, तो मेहनत कम लगी। चारों ओर ओक के पेड़ झूलते हुए मानो स्वागत करने को आतुर थे। सेरोल्सर लेक एक छोटी-सी झील थी, लेकिन इसकी खूबसूरती को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यह जगह बिलकुल किसी फिल्मी दृश्य सरीखी थी, जो कैंपिंग के लिए एकदम परफेक्ट थी। पूरा वातावरण ऐसा था कि पलक झपकाने का मन ही नहीं हो रहा था। बादल नीचे आते लग रहे थे और हलकी धुंध पूरे आकाश को अपने आगोश में करने को बेताब।
वॉटरफॉल पॉइंट
यह जगह शोजा से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर है। यहां पानी की कलकल बहती आवाज़ न सिर्फ आंखों को, बल्कि मन को भी सुकून देती है। इस बीच ठंडी हवा और पानी की आवाज़ एक साथ मिलकर इतना मद्धम संगीत बजाने लगती है कि गुनगुनाने का मन हो जाता है। पत्थरों से छनकर नीचे आता पानी कमाल का संगीत पैदा करता है। आप यहां घंटों बिना कुछ किए पानी में पैर डालकर बैठ सकते हैं। यहां शानदार तस्वीरें लेने का मोह हम नहीं छोड़ पाए।
वहां से वापस आकर गर्मागर्म चाय और बोनफायर से स्वागत किया गया। वह दिन स्वादिष्ट डिनर और सुकून भरी नींद के साथ बीता। हमने सूर्यास्त देखने की कोशिश की, लेकिन तब तक बादल आ चुके थे और हलकी बूंदा-बांदी भी शुरू हो चुकी थी।
कब जाएं
शोजा जाने का सबसे बढिय़ा मौसम गर्मियां है। इस समय यहां सेब से लदे पेड़ भी दिख जाएंगे, जो अगस्त और सितंबर में कलेक्ट किए जाते हैं। नवंबर से मार्च तक मौसम बहुत ठंड रहता है। वैसे अप्रैल से अक्टूबर का महीना शोजा जाने के लिए परफेक्ट है। शोजा शिमला से करीब 230 और दिल्ली से 600 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
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