Sanji Mata Ki Aarti: सांझी माता की आरती देवी पार्वती के एक पावन और लोक-प्रिय स्वरूप को समर्पित है, जिन्हें मुख्य रूप से शारदीय नवरात्र के दिनों में उत्तर भारत के कई क्षेत्रों जैसे उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। नवरात्र के इन नौ दिनों में माता की सुंदर आकृतियां दीवारों पर गोबर और मिट्टी से बनाई जाती हैं, जिन्हें फूलों और रंग-बिरंगे कागजों से सजाया जाता है। शाम के समय परिवार के सभी सदस्य मिलकर सांझी माता की आरती गाते हैं, जिससे घर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय और सकारात्मक हो जाता है। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से माता की आराधना करने से घर में सुख, शांति, समृद्धि और माता पार्वती का आशीर्वाद हमेशा बना रहता है। नीचे पढ़ें सांझी माता की आरती के पूरे बोल और उसका अर्थ।

सांझी माता की संपूर्ण आरती

सांझी माता की आरती भक्त संध्या के समय करते हैं। इस दौरान दीपक जलाकर यह आरती गाई जाती है, तो इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मन को शांति मिलती है। इस आरती के माध्यम से भक्त माता से यह प्रार्थना करते हैं कि वे उनके परिवार की रक्षा करें और उन्हें सदा सुखी रखें।

आरता री आरता, मेरी सांझी माई आरता!
आरता के नैन, कचाली भर आइयो,
टेढ़ी-टेढ़ी पगियो में, बीरा जी हमारे,
लंबे-लंबे घूंघट वाली, भावज हमारी।
क्या मेरी सांझी ओढेगी, क्या मेरी सांझी पहरेगी,
सोने का सीस गुनधाएगी!
जाग सांझी जाग, तेरे माथे लगे भाग,
तेरी पटियों में मांग, तेरे हाथों में सुहाग।
गोरा री गोरा, सांझी का भैया गोरा,गोरी है बहुरिया,
अस्सी तेरे फूल, पिचासी तेरे डंडे,
श्रवण तेरी डोर, मुल्तानी तेरे पलड़े।
नौ नवरात्रे देवी के, सोलह कनागत पितरों के,
उठ मेरी देवी बारंबार, खड़े हुए हम शीश झुका।
हल्दी गांठ गठीली, सबकी बहू है हठीली,
मांगे सोने का बिंदा, बिंदा मोल गया, भाभो रूठ गयी!
भैया बागों में जाइयो, एक लोधड़ा कटाइयो,
सूडा-सूड मचाइयो,
कालबली के ऊंचे पाए, नीचे पाए लेले बेटा गोद खिलाए।
गुरसल मंगल गाती आई, चिड़िया चूं-चूं करती आई,
आऊं तेरी सांझी, मांगे गेहूं, तू दे सपूती जौ, तेरे बेटा होंगे नौ!
खोल मेरी देवी, चंदन किवाड़,
मैं आई तेरे पूजनहार।
पूज-पूजन्ति क्या कुछ लाई, भैया-भतीजे सब परिवार,
भैया तेरे नौ-दस बीस, भतीजे तेरे पूरे तीस!
बोलो सांझी माई की जय!

सांझी माई की आरती की पंक्तियों का अर्थ

सांझी माई की यह आरती भारत के लोकगीतों और संस्कृति का एक बेहद सुंदर हिस्सा है, जिसे नवरात्र के दिनों में माता की प्रतिमा या आकृति के समक्ष गाया जाता है। इस लोक-आरती की पंक्तियों का सरल अर्थ नीचे दिया गया है।

आरती के बोल- आरता री आरता, मेरी सांझी माई आरता!
आरता के नैन, कचाली भर आइयो,
टेढ़ी-टेढ़ी पगियो में, बीरा जी हमारे,
लंबे-लंबे घूंघट वाली, भावज हमारी। 

अर्थ- इन शुरुआती पंक्तियों में भक्त सांझी माता की आरती (जिसे लोक भाषा में 'आरता' कहा जाता है) उतारने की अपनी परंपरा और उल्लास को व्यक्त करते हैं। इसमें घर-परिवार के सदस्यों, भाई-भाभी और पारंपरिक परिवेश का बहुत ही प्यारा और सजीव चित्रण मिलता है, जो पारिवारिक मेल-मिलाप और खुशियों का प्रतीक है।

आरती के बोल- क्या मेरी सांझी ओढेगी, क्या मेरी सांझी पहरेगी,
सोने का सीस गुनधाएगी!

