भारतीय विज्ञान जगत के इतिहास में डॉ. असीमा चटर्जी एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने पुरुष प्रधान माने जाने वाले दौर में अपनी प्रतिभा का परचम लहराया। जी हां, वह किसी भारतीय विश्वविद्यालय से 'डॉक्टर ऑफ साइंस' (D.Sc.) की डिग्री प्राप्त करने वाली पहली महिला वैज्ञानिक थीं। कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1944 में यह उपलब्धि हासिल करने वाली असीमा चटर्जी ने अपना पूरा जीवन भारतीय औषधीय पौधों, जड़ी-बूटियों और रसायनों के गहन अध्ययन में समर्पित कर दिया। वह इंडियन साइंस कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष भी चुनी गईं। हम आपको इसलिए यह सब बता रहे हैं क्योंकि हमने 'Her Story: महिलाएं जिन्होंने बदल दी दुनिया' नाम की एक सीरीज शुरू की है। इसी कड़ी में हम रोजाना ऐसी ही महिलाओं के बारे में बताएंगे। आज हम आपको असीमा चटर्जी की कहानी बताने जा रहे हैं। आइए जानते हैं...
विज्ञान और शोध के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 'पद्म भूषण' से नवाजा। इसके अलावा उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, सी.वी. रमन पुरस्कार और पी.सी. राय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
शुरुआती जीवन और शिक्षा का सफर
असीमा चटर्जी का जन्म 23 सितंबर 1917 को कोलकाता में हुआ था। वह अपने पिता डॉ. इंद्रनारायण मुखर्जी की बड़ी संतान थीं। बचपन से ही उन्हें पढ़ाई-लिखाई में गहरी रुचि थी।
- 1936 में उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) में स्नातक किया और 'वासंती दास स्वर्ण पदक' प्राप्त किया।
- 1938 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में स्नातकोत्तर (M.Sc.) की पढ़ाई पूरी की, जहां उन्हें रजत पदक और जोगमाया देवी स्वर्ण पदक मिला।
- उन्होंने भारत में प्राकृतिक उत्पादों पर शोध करने वाले वैज्ञानिक प्रोफेसर प्रफुल्ल कुमार बोस के मार्गदर्शन में अपना रिसर्च करियर शुरू किया।
विदेश में अध्ययन और वैज्ञानिकों के साथ काम
1940 में असीमा चटर्जी लेडी ब्रेबॉर्न कॉलेज, कोलकाता में केमिस्ट्री डिपार्टमेंट की संस्थापक विभागाध्यक्ष बनीं। 1947 में वह आगे के अध्ययन के लिए अमेरिका गईं।
- यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन: यहां उन्होंने प्रोफेसर एल.एम. पार्क के साथ प्राकृतिक ग्लाइकोसाइड्स पर काम किया।
- कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (Caltech): यहां प्रोफेसर एल. जेकमाइस्टर के साथ कैरोटीनॉयड और प्रोविटामिन-ए पर शोध किया, जिसके लिए उन्हें 'वातुमुल फेलोशिप' मिली।
- ज्यूरिख विश्वविद्यालय: नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर पी. करर के साथ उन्होंने बायोलॉजिकल एक्टिव इंडोल अल्कलॉइड्स पर काम किया, जो आगे चलकर उनके जीवनभर के शोध का मुख्य विषय बना।
विदेशी दौरों के दौरान उन्होंने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता प्रोफेसर लिनस पॉलिंग और भारत में मॉडर्न बायोकेमिस्ट्री के जनक कहे जाने वाले प्रोफेसर बी.सी. गुहा जैसे महान वैज्ञानिकों के साथ भी कार्य किया।
