आज ऑफिस जाने वाले ज्यादातर लोगों के बैग में टिफिन बॉक्स जरूर मिलता है। सुबह घर से खाना पैक करना, दोपहर में कलीग के साथ बैठकर खाना और फिर खाली डिब्बे को वापस घर लाना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऑफिस में टिफिन ले जाने की परंपरा आखिर शुरू कैसे हुई और स्टील के डब्बे से पहले लोग क्या लेकर जाते थे? हमने एक 'कहां से आया?' नाम की सीरीज शुरू की है, जिसके अंतर्गत हम आपको खानपान से जुड़ी चीजों का इतिहास बताएंगे।
दरअसल, भारत में ऑफिस टिफिन का चलन 19वीं सदी में तेजी से बढ़ा। दिलचस्प बात यह है कि आज घर-घर में इस्तेमाल होने वाले टिफिन की कहानी अंग्रेजी के एक पुराने शब्द से भी जुड़ी है।
क्या है टिफिन का इतिहास?
टिफिन शब्द की जड़ें अंग्रेजी बोलचाल में मिलती हैं। माना जाता है कि यह 18वीं सदी के ब्रिटिश शब्द 'Tiffing' से निकला। इस शब्द का इस्तेमाल हल्के नाश्ते या भोजन के बीच कुछ पीने के लिए किया जाता था। जब अंग्रेज भारत आए, तो गर्मी में दोपहर के समय भारी भोजन करना मुश्किल होता था। इसलिए लोगों ने हल्का भोजन करना शुरू किया। इसी हल्के भोजन के लिए 'टिफिन' शब्द का इस्तेमाल फेमस होने लगा। धीरे-धीरे भारत में भी यह शब्द दोपहर के खाने के लिए इस्तेमाल होने लगा और लोग टिफिन ले जाने लगें।
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ऑफिस की नौकरी ने बढ़ाई टिफिन की जरूरत
19वीं सदी के मध्य से पहले भारत में बहुत से लोग घर पर ही भोजन करते थे, लेकिन ब्रिटिश शासन के दौरान सरकारी कार्यालयों और कारखानों की संख्या बढ़ने लगी। इन जगहों पर काम के निश्चित घंटे और अनुशासित दिनचर्या लागू होने लगी। ऐसे में कर्मचारियों के लिए दोपहर में घर जाकर खाना खाना संभव नहीं हो पाता था। लगातार काम करने की व्यवस्था के कारण लोगों को अपना भोजन साथ लाने की जरूरत महसूस हुई।
इस बदलाव ने घर से खाना पैक करके ले जाने की आदत को बढ़ावा दिया। धीरे-धीरे यह परंपरा भारतीय कामकाजी जीवन का हिस्सा बन गई। हालांकि, भारत में खाना एक जगह से दूसरी जगह ले जाने की परंपरा इससे कहीं पुरानी थी।
स्टील के टिफिन से पहले किसमें ले जाते थे खाना?
आज स्टेनलेस स्टील के टिफिन बॉक्स आम हैं, लेकिन पहले लोग भोजन ले जाने के लिए कई तरह के बर्तनों और साधनों का इस्तेमाल करते थे। आइए जानते हैं।
1. पीतल और तांबे के भारी डिब्बे
स्टील के टिफिन फेमस होने से पहले पीतल और तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता था। पीतल के कई बर्तनों के अंदर टिन की परत चढ़ाई जाती थी, ताकि भोजन का धातु के साथ सीधा संपर्क कम हो। साथ ही ये बर्तन वजन में काफी भारी होते थे और इनकी सफाई व देखभाल करना भी जरूरी था।
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2. मिट्टी की हांडियों में ले जाते थे भोजन
पुराने समय में कुछ ग्रामीण इलाकों में लोग मिट्टी के छोटे बर्तनों का इस्तेमाल करते थे। इन बर्तनों के मुंह को कपड़े से बांधकर उन्हें सेफ रखने की कोशिश की जाती थी। कुछ जगहों पर बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर रस्सी से बांधा जाता था। इस तरह भोजन की अलग-अलग चीजों को अलग रखना आसान हो जाता था।
3. सूती कपड़े की पोटली में रोटियां
किसानों, मजदूरों और खेतों में काम करने वाले लोगों के लिए कपड़े की पोटली भोजन ले जाने का एक आसान तरीका थी। रोटियां, सूखी सब्जी, प्याज और अचार जैसी चीजों को साफ सूती कपड़े या गमछे में बांध लिया जाता था। दोपहर में काम के बीच किसी पेड़ की छांव में बैठकर इसी पोटली को खोलकर खाना खाया जाता था। सत्तू और चिवड़ा जैसी सूखी चीजें भी कपड़े या दूसरे थैलों में ले जाई जाती थीं।
कैसे आया 4 मंजिलों वाला टिफिन बॉक्स?
समय के साथ बर्तनों के निर्माण में बढ़ोतरी हुई और भोजन को अलग-अलग खानों में रखने वाले डिब्बे ज्यादा उपयोगी साबित होने लगे। पीतल, तांबे और बाद में एल्युमिनियम से बने बर्तनों के साथ कई हिस्सों वाले डिब्बों का इस्तेमाल बढ़ा।
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इनकी बनावट के पीछे रोजमर्रा की जरूरत थी। भारतीय भोजन में अक्सर रोटी, चावल, दाल और सब्जी जैसी कई चीजें एक साथ होती हैं। अलग-अलग हिस्सों में खाना रखने से इनके आपस में मिलने या गीली सब्जी से रोटी के नरम पड़ने की समस्या कम हो सकती थी।
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