आज करवा चौथ है। करवा चौथ का व्रत सिर्फ भूखे-प्यासे रहने और चांद निकलने का इंतजार करने तक सीमित नहीं है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ भगवान शिव, माता पार्वती और करवा माता की पूजा करती हैं। इस पर्व में व्रत कथा सुनने का भी खास महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के दौरान कथा सुनने से व्रत का धार्मिक अनुष्ठान पूरा होता है। करवा चौथ से जुड़ी साहूकार की बेटी वीरावती की कहानी भी बेहद प्रचलित है। आइए पंडित अरुणेश कुमार शर्मा से करवा चौथ की व्रत कथा जानते हैं।

करवा चौथ की व्रत कथा का महत्व

सुहाग की लंबी उम्र की कामना, हाथों में मेहंदी, सोलह श्रृंगार और आसमान में चांद निकलने का इंतजार, करवा चौथ का त्योहार इन परंपराओं के बिना अधूरा-सा लगता है। इस व्रत का एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे पूजा के दौरान विशेष रूप से याद किया जाता है, और वह है व्रत कथा।

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सात भाइयों और एक बहन की कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी। बेटी का नाम वीरावती था। वह अपने भाइयों की बेहद लाडली थी। सभी भाई अपनी बहन से बहुत प्रेम करते थे और उसकी छोटी-छोटी जरूरतों का भी ध्यान रखते थे। समय बीतने के साथ वीरवती का विवाह हो गया था। शादी के बाद जब उसका पहला करवा चौथ आया, तब वह अपने मायके में थी। इस अवसर पर उसने अपने पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखा। सुबह से ही वह भूखी-प्यासी रहकर चंद्रोदय का इंतजार करने लगी।

दिन बीतने के साथ वीरावती को भूख और प्यास सताने लगी। उसकी हालत देखकर सातों भाई परेशान हो गए। वे अपनी बहन को इस तरह परेशान नहीं देख पा रहे थे। उन्होंने सोचा कि किसी तरह उसे खाना खिला दिया जाए, ताकि उसकी तकलीफ दूर हो सके। शाम होते-होते वीरावती की कमजोरी बढ़ने लगी। तब उसके भाइयों ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने दूर एक पेड़ पर दीपक जलाकर उसे इस तरह रखा कि उसकी रोशनी चांद जैसी दिखाई देने लगी। इसके बाद भाइयों ने वीरावती से कहा कि चंद्रमा निकल आया है और अब वह अपना व्रत खोल सकती है। बहन ने उनकी बात पर विश्वास कर लिया। उसने उस रोशनी को चंद्रमा समझकर पूजा की और व्रत खोलने के लिए भोजन करने बैठ गई।

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वीरावती ने पूरे साल की व्रत-पूजा

वीरावती ने जैसे ही भोजन करना शुरू किया, उसे अशुभ संकेत मिलने लगे। कुछ समय बाद उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिला। यह सुनकर वह बुरी तरह टूट गई और अपने पति के लिए विलाप करने लगी। अपने पति की मृत्यु का समाचार सुनकर वीरावती शोक में डूब गई। इसके बाद वीरावती ने अपने पति को दोबारा जीवन देने की कामना से कठिन तप और व्रत करने का संकल्प लिया। उसने पूरे साल श्रद्धापूर्वक चतुर्थी का व्रत किया और पूजा-अर्चना जारी रखी। उसकी भक्ति और अटूट विश्वास से प्रसन्न होकर देवी की कृपा हुई और उसके पति को दोबारा जीवन प्राप्त हुआ। इस तरह वीरावती का वैवाहिक जीवन फिर से खुशियों से भर गया। इसी मान्यता के कारण करवा चौथ पर वीरावती की कथा सुनने की परंपरा प्रचलित है।

इसलिए करवा चौथ के दिन सिर्फ भूखे रहने से व्रत पूरा नहीं होता है। जब तक आप मन लगाकर वीरावती की इस कथा को नहीं सुनते और चांद का सच्चा दर्शन नहीं करते, व्रत अधूरा ही रहता है। ये कथा हर सुहागिन को सिखाती है कि सच्चे मन और पूरे नियम से रखा गया व्रत कभी खाली नहीं जाता, वो अखंड सौभाग्य जरूर देता है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।