अर्थ- इस हिस्से में माता के शृंगार और सजावट का वर्णन किया जाता है। भक्त आपस में या माता से भाव व्यक्त करते हैं कि माता क्या धारण करेंगी, उनका वस्त्र कैसा होगा और उनके माथे व मांग का सुहाग किस प्रकार सजाया जाएगा।

आरती के बोल- जाग सांझी जाग, तेरे माथे लगे भाग,
तेरी पटियों में मांग, तेरे हाथों में सुहाग।

अर्थ- यह पंक्तियां माता को जगाने और उनका आह्वान करने से जुड़ी हैं। भक्त माता से प्रार्थना करते हैं कि हे माता, अब आप जागृत होकर हमारे घर-परिवार पर अपनी कृपा दृष्टि बरसाएं। आपके माथे पर अच्छे भाग्य और सौभाग्य की रेखाएं सजी रहें।

आरती के बोल- गोरा री गोरा, सांझी का भैया गोरा,गोरी है बहुरिया,
अस्सी तेरे फूल, पिचासी तेरे डंडे,
श्रवण तेरी डोर, मुल्तानी तेरे पलड़े।

अर्थ- लोकगीत शैली की इन पंक्तियों में पौराणिक कथाओं के संदर्भ और पारिवारिक रिश्तों का लोक-रंग देखने को मिलता है। चूंकि सांझी माता को देवी पार्वती (गौरा) का रूप माना जाता है, इसलिए इन पंक्तियों में उनके भाई, परिवार और शृंगार की पारंपरिक वस्तुओं का उल्लेख बड़े ही सरल और आनंददायक ढंग से किया जाता है।

आरती के बोल- नौ नवरात्रे देवी के, सोलह कनागत पितरों के,
उठ मेरी देवी बारंबार, खड़े हुए हम शीश झुका।
हल्दी गांठ गठीली, सबकी बहू है हठीली,
मांगे सोने का बिंदा, बिंदा मोल गया, भाभो रूठ गयी!

अर्थ- यहां पितृ पक्ष (कनागत) और उसके तुरंत बाद आने वाले नौ दिनों के शारदीय नवरात्रों के पवित्र समय का जिक्र है। भक्त कहते हैं कि हम श्रद्धा के साथ शीश झुकाकर माता की पूजा करने आए हैं।

आरती की लाइन- भैया बागों में जाइयो, एक लोधड़ा कटाइयो,
सूडा-सूड मचाइयो,
कालबली के ऊंचे पाए, नीचे पाए लेले बेटा गोद खिलाए।
गुरसल मंगल गाती आई, चिड़िया चूं-चूं करती आई,
आऊं तेरी सांझी, मांगे गेहूं, तू दे सपूती जौ, तेरे बेटा होंगे नौ!

अर्थ- यह ग्रामीण लोक-संस्कृति से जुड़ी पंक्तियां हैं, जिनमें घर के भाई-बंधुओं को शुभ कार्यों के लिए प्रेरित करने, मंगल गीत गाने (गुरसल मंगल) और चिड़िया की तरह चहकते हुए त्योहार के माहौल का वर्णन है। अंत में माता से आशीर्वाद मांगा जाता है कि घर में सुख-समृद्धि और सुयोग्य संतानों की प्राप्ति हो।

आरती की लाइन- खोल मेरी देवी, चंदन किवाड़,
मैं आई तेरे पूजनहार।
पूज-पूजन्ति क्या कुछ लाई, भैया-भतीजे सब परिवार,
भैया तेरे नौ-दस बीस, भतीजे तेरे पूरे तीस!
बोलो सांझी माई की जय!

अर्थ- आरती के इन अंतिम और बेहद महत्वपूर्ण चरणों में भक्त माता से विनती करते हैं कि हे देवी! अपने दरबार के चंदन रूपी पवित्र द्वार खोल दीजिए, क्योंकि हम आपके पूजन के लिए पूरी श्रद्धा और अपने पूरे परिवार (भैया, भतीजे आदि) के साथ उपस्थित हुए हैं।

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