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शोध का चुनौतीपूर्ण दौर
भारत लौटने के बाद असीमा चटर्जी ने संसाधनों की भारी कमी के बावजूद अपना शोध जारी रखा। उन दिनों न तो आज की तरह आधुनिक प्रयोगशालाएं थीं और न ही बड़ी सरकारी वित्तीय सहायता उपलब्ध थी। उनके पीएचडी छात्र रहे डॉ. एस.सी. प्रकाशी बताते हैं कि उन दिनों यूनिवर्सिटी की लैब में बेसिक उपकरण और केमिकल्स तक नहीं होते थे।
पौधों को पीसने के लिए शोधकर्ताओं को दूर जादवपुर यूनिवर्सिटी की वर्कशॉप में जाना पड़ता था। स्पेक्ट्रल एनालिसिस और यूवी मेजरमेंट के लिए पास के बोस इंस्टीट्यूट की लैब का सहारा लेना पड़ता था। कई बार रिसर्च के लिए केमिकल्स और थीसिस भेजने का खर्च तक खुद गाइड और छात्रों को अपनी जेब से उठाना पड़ता था। इस कठिन समय में उन्हें प्रोफेसर सत्येंद्र नाथ बोस, मेघनाद साहा और सर जे.सी. घोष जैसे वैज्ञानिकों का पूरा समर्थन मिला।
असीमा चटर्जी का जीवन
1945 में उनका विवाह प्रसिद्ध फिजिकल केमिस्ट डॉ. बरदानंद चटर्जी से हुआ, जो बाद में बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज के उपाध्यक्ष बने। उनकी एक बेटी हुई, जिसका नाम जूली रखा गया। असीमा जी के जीवन में उनके पति का बहुत बड़ा योगदान था।
असीमा चटर्जी गृहस्थी और शोध के बीच अद्भुत संतुलन बनाकर रखती थीं। वह सुबह जल्दी उठकर खाना बनाने सहित घर के सारे काम निपटाकर विश्वविद्यालय जाती थीं और देर रात लौटने के बाद फिर घर के कामों में लग जाती थीं।
1967 का साल उनके जीवन में बहुत दुखद रहा। केवल चार महीनों के भीतर उन्होंने अपने पिता और पति दोनों को खो दिया। इस दोहरे आघात के कारण उन्हें गंभीर दिल का दौरा पड़ा और वह महीनों तक अस्पताल में भर्ती रहीं। बेलूर मठ के स्वामी अभयानंद जी महाराज के आशीर्वाद, अपने छात्रों और सहकर्मियों के अगाध प्रेम की वजह से वह इस मानसिक अवसाद से बाहर आ सकीं।
उपलब्धियां और समाज सेवा
असीमा चटर्जी ने लगभग 60 वर्षों तक लगातार शोध किया। उनके शोध पत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हुए, जिन्हें दुनिया भर के वैज्ञानिक टेक्स्टबुक्स में शामिल किया गया।
- कैंसर और मिर्गी की दवाएं: उन्होंने भारतीय पौधों से 'आयुष-56' (मिर्गी की दवा) और मलेरिया रोधी औषधियां विकसित करने में अहम भूमिका निभाई।
- बंगाली में विज्ञान लेखन: प्रोफेसर सत्येंद्र नाथ बोस के अनुरोध पर उन्होंने माध्यमिक स्कूल के छात्रों के लिए बंगाली में 'सराई माध्यमिक रसायन' नामक पुस्तक लिखी।
- भारतीय औषधीय पौधों पर ग्रंथ: उन्होंने 'द ट्रीटाइज ऑन इंडियन मेडिसिनल प्लांट्स' को 6 खंडों में संपादित और प्रकाशित किया।
- राज्यसभा सदस्य: उनकी वैज्ञानिक सेवाओं को देखते हुए भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें 1982 से 1990 तक राज्यसभा का सदस्य नामांकित किया।
निष्कर्ष
डॉ. असीमा चटर्जी का जीवन कड़े परिश्रम और इच्छाशक्ति की मिसाल है। उन्होंने साबित किया कि अगर संकल्प मजबूत हो तो संसाधनों की कमी भी सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती।
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Images: magnific
