ईशा जायसवाल का सीए बनने का सफर सिर्फ एक परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं है बल्कि यह धैर्य, अनुशासन और कभी हार न मानने की सीख है। सीए की पढ़ाई ने उन्हें दबाव में काम करना और हर बात के पीछे का सही स्रोत खोजना सिखाया। आज वह इसी अनुभव और मजबूत सोच के साथ कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में काम करती हैं, जहां वे बिना किसी सबूत के या सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा नहीं करतीं। अपनी सीए की डिग्री को एक जिम्मेदारी मानते हुए, वह आज की युवा पीढ़ी को बिना किसी शॉर्टकट के सही वित्तीय शिक्षा देने का काम कर रही हैं। नीचे लेख में जानें ईशा जायसवाल की कहानी।

सीए की पढ़ाई ने सिखाया हार के बाद खड़ा होना

सीए की पढ़ाई ने मुझे सिर्फ किताबें या विषय नहीं सिखाए बल्कि मुझे फेल होने और फिर से उठकर खड़े होने का हौसला दिया है। सीए परीक्षा का रिजल्ट वाला दिन ऐसा होता है, जहां आपकी सालों की मेहनत का फैसला एक सेकंड में हो जाता है। उस भारी दबाव में रहने के बाद इंसान के अंदर धैर्य आ जाता है। आज जब कोई वीडियो नहीं चलती या कोई प्लान बिगड़ जाता है, तो मुझे घबराहट नहीं होती, क्योंकि मैंने इससे भी ज्यादा मुश्किल और अनिश्चित दिन देखे हैं।

अनुशासन की बात करूं, तो वह थोपा हुआ नहीं बल्कि मेरी जरूरत था। जब आपके पास महीने कम हों और पढ़ाई का सिलेबस बहुत ज्यादा हो, तो आप खुद-ब-खुद अपना रूटीन बनाना सीख जाते हैं। वही आदत आज भी मेरे साथ है। हर काम को कैलेंडर पर रखना, समय सीमा की इज्जत करना और बहाने बनाने के बजाय काम को पूरा करना।

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कंटेंट और स्टेज पर सीए वाली सोच आती है काम

सीए की ट्रेनिंग हमें एक बात पक्की करना सिखाती है "इसका सोर्स क्या है?" ऑडिटिंग में आप बिना सबूत के किसी भी नंबर को सही नहीं मानते। यही आदत अब मेरे कंटेंट में भी आ गई है। कोई भी नया टॉपिक बनाने से पहले मैं दूसरे क्रिएटर्स की पोस्ट नहीं देखती बल्कि असली नोटिफिकेशन, सर्कुलर या कंपनी की सालाना रिपोर्ट खुद पढ़ती हूं। स्टेज पर मुझे जो आत्मविश्वास मिलता है, उसका कारण यह है कि मैं कोई रटी-रटाई स्क्रिप्ट नहीं बोलती, बल्कि विषय को अच्छे से समझकर बोलती हूं। और आज की ऑडियंस बहुत समझदार है, उन्हें तुरंत पता चल जाता है कि सामने वाला इंसान पढ़कर बोल रहा है या सच में समझकर बोल रहा है।

ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में रिस्क लेना सही?

मैं इस बात पर युवाओं को जज नहीं करती बल्कि उनकी स्थिति समझती हूं जब हर तरफ रातों-रात अमीर बनने की कहानियां दिखती हैं, तो लालच आना आम बात है। मगर मैं एक बात साफ कहूंगी, जल्दी पैसा कमाना निवेश नहीं है बल्कि उम्मीद पर लगाया गया सट्टाहै। जो इंसान 6 महीने में आपका पैसा डबल करने का वादा करे, समझ लीजिए वहां आपका पैसा रिटर्न नहीं बन रहा, बल्कि किसी और का फायदा बन रहा है।

मेरी सीधी सलाह है- सबसे पहले 6 महीने का इमरजेंसी फंड बनाइए, फिर हेल्थ इंश्योरेंस लीजिए और उसके बाद निवेश कीजिए। 20 साल की उम्र में सबसे बड़ा रिटर्न किसी शेयर से नहीं बल्कि आपकी अपनी स्किल्स से मिलता है। कंपाउंडिंग भले ही बोरिंग लगती है, लेकिन सच तो यही है कि लंबे समय में वही सबसे ज्यादा काम आती है।

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लोगों तक भरोसेमंद जानकारी कैसे पहुंचाती हैं?

हमने जब ईशा जायसवाल से पूछा कि जहां आज सोशल मीडिया पर हर कोई फाइनेंस से जुड़ी अलग-अलग जानकारी दे रहा है। वहां पर आप किस प्रकार से अपनी बात को लोगों तक कैसे पहुंचती हैं, जो उनके लिए भरोसेमंद साबित हो सके? इस पर उन्होंने बताया कि इसके लिए वह तीन बातों का खास ध्यान रखती हैं।

  • पहला नियम- जिस प्रोडक्ट को मैं खुद नहीं समझती, उस पर बात नहीं करती; चाहे कंपनी कितनी भी बड़ी क्यों न हो। मैंने कई ब्रांड्स के साथ काम सिर्फ इसलिए मना कर दिया है।
  • दूसरा नियम- मैं हर बात के साथ उसका प्रूफ यानी आधार बताती हूं जैसे कौन सा सेक्शन है या कौन सा सर्कुलर है, ताकि लोग सिर्फ मेरी बात आंख बंद करके न मानें बल्कि खुद उसे वेरिफाई करें।
  • तीसरा नियम- जिस चीज के बारे में मुझे जानकारी नहीं होती, वहां मैं साफ कह देती हूं कि मुझे नहीं पता।

मैं लोगों को स्टॉक टिप्स नहीं देती बल्कि सही शिक्षा देती हूं और यह फर्क मैं बार-बार समझाती हूं। सीए की डिग्री एक बड़ी जिम्मेदारी है इसका मतलब यह नहीं है कि मैं हर चीज की जानकार हूं बल्कि इसका मतलब यह है कि मुझे पता है कि कब चुप रहना चाहिए।

परिवार और काम के बीच कैसे तामलमेल करती हैं?

यह सवाल बेहद आम और सामान्य है, लेकिन इसके बीच में चीजों को अच्छे से मैनेज करना मुश्किलभरा होता है। इसके बारे में जब मैंने ईशा से पूछा तो उन्होंने कहा कि सच कहूं तो, परिवार और काम के बीच संतुलन बनाना मुश्किल रहा है और आज भी है। मां बनने के बाद यह जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। कुछ दिन ऐसे होते हैं जब शूटिंग चल रही होती है और बच्चा गोद में आना चाहता है उस पल में दोनों तरफ से गिल्ट महसूस होता है।

मैं यह नहीं कहूंगी कि मैंने एकदम परफेक्ट संतुलन ढूंढ लिया है, क्योंकि परफेक्शन जैसी कोई चीज नहीं होती। हर दिन एक समझौता होता है। किसी दिन काम आगे रहता है, तो किसी दिन परिवार। मेरे लिए सबसे बड़ी राहत यह है कि मेरे पति ही मेरे वर्क पार्टनर भी हैं, इसलिए उन्हें यह समझाने की जरूरत नहीं पड़ती कि मुझे देर क्यों हो रही है। इसके अलावा, मैंने कुछ नियम बना लिए हैं दिन में कुछ घंटे ऐसे होते हैं जब मेरा फोन मुझसे दूर रहता है, चाहे कुछ भी हो जाए।

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Image Credit- Instagram (@isha jaiswal)