सोशल मीडिया के इस दौर में सुंदरता और स्किन केयर से जुड़े शब्द 'बोटोक्स' का नाम लगभग हर किसी ने सुना है। चेहरे की झुर्रियों को कम करने के लिए पहचाना जाने वाला बोटोक्स आज भारत के ब्यूटी और वेलनेस फील्ड का एक अहम हिस्सा बन चुका है। बोटोक्स को लेकर लोगों के मन में कई तरह की गलतफहमियां भी हैं। अधिकांश लोग मानते हैं कि इसकी खोज चेहरे को सुंदर बनाने के लिए ही हुई थी, जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। एक जानलेवा जहर से लेकर दुनिया के सबसे पसंदीदा ब्यूटी ट्रीटमेंट बनने तक का बोटोक्स का सफर बेहद दिलचस्प और अलग है। जानते हैं, इनके बारे में...
बोटोक्स की खोज कैसे हुई?
बोटोक्स की शुरुआत 18वीं सदी के अंत में हुई थी। साल 1895 में बेल्जियम के वैज्ञानिक एमिल वैन एरमेंगम ने 'क्लोस्ट्रीडियम बोटुलिनम' (Clostridium botulinum) नामक जीवाणु की पहचान की। यह जीवाणु बोटुलिनम टॉक्सिन पैदा करता है, जो एक बेहद खतरनाक न्यूरोटॉक्सिन है। उस समय यह खराब खाने से होने वाली गंभीर बीमारी 'बोटुलिज्म' का कारण बनता था। यह जहर शरीर की नसों के संकेतों को रोककर मांसपेशियों को पैरालाइज कर देता था।
मेडिकल फील्ड में बोटोक्स का प्रवेश
दशकों तक वैज्ञानिक इस जहर का अध्ययन केवल बीमारियों से बचाव के लिए करते रहे। 1970 के दशक में सैन फ्रांसिस्को के नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. एलन स्कॉट ने मांसपेशियों के इलाज के लिए इस टॉक्सिन का टेस्ट शुरू किया। उन्होंने पाया कि इसकी थोड़ी सी खुराक आंखों के तिरछेपन का इलाज कर सकती है। डॉ. स्कॉट ने इस दवा को 'ऑकुलिनम' नाम दिया।
वर्ष 1989 में अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने आंखों के तिरछेपन और पलकों के अनियंत्रित झपकने के इलाज के लिए इसे मंजूरी दी। इसके बाद फार्मास्युटिकल कंपनी 'एलेर्गन' ने इसके अधिकार खरीद लिए और इसका नाम बदलकर 'बोटोक्स' (BOTOX) रख दिया।
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कॉस्मेटिक फील्ड में बोटोक्स की शुरुआत
बोटोक्स का सुंदरता के लिए इस्तेमाल कोई प्लानिंग नहीं थी। 1990 के दशक की शुरुआत में कनाडाई नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. जीन कारूथर और उनके पति व त्वचा विशेषज्ञ डॉ. एलास्टेयर कारूथर ने एक अनोखी बात देखी। आंखों के ऐंठन का इलाज करा रहे मरीजों के माथे और आंखों के आसपास की झुर्रियां धीरे-धीरे गायब हो रही थीं।
इसके बाद कई टेस्ट किए गए। आखिरकार साल 2002 में एफडीए (FDA) ने आईब्रो के बीच की झुर्रियों को हटाने और कॉस्मेटिक इस्तेमाल के लिए बोटोक्स को आधिकारिक मंजूरी दे दी। इसके बाद बोटोक्स रातों-रात एंटी-एजिंग ट्रीटमेंट का माध्यम बन गया।
भारत में बोटोक्स
पश्चिमी देशों से शुरू हुआ यह ट्रेंड जल्द ही भारत पहुंच गया। शुरुआत में यह ट्रीटमेंट केवल महंगे कॉस्मेटिक क्लिनिक्स, मशहूर हस्तियों और उच्च वर्ग तक सीमित था। समय के साथ जैसे-जैसे लोगों में जागरूकता बढ़ी, सामान्य लोगों में भी इसकी एक्सेप्टेंस बढ़ने लगी। 2000 के दशक के मध्य तक विभिन्न ब्यूटी क्लीनिक और डर्मेटोलॉजिस्ट बोटोक्स की सेवाएं देने लगे।
सुरक्षा से जुड़े नियम
जैसे-जैसे बोटोक्स की मांग बढ़ी, मरीजों की सुरक्षा के लिए कड़े नियमों की जरूरत महसूस हुई। ऐसे में अच्छी बात ये है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने बोटोक्स देने वाले चिकित्सकों के लिए साफ दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
सही डॉक्टर का चुनाव क्यों जरूरी है?
जिन्हें अनुभव नहीं है, ऐसे क्लीनिकों से इलाज कराने पर गंभीर साइड इफेक्ट्स का खतरा रहता है। एक प्रमाणित और अनुभवी डॉक्टर चेहरे की मांसपेशियों की शारीरिक संरचना को अच्छी तरह समझता है। सही जगह और सही मात्रा में दिया गया इंजेक्शन जोखिम को कम करता है और बेहतर रिजल्ट देता है।
बोटोक्स के अन्य चिकित्सीय उपयोग
आज बोटोक्स का इस्तेमाल केवल चेहरे की झुर्रियां हटाने तक सीमित नहीं है। चिकित्सा विज्ञान में इसका उपयोग कई गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जा रहा है-
- क्रोनिक माइग्रेन (आधे सिर का तेज दर्द)
- अत्यधिक पसीना आने की समस्या (हाइपरहाइड्रोसिस)
- मांसपेशियों की ऐंठन और जकड़न
- ओवरएक्टिव ब्लैडर
निष्कर्ष
एक जानलेवा बैक्टीरियल टॉक्सिन से शुरू हुआ सफर आज मेडिकल और ब्यूटी वर्ल्ड की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक बन चुका है। बोटोक्स का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान किस तरह एक खतरनाक चीज को भी मानव कल्याण और सुंदरता का जरिया बना सकता है।
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