कहा जाता है कि चंदेरी, भगवान श्रीकृष्ण की बुआ श्रुति के पुत्र शिशुपाल की राजधानी थी। उस समय इसका उल्लेख चेदी राज्य के रूप में आता है। इतिहासकार अलबरूनी एवं इब्नबतूता ने भी अपने लेखन में चंदेरी की समृद्धि एवं महत्व का वर्णन किया है। उन्होंने इस शहर का वर्णन लोगों और सामान से भरे बड़े बाजारों से सुसज्जित एक विशाल शहर के रूप में किया है।

चंदेरी ने यह प्रतिष्ठा मध्य भारत के व्यापार मार्गों, गुजरात के प्राचीन बंदरगाहों के साथ-साथ मालवा, मेवाड़ और दक्कन से अपनी निकटता के कारण प्राप्त की। इसके अलावा, इसकी रणनीतिक स्थिति भी समृद्धि का बड़ा कारण रही, जो दिल्ली के सुल्तानों के समय से दक्षिण की ओर जाने वाली सेनाओं के लिए एक प्रकार का आधार शिविर बना रहा।

कभी 'चंद्रगिरि' कहा जाने वाला चंदेरी, मालवा और बुंदेलखंड की सीमा पर बसा है और इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। यहां बुंदेल राजपूतों और मालवा के सुल्तानों द्वारा बनवाई गई अनेक इमारतें देखी जा सकती हैं। नदी किनारे गुफाओं में बने शैलचित्र इसके सांस्कृतिक वैभव और कलात्मक सौंदर्य का परिचय देते हैं। शैलचित्रों को देखकर कहा जा सकता है कि चंदेरी प्रागैतिहासिक काल से ही एक जीवंत शहर रहा है। वहीं, चंदेरी साड़ियों से तो हम सभी परिचित हैं, जो अपनी नफासत और शिल्प के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।

चंदेरी में कहां घूमें?

  • कोशक महल: 15वीं शताब्दी में खिलजी वंश के शासनकाल के दौरान निर्मित यह महल इस्लामी वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। चतुर्भुज आकार में निर्मित इस त्रि-स्तरीय महल के विशाल द्वार, खुले गलियारे और झरोखे इसकी स्थापत्य कला को अनुपम बनाते हैं। महल की छत से दिखने वाले प्राकृतिक दृश्य इसकी शोभा दोगुनी कर देते हैं। इस इमारत के हर कक्ष की छत का डिजाइन अनोखा है और चौकोर आकार के चारों हिस्सों की खिड़कियों पर की गई नक्काशी भी अलग-अलग है। शुरुआत में सात मंजिला इमारत के रूप में योजनाबद्ध, यह ढांचा केवल तीन मंजिलों तक ही पूरा हो पाया।

  • चंदेरी किला: शहर से 71 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह किला, जो अब भी शान से खड़ा है, निश्चित रूप से कभी किसी अभेद्य दुर्ग की तरह रहा होगा। यह किला 5 किलोमीटर लंबी दीवार से घिरा हुआ है। किले पर पहुंचने के लिए तीन रास्ते हैं: पहला पक्का रास्ता है, जिससे वाहन द्वारा किले के ऊपर तक जा सकते हैं। दूसरा रास्ता खूनी दरवाजे से है, जहां से पैदल पहुंचा जा सकता है। खूनी दरवाजे में लकड़ी का विशाल द्वार है। इस प्रवेश द्वार की रचना घुमावदार है ताकि शत्रु सेना के घुड़सवार या पैदल सैनिक सीधे प्रवेश न कर सकें। खूनी दरवाजे पर मालवा के सुल्तान कैदियों के शवों को लटका देते थे। कहा जाता है कि जब बाबर ने किले की घेराबंदी की थी, तो यह सचमुच खून से नहा गया था। इसे अंतिम किला कहा जाता था, यानी जब शासक को पता होता था कि उसकी हार निश्चित है, तो वे यहीं से युद्ध करते थे ताकि तहखाने से निकलकर सुरक्षित जा सकें।

  • बत्तीसी बावड़ी: गोल, चौकोर और समकोण बावड़ियों से भरे इस नगर में अफगान वास्तुकला की निशानी है चार मंजिला घाटों से सजी बत्तीसी बावड़ी। इसकी सुंदर सीढ़ियों के ऊपर, बीच में बने स्वागत द्वारों ने इसे भव्य बना दिया है। 60-60 फीट लंबी-चौड़ी यह बावड़ी आज भी पर्यटकों का ध्यान खींचती है। यहां फारसी में एक शिलालेख है, जिसका अर्थ है— "जो स्वर्ग की एक झलक देखना चाहता है, वह यहां आकर थोड़ा विश्राम करे, क्योंकि स्वर्ग इसी के समान है।"

