बटर का नाम सुनते ही गर्म पराठे, टोस्ट, ब्रेड या पावभाजी की ही याद आ जाती है। लगभग सभी घरों में मक्खन का खूब इस्तेमाल किया जाता है। ये तो हम सभी जानते हैं कि मक्खन को दूध से ही बनाया जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब दूध सफेद होता है तो बटर का कलर पीला कैसे हो जाता है? कई लोगों को लगता है कि किसी मिलावट की वजह से इसका रंग बदल जाता होगा, लेकिन ऐसा नहीं है।

दरअसल, मक्खन का कलर दूध से नहीं बल्कि जो उसमें फैट होता है और गाय जो खाती है, उससे होता है। आइए जानते हैं कि क्यों मक्खन और दूध के रंग में इतना फर्क होता है।

गाय के खाने से जुड़ा है मक्खन का रंग

मक्खन का पीला रंग गाय के खाने से हो जाता है। गाय घास खाती है और इसमें बीटा-कैरोटीन नाम का एक कंपाउंड पाया जाता है। यही गाजर और कद्दू को भी कलर देने का काम करता है। जब घर यह घास खाती है तो यही तत्व उसकी बॉडी में चला जाता है और फैट में जमा होने लगता है। बाद में यही बीटा कैटोरीन फैट दूध के फैट में भी पहुंच जाता है। ऐसे में जब बटर बनाते समय दूध का फैट अलग किया जाता है तो यही पीला रंग दिखाई देने लगता है।

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दूध सफेद क्यों दिखता है?

अब आपके मन में यही सवाल आ रहा होगा कि अगर दूध में भी बीटा कैरोटीन होता है तो इसका रंग सफेद कैसे होता है? दरअसल, दूध में पानी की मात्रा ज्यादा होती है। साथ ही फैट यानी मलाई के बहुत ही बारीक हिस्से इसमें घुले होते हैं। ऐसे में जब रोशनी दूध पर आती है तो ये बारीक हिस्से रोशनी को चारों तरफ फैला देते हैं जिससे दूध एकदम सफेद नजर आने लगता है।

इसका मतलब साफ है कि दूध का हल्का पीला रंग इसी सफेदी के पीछे छिप जाता है, लेकिन जब मक्खन निकालने के लिए दूध को मथा जाता है तो उसका फैट अलग होकर ही मक्खन बनता है। ऐसे में फैट का असली रंग ही मक्खन पर नजर आने लगता है।

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हर मक्खन का रंग एक जैसा क्यों नहीं होता है?

अगर आपने अलग-अलग जगहों का मक्खन देखा हो तो समझ आया होगा कि कुछ मक्खन ज्यादा पीले होते हैं, जबकि कुछ के रंग थोड़े हल्के होते हैं। इसके पीछे भी गाय का खाना ही जिम्मेदार है। गर्मियों और बरसात में गायों को ताजी हरी घास ज्यादा मिलती है। ऐसे समय में मक्खन का रंग थोड़ा ज्यादा पीला हो सकता है। वहीं सर्दियों में जब गायों को सूखा चारा दिया जाता है तो मक्खन का रंग थोड़ा हल्का हो जाता है।

कुछ जगहों पर मिलाया जाता है रंग

दुनिया के कुछ देशों में मक्खन को हमेशा एक ही कलर का दिखाने के लिए उसमें अलग से कलर भी मिलाया जाता है। हालांकि सभी मक्खन में ऐसा नहीं किया जाता है। कई ब्रांड और घरेलू मक्खन पूरी तरह नेचुरल कलर के भी होते हैं।

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मक्खन का इतिहास भी है काफी पुराना

मक्खन कोई नया प्रोडक्ट नहीं है। माना जाता है कि हजारों साल पहले भी लोग मक्खन बनाते और खाते थे। जब इंसानों ने गाय, बकरी और भेड़ जैसे जानवर पालने शुरू किए, तब वे दूध को जमा करके रखते थे। जब वे कहीं जाते थे तो दूध लगातार हिलता रहता था। गर्म मौसम और लगातार हिलने की वजह से दूध का फैट अलग होने लगता था और धीरे-धीरे मक्खन बन जाता था। ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन मेसोपोटामिया और मिस्र जैसी सभ्यताओं में भी लगभग 2000 ईसा पहले मक्खन का इस्तेमाल किया जाता था।

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तो अगर अभी तक आपको भी यही लग रहा था कि बटर में कलर मिलाए जाने की वजह से इसका रंग पीला होता है, तो हमने इसके बारे में आपको विस्तार से जानकारी दी है। साथ ही अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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