रक्षाबंधन केवल धागों का त्योहार नहीं, बल्कि विश्वास, समर्पण और सुरक्षा के अटूट संकल्प का पर्व है। समय के साथ भले ही इसके तरीके बदले हों, लेकिन इसकी भावना आज भी उतनी ही पवित्र है। सदियों से चली आ रही पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं इस बात की गवाह हैं कि रक्षासूत्र का यह बंधन हर दौर में इंसानियत और रिश्तों की रक्षा करता आया है। ऐसे में ये जानना तो बनता है कि आखिर पहली बार किसने किसे राखी बांधी और प्रथा कब से चली आ रही है? पढ़ते हैं आगे...

सबसे पहले रक्षाबंधन का त्योहार किसने मनाया था?

कुछ पौराणिक कथाओं से पता चलता है कि आखिर किसने सबसे पहले रक्षाबंधन का त्योहार मनाया- 

1. श्रीकृष्ण और द्रौपदी

महाभारत की यह घटना रक्षाबंधन के सबसे पावन प्रसंगों में से एक है। जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली कट गई और उससे रक्त बहने लगा, तो वहां मौजूद सभी लोग उपचार के लिए परेशान हो उठे। तभी द्रौपदी ने बिना एक पल गंवाए अपनी रेशमी साड़ी का किनारा फाड़ा और प्रभु की उंगली पर बांध दिया।

द्रौपदी के इस सहज स्नेह से अभिभूत होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवनभर हर संकट से बचाने का वचन दिया। आगे चलकर जब कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीर हरण करने का प्रयास किया गया, तब भगवान ने अपनी अलौकिक शक्ति से द्रौपदी की साड़ी को अनंत बनाकर उनके सम्मान की रक्षा की।

2. राजा बलि और देवी लक्ष्मी

पाताल लोक और स्वर्ग से जुड़ा यह प्रसंग बताता है कि कैसे एक रक्षासूत्र के जरिए खोया हुआ वैभव और सुरक्षा वापस पाई जा सकती है। जब दानवीर राजा बलि ने अपनी भक्ति से भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया, तो नारायण ने बलि के द्वारपाल बनना स्वीकार कर लिया। इसके चलते देवी लक्ष्मी वैकुंठ में अकेली रह गईं।

अपने पति को वापस लाने के लिए देवी लक्ष्मी एक निर्धन महिला का रूप धरकर राजा बलि के पास पहुंचीं। उन्होंने बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उनके मंगल की कामना की। जब राजा ने उन्हें उपहार मांगने को कहा, तो देवी ने अपने वास्तविक रूप में आकर भगवान विष्णु को वापस मांग लिया। बलि ने अपने वचन का मान रखते हुए नारायण को सहर्ष विदा किया।

3. संतोषी माता का प्राकट्य

गणेश पुराण के अनुसार, जब भगवान गणेश की बहन मानसा देवी अपने भाई को राखी बांधने आती थीं, तो गणेश जी के दोनों पुत्र शुभ और लाभ उदास हो जाते थे। अपनी कोई बहन न होने के कारण वे स्वयं को अधूरा महसूस करते थे।

अपने पुत्रों की इस व्याकुलता को देखकर भगवान गणेश ने अपनी दिव्य ऊर्जा से एक कन्या को उत्पन्न किया। यही कन्या आगे चलकर संतोषी माता कहलाईं। इसके बाद शुभ और लाभ ने पूरे उत्साह के साथ अपनी बहन से रक्षासूत्र बंधवाया और यह पर्व मनाया।

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4. यमराज और यमुना

पौराणिक मान्यताओं में यमराज और उनकी बहन यमुना की कथा सबसे प्राचीन मानी जाती है। वर्षों तक अपनी बहन से न मिल पाने के बाद जब यमराज उनके धाम पहुंचे, तो यमुना की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने यमराज का भव्य आदर-सत्कार किया और उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधा।

बहन के इस अगाध प्रेम से प्रसन्न होकर मृत्यु के देवता यमराज ने घोषणा की कि इस पावन तिथि पर जो भी भाई अपनी बहन से राखी बंधवाएगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा और उसकी आयु लंबी होगी।

5. सिकंदर और सम्राट पुरु

इतिहास के पन्नों में दर्ज 326 ईसा पूर्व की यह घटना बताती है कि रक्षासूत्र की मर्यादा सीमाओं से परे है। जब ग्रीस के राजा सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया, तो उनका सामना पंजाब के शूरवीर राजा पुरु (पोरस) से हुआ। सिकंदर की पत्नी रोक्साना अपने पति की सुरक्षा को लेकर अत्यंत चिंतित थीं।

भारतीय परंपराओं के बारे में जानने के बाद रोक्साना ने राजा पुरु को एक रक्षासूत्र भेजा और युद्धभूमि में अपने पति के प्राण न लेने की प्रार्थना की। राजा पुरु ने इस धागे के मान का पूरा ध्यान रखा। युद्ध के दौरान जब सिकंदर उनके सामने आया और वे प्रहार करने ही वाले थे, तभी उन्हें अपनी कलाई पर बंधा धागा याद आ गया और उन्होंने अपने हाथ रोक लिए।

6. रानी कर्णावती और शहंशाह हुमायूं

16वीं शताब्दी में मेवाड़ की महारानी कर्णावती पर जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने आक्रमण किया, तो राज्य की रक्षा के लिए महारानी ने मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजकर सहायता मांगी।

एक अलग धर्म और संस्कृति से होने के बावजूद हुमायूं ने इस धागे की पवित्रता को समझा और अपनी बहन की रक्षा के लिए विशाल सेना के साथ निकल पड़ा। हालांकि, वह समय पर नहीं पहुंच सका, लेकिन बाद में उसने बहादुर शाह को पराजित कर कर्णावती के पुत्र को उनका राज्य वापस सौंपा। यह प्रसंग साक्षी है कि रक्षा का धर्म किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है।

7. देवराज इंद्र और देवी शची

वैदिक काल का सबसे पहला रक्षासूत्र किसी भाई-बहन के बीच नहीं, बल्कि पति-पत्नी के मध्य बांधा गया था। जब असुरों के साथ युद्ध में देवता पराजित होने लगे, तो देवराज इंद्र अत्यंत चिंतित हो गए। तब उनकी पत्नी शची ने अपने तप के बल पर एक पवित्र रक्षासूत्र तैयार किया और इंद्र की कलाई पर बांध दिया।

इस सूत्र से मिली शक्ति और आत्मबल के कारण देवराज इंद्र ने असुरों पर विजय प्राप्त की। राखी की यह परंपरा विकसित होती गई और आज यह भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक बन चुकी है।

निष्कर्ष

रक्षाबंधन का यह पावन पर्व केवल एक रीति-रिवाज नहीं, बल्कि कर्तव्य और निस्वार्थ प्रेम का जीवंत प्रतीक है। आज भी यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जब बात अपनों की सुरक्षा और सम्मान की हो, तो हर रिश्ता एक अटूट ढाल बन जाता है।

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Images: magnific