  • कटी घाटी: यह प्रवेश द्वार एक विशाल चट्टान को तराश कर बनाया गया है। चंदेरी के दक्षिणी किनारे पर स्थित यह मार्ग बुंदेलखंड और मालवा के बीच एक कड़ी का काम करता था। इस फाटक को मालवा के सुल्तान ग्यासुद्दीन खिलजी के स्वागत के लिए रातों-रात तैयार करना था। घोषणा की गई कि जो भी राजमिस्त्री एक रात में यह फाटक तैयार कर देगा, उसे इनाम दिया जाएगा। अगली सुबह, चंदेरी के तत्कालीन गवर्नर शेर खान का बेटा जिमन खान प्रवेश द्वार बना देखकर हैरान रह गया। हालांकि, उसमें दरवाजे के कुंडे या टिकाव के लिए जगह नहीं छोड़ी गई थी। जिमन खान ने इस कमी का बहाना बनाकर उस मिस्त्री को मेहनताना देने से इनकार कर दिया, जिसने इस लगभग असंभव कार्य को पूरा किया था। इससे दुखी होकर मिस्त्री ने आत्महत्या कर ली और आज तक यह कटी घाटी गेट बिना दरवाजे के ही खड़ा है।

  • शहजादी का रोजा: यह मकबरा चंदेरी के गवर्नर की बेटी मेहरुनिस्सा और एक सेनापति के अमर प्रेम का प्रतीक है। इसे 15वीं शताब्दी में गवर्नर ने ही बनवाया था। गवर्नर ने दोनों को अलग करने के लिए सेनापति को युद्ध में भेजा और सैनिकों को निर्देश दिए कि वह जीवित वापस न लौटे। यह जानकर शहजादी ने रोजे रखे। घायल होने के बावजूद सेनापति बच गया और चंदेरी लौट आया। मेहरुनिस्सा जब उससे मिली, तब वह अपनी अंतिम सांसें ले रहा था। मेहरुनिस्सा ने भी उसी क्षण अपने प्राण त्याग दिए। शहजादी के रोजा रखने के कारण इस मकबरे का नाम 'शहजादी का रोजा' पड़ा। गवर्नर ने बाद में दोनों प्रेमियों को इसी मकबरे में एक साथ दफनाया।

यात्रा से जुड़ी जानकारी

  • कैसे जाएं: निकटतम रेलवे स्टेशन ललितपुर है। इसके अलावा भोपाल एयरपोर्ट से कैब लेकर भी यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है।
  • क्या खाएं: बुंदेली व्यंजनों का स्वाद लें, जैसे दाल बाफला, मक्के की रोटी, रसखीर और सूजी के लड्डू।
  • कब जाएं: चंदेरी घूमने का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से मार्च के बीच है।
  • क्या खरीदें: प्रसिद्ध चंदेरी साड़ियां, दुपट्टे और स्टोल।
  • बजट: दो व्यक्तियों के लिए एक दिन के रहने और खाने का अनुमानित खर्च 2.5 से 3 हजार रुपये है। 
  • मौसम का तापमान: अधिकतम 40 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 5 से 20 डिग्री सेल्सियस तक रहता है।

यादगार अनुभव

जिन दिनों मैं चंदेरी की यात्रा पर थी, वहां 'चंदेरी ईको रिट्रीट फेस्टिवल' चल रहा था। उस उत्सव को करीब से अनुभव करने के लिए मैं वहां बनी टेंट सिटी में एक दिन रुकी। इस उत्सव में चंदेरी की ऐतिहासिक धरोहर, पारंपरिक बुनाई, कला और पर्यटन को एक भव्य मंच पर प्रस्तुत किया गया था। चंदेरी की पारंपरिक बुनाई को समर्पित फैशन एवं संगीत समारोह वास्तव में देखने लायक था। वहां रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रोमांचक गतिविधियों के साथ-साथ बुंदेलखंड के पारंपरिक स्वाद का आनंद लेने का मौका मिला।

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लेखक- सुमन बाजपेयी

Images: magnific/sakhi

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