भारतीय समाज और संस्कृति को आकार देने में महिलाओं का योगदान अतुलनीय रहा है, लेकिन कुछ ऐसी महान विभूतियां हुईं, जिन्होंने सभी बंदिशों को तोड़ साहित्य, चित्रकला और सिनेमा के क्षेत्र में ऐसी क्रांति ला दी, जिसने न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में भारतीय कला और सोच का डंका बजाया। ऐसे में ये जानना तो बनता है कि भारत की ऐसी कौन-सी 5 साहसी और प्रतिभाशाली महिलाएं हैं, जिन्होंने अपनी अलग सोच से इतिहास के पन्नों पर अपना नाम अमर कर दिया। जानते हैं आगे...
अमृता शेर-गिल
अमृता शेर-गिल को भारत की फ्रिडा काहलो के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने भारतीय चित्रकला को बंधी सोच से निकालकर आधुनिकता की एक नई दिशा तक पहुंचाया। अमृता ने ऑयल पेंटिंग की तकनीकों को भारतीय विषयों और ग्रामीण जीवन के साथ बेहद खूबसूरती से जोड़ा। उनकी पेंटिंग्स में भारतीय महिलाओं का रूप केवल सजावटी नहीं था, बल्कि उन्होंने महिलाओं के संघर्ष, उदासी और उनकी स्वाभाविकता को गहराई के साथ कैनवास पर उतारा।
अरुंधति रॉय
बता दें कि लेखिका और राजनीतिक कार्यकर्ता अरुंधति रॉय ने अपनी पहली ही किताब से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तहलका मचा दिया था।
- बुकर पुरस्कार से सम्मानित रचना: अपने पहले उपन्यास 'द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स' के लिए बुकर पुरस्कार जीतकर उन्होंने विश्व मंच पर भारतीय अंग्रेजी लेखन का मान बढ़ाया।
- निडर विचार और सक्रियता: साहित्यिक उपलब्धियों के साथ-साथ अरुंधति अपनी बेबाक राजनीतिक राय, पर्यावरण और मानवाधिकार मुद्दों पर आवाज उठाने के लिए जानी जाती हैं।
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नसरीन मोहम्मदी
कला जगत में नसरीन मोहम्मदी का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने रेखाओं और ज्यामिति के जरिए कला की नई परिभाषा गढ़ी। पारंपरिक चित्रों से अलग, उन्होंने ब्लैक एंड व्हाइट रेखाचित्रों और मिनिमलिस्ट स्टाइल के जरिए आकृतियों को उकेरा, जो देखने वालों को एक अलग ही एक्सपीरियंस देता था। उनकी ब्लैक एंड व्हाइट फोटोग्राफी में छाया और रेखाओं का ऐसा तालमेल दिखता था, जिसने भारतीय समकालीन कला (Contemporary Art) को एक नया आयाम दिया।
अमृता प्रीतम
साहित्य जगत में अमृता प्रीतम का नाम एक ऐसी मशाल की तरह है, जिसने पंजाबी और हिंदी साहित्य को एक नया धरातल दिया। अमृता प्रीतम ने 1947 के विभाजन के बारे में, महिलाओं पर हुए अत्याचार के बारे में और इंसान को दिए दर्द को अपनी कविताओं में बड़ी बेबाकी से उकेरा। उनकी प्रसिद्ध कविता 'अज आखां वारिस शाह नूं' विभाजन के दर्द को बयां करती है।
उस दौर में जब महिलाओं के लिए खुलकर लिखना आसान नहीं था, उन्होंने अपनी रचनाओं और प्रसिद्ध आत्मकथा 'रसीदी टिकट' के जरिए महिला इच्छाओं, संघर्ष और सामाजिक पाखंड पर बिना किसी डर के लिखा।
फातिमा बेगम
भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में जब महिलाओं का किसी नए स्थान पर आना, प्रवेश करना ही मुश्किल माना जाता था, तब फातिमा बेगम ने एक नया इतिहास रचा। वे साल 1926 में आई फैंटेसी फिल्म 'बुलबुल-ए-परिस्तान' का निर्देशन कर भारत की पहली महिला फिल्म निर्देशक बनीं। इतना ही नहीं, उन्होंने पुरुष प्रधान उद्योग में आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम करते हुए अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस 'फातिमा फिल्म्स' भी स्थापित किया।
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