हिंदू धर्म में भगवान शिव को कई नामों से जाना जाता है। इनमें भोलेनाथ, महादेव, शंकर और नीलकंठ समेत कई नाम हैं, जिनसे भगवान शिव के भक्त उन्हें पुकारते हैं। सावन के महीने में भोलेनाथ की विशेष आराधना की जाती है। उनके हर नाम के पीछे अलग कहानी और महत्व है। भगवान शिव का कंठ नीला है और इसलिए उन्हें नीलकंठ कहा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि इस नाम के पीछे समुद्र मंथन से जुड़ी एक बेहद महत्वपूर्ण पौराणिक कथा है। चलिए आपको बताते हैं इसके पीछे की कहानी?
भगवान शिव को क्यों कहा जाता है नीलकंठ?
मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया, तब उससे निकले भयंकर हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर लिया था। इसी वजह से उनका कंठ नीला हो गया। इस समुद्र मंथन से कई अद्भुत रत्न और चीजें निकलीं, लेकिन अमृत निकलने से पहले घातक विष निकला। इसे देखकर सभी देवता और असुर घबरा गए। कहा जाता है कि यह विष इतना घातक था कि इससे पूरी सृष्टि नष्ट हो सकती थी। इस विष को संभालना किसी के बस में नहीं था और इसलिए सभी देवताओं और असुरों ने भगवान शिव से गुहार लगाई और उनसे सृष्टि को बचाने की प्रार्थना की।
माता पार्वती ने पकड़ लिया था कंठ
भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए उस विष को पीने का निर्णय लिया। उन्होंने हलाहल विष को अपने मुंह में ले लिया। हालांकि, माता पार्वती ने उनका गला पकड़ लिया, ताकि विष उनके पेट तक न पहुंच सके। इस वजह से विष भोलेनाथ के गले में रूक गया और उनका गला नीला हो गया। तभी से उन्हें नीलकंठ महादेव के नाम से भी जाना जाने लगा।
नीलकंठ की कथा हमें क्या संदेश देती है?
यह कथा त्याग, धैर्य और दूसरों की रक्षा के भाव को भी दर्शाती है। भगवान शिव ने स्वयं कष्ट सहकर पूरी सृष्टि को विनाश से बचाया। यही वजह है कि भक्त उन्हें करुणा और त्याग के प्रतीक के रूप में भी पूजते हैं।
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