हमारे देश में आज भी कई महिलाओं को अपने कानूनी अधिकारों के बारे में पूरी जानकारी नहीं है। कई बार शादी के बाद ससुराल में रहने को लेकर परेशानी होती है, तो कभी पिता की संपत्ति में हिस्सा मांगने पर सवाल उठाए जाते हैं। