जरा सोचिए जिस जगह आपको रहना है, वही आपको सुरक्षित ना लगे, तो कैसा होगा? यही हो रहा था आकांक्षा के साथ। उसे लग रहा था कि उसके जीवन की कठिनाइयां अभी दूर नहीं हुई हैं। वो अपने पीजी से निकल कर बस स्टैंड पर चली गई। साथ में बस एक चादर लेकर वहीं बेंच पर सोने का इरादा कर लिया था आकांक्षा ने। उसे लग रहा था कि यहां पब्लिक स्पेस में कम से कम ठीक तो रहेगी। आकांक्षा ने अपने साथ पीजी का खाना भी बांध लिया था। पैसों की कमी के कारण आकांक्षा इतना सब झेल तो रही थी, लेकिन उसे अभी भी समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है। आकांक्षा ने खाना खाने के लिए डिब्बा खोला और पास ही उसे एक छोटी बच्ची दिखी। लग रहा था जैसे उसने भी काफी समय से कुछ नहीं खाया है।
आकांक्षा ने उसे अपने पास बुलाया और अपने साथ खाना खाने के लिए कहा। उस बच्ची ने जल्दी-जल्दी खाना शुरू कर दिया और लगभग खत्म होने पर थोड़ा बहुत आकांक्षा के लिए बचा दिया। उसने खाना खाया और फिर लेट गई। पर भूखे पेट कोई कैसे सो सकता है? आकांक्षा की नींद खुली, लेकिन अब उसने जो देखा, उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस लड़की को आकांक्षा ने खाना खिलाया था, वो चिल्ला रही थी। जैसे उसे कोई सपना आ रहा हो। वो लड़की अपने होश खो बैठी थी, वो चिल्लाए जा रही थी कि कुछ लोग उसे उठाकर ले जा रहे हैं। लोगों को लग रहा था कि वो पागल हो गई है। आकांक्षा ने जाकर उसकी मदद की, उसे पानी पिलाया और वो होश में आई।
आकांशा ने भी थोड़ा सा खाना खाया था तो उसे धुंधला-धुंधला कुछ दिख रहा था। पर अब वो समझ गई थी कि वो सिर्फ सोने के लिए ही खतरों से नहीं घिरी है, वो अपने पीजी का खाना भी नहीं खा सकती है। इसलिए ही शायद उस लड़की सुनैना ने भी पीजी छोड़ा। उसे इतने कम दाम में पीजी भी मिल गया और सिर्फ उसके कमरे को छोड़कर बाकी सारे कमरे भरे हुए थे। आकांक्षा के खाने में कुछ मिलाया जाता था। पर बिना खाने के रहा भी नहीं जाता। अब आकांक्षा ने फैसाल कर लिया था कि वो इस सबका भांडा फोड़कर ही रहेगी।
उसने रात भर जाकर उस लड़की पर नजर रखी कि कहीं गलती से भी उसके साथ कुछ ना हो जाए। आकांक्षा सुबह पीजी पहुंची, तैयार हुई और सीधे कॉलेज के लिए निकल गई। उसने अपनी वॉर्डन को भी कुछ नहीं बोला। उसे समझ नहीं आ रहा था कि किसपर यकीन करे और किसपर नहीं। आकांक्षा ने शाम को वापस आकर मीना से बात की। पूरे पीजी में सिर्फ वही थी जिसने आकांक्षा से बात की थी। 'मैं यहां सिर्फ तुम पर भरोसा कर सकती हूं, प्लीज मेरी मदद करो, मैं जानना चाहती हूं कि यहां होता क्या है?' आकांक्षा ने मीना से कहा।
'मैं भी जानना चाहती हूं, तुम्हारे और सुनैना से पहले मैं भी उस कमरे में गई थी, लेकिन रात में मेरी तबीयत इतनी बिगड़ी की पूरे 1 हफ्ते मुझे हॉस्पिटल में रहना पड़ा था। इसके बाद मैं किसी तरह से रूम शिफ्ट करके ठीक रही। मैं जानना चाहती हूं कि मेरे साथ क्या हुआ और उस कमरे में ऐसा है क्या?' मीना ने आकांक्षा से कहा और दोनों ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर खाने में ऐसा क्या मिल रहा है जिससे ये हो रहा है।
आज आकांक्षा ने खाना नहीं खाया और मीना ने भी बाहर से खाना मंगवाया। आकांक्षा को भूख तो लग रही थी, लेकिन उसे ये भी जानना था कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है। एक बात और सोचने वाली थी कि सिर्फ रात में ही ऐसा क्यों होता है, सुबह का खाना तो सही रहता है। मीना ने अपने लिए जो खाना मंगवाया था वही आकांक्षा के साथ भी शेयर किया। दोनों ने खाना बनाने वाली दीदी पर नजर रखनी शुरू कर दी। छुपकर वो दोनों काफी देर तक उन्हें देखती रहीं। ऐसे में देखा कि खाने में कुछ भी ऐसा नहीं डला था जिससे शक हो। खाना बिल्कुल साफ था, इसका मतलब आकांक्षा के खाने में अलग से कुछ मिलाया जाता था।
अब बारी थी खाना खाते समय देखने की। दोनों ने बहुत ही सावधानी से अपनी-अपनी प्लेट में खाना लिया, उन्हें बस किसी तरह से इस सबका पता लगाना था। दोनों ने खाना देखा और कुछ भी अलग नहीं लग रहा था। अब इनकी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर चक्कर क्या है? क्यों खाना खाने के बाद भी इन्हें कुछ नहीं हो रहा। क्या रश्मि और सलोनी को पता चल गया था कि इनका प्लान क्या है?
फिर आकांक्षा को अचानक कुछ याद आया, उसने पानी भी अपनी बोतल से ही पिया था। वही बोतल जो कमरे में रहती है, वही बोतल जिसे लेकर वो बस स्टैंड पर गई थी। उसी से तो उस छोटी बच्ची को पानी भी पिलाया था। तभी सिर्फ आकांक्षा के साथ ऐसा होता था और खाना खाने वाले बाकी लोगों को कुछ नहीं होता था।
आज आकांक्षा को पता तो चल गया था कि परेशानी किस वजह से हो रही थी, लेकिन अब वो इसे साबित कैसे करे? रश्मि और सलोनी साफ मुकर जाएंगी और उसे ही गलत साबित कर दिया जाएगा। अब आकांक्षा आगे क्या करेगी, वो जानने के लिए पढ़ें, इस कहानी का अगला भाग गर्ल्स पीजी- पार्ट 4।
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