इतिहास के पन्नों में कई ऐसे नाम छिपे हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते-लड़ते खुद को अमर कर लिया। हम बात कर रहे हैं रानी अब्बक्का की, जिन्हें स्थानीय लोग 'अब्बक्का महादेवी' के नाम से पूजते हैं। कर्नाटक में मंगलुरु के पास उल्लाल का खूबसूरत समुद्री तट केवल अपनी लहरों के लिए ही नहीं, इस वीरांगना की गाथा के लिए भी प्रसिद्ध है। जब भी भारतीय इतिहास में महिला योद्धाओं का जिक्र होता है, तो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम सबसे पहले आता है, लेकिन उनसे लगभग 300 साल पहले ही उल्लाल की इस जांबाज रानी ने विदेशी ताकतों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। रानी अब्बक्का भारत की उन शुरुआती योद्धाओं में से एक थीं, जिन्होंने पुर्तगाली सेना के खिलाफ स्वतंत्रता का बिगुल फूंका था।

साहस और युद्ध कौशल की धनी

तुलुनाडू साम्राज्य के उल्लाल राज्य की रानी अब्बक्का बचपन से ही असाधारण प्रतिभा की धनी थीं। उनके पिता ने उनकी रणनीतिक सोच और सैन्य कुशलता को पहचानकर उन्हें तीरंदाजी तथा तलवारबाजी में पारंगत किया। इतिहास के अनुसार, 1530 से 1599 के बीच पुर्तगालियों से लड़ने वाली तीन अब्बक्का (मां और दो बेटियां) थीं, लेकिन लोककथाओं में उन्हें एक ही अमर किरदार 'रानी अब्बक्का' के रूप में याद किया जाता है।

रानी अब्बक्का अपनी सादगी के लिए जानी जाती थीं। वे एक आम महिला की तरह साधारण वस्त्र पहनती थीं, लेकिन जब घोड़े पर सवार होकर मैदान में उतरती थीं, तो दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे। माना जाता है कि युद्ध में 'अग्निवान' (आग का तीर) का इस्तेमाल करने वाली वे अंतिम योद्धा थीं।

रानी अब्बक्का को बचपन से ही एक योग्य शासक और योद्धा बनाने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया था। उन्हें घुड़सवारी, तीरंदाजी, तलवारबाजी और रणनीतिक युद्ध कलाओं की गहन शिक्षा मिली थी। कूटनीति में बेहद माहिर होने के कारण वे दुश्मनों की चालों को समय रहते भांप लेती थीं। जब उन्होंने उल्लाल का शासन संभाला, तो अपनी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता से राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बना दिया।


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पुर्तगालियों को दी करारी शिकस्त

उल्लाल की भौगोलिक स्थिति व्यापारिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण थी, जिस पर पुर्तगाली अपना कब्जा जमाना चाहते थे। जब रानी ने उन्हें कर देने से इनकार कर दिया, तो 1555 में पुर्तगाली एडमिरल ने उल्लाल पर हमला कर दिया। रानी अब्बक्का ने अपनी सूझबूझ और वीरता से इस हमले को नाकाम कर दिया।

1567 का हमला: पुर्तगाली सेनापति जोआओ पेक्सोतो ने उल्लाल पर अचानक हमला कर राजमहल पर कब्जा कर लिया। रानी ने समझदारी से काम लेते हुए एक मस्जिद में शरण ली और उसी रात मात्र 200 सैनिकों के साथ पलटवार करके सेनापति पेक्सोतो सहित 70 विदेशी सैनिकों को ढेर कर दिया।

1568 की जीत: पुर्तगाली सैनिकों की लापरवाही का फायदा उठाते हुए रानी के मुस्लिम सहयोगियों ने हमला किया और एडमिरल मैस्करेनहास को मार गिराया। इस जीत के बाद पुर्तगालियों को मंगलुरु का किला छोड़ना पड़ा।

अंतिम सांस तक संघर्ष

रानी अब्बक्का जैन धर्म की अनुयायी थीं, लेकिन उनके प्रशासन और सेना में हर धर्म व जाति के लोग शामिल थे। उनकी सेना में मछुआरा समुदाय से लेकर हिंदू और मुस्लिम सैनिक कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते थे।

जब पुर्तगालियों ने रानी के अलग हो चुके पति के साथ हाथ मिलाकर उल्लाल पर दोबारा हमला किया, तो रानी ने बीजापुर के सुल्तान और कालीकट के जमोरिन के साथ गठबंधन बनाकर मुकाबला किया। हालांकि, उनके पति द्वारा युद्ध की गुप्त नीतियां उजागर कर देने के कारण रानी अब्बक्का को बंदी बना लिया गया। जेल में भी इस वीरांगना ने हार नहीं मानी और अंतिम सांस तक लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

पुर्तगालियों का छल

रानी अब्बक्का की बढ़ती शक्ति और लोकप्रियता से पुर्तगाली बौखलाए हुए थे। रानी के पति लक्ष्मप्पा ने व्यक्तिगत रंजिश के कारण पुर्तगालियों से हाथ मिला लिया। उसने रानी की सैन्य रणनीतियों और कमजोरियों की जानकारी दुश्मनों को दे दी। इस विश्वासघात के कारण पुर्तगाली सेना ने उल्लाल पर हमला कर दिया और रानी अब्बक्का को बंदी बना लिया गया।

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जेल में विद्रोह और अंतिम सांस तक संघर्ष

बंदीगृह में भी रानी अब्बक्का का स्वाभिमानी और हौसला नहीं टूटा। उन्होंने जेल की सलाखों के पीछे रहकर भी पुर्तगाली हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की योजनाएं बनानी जारी रखीं। वे अंतिम सांस तक विदेशी ताकतों के खिलाफ संघर्ष करती रहीं और बंदी अवस्था में ही देश की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुईं।

रानी अब्बक्का का जीवन भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम पन्ना है, जिसे लंबे समय तक भुलाया गया, लेकिन आज लोक कलाओं, यक्षगान और लोक गीतों के माध्यम से उनका पराक्रम जीवित है। कर्नाटक सरकार द्वारा बेंगलुरु में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई है, जो आने वाली पीढ़ियों को इस महान वीरांगना के त्याग और देशभक्ति की याद दिलाती रहेगी।

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Images: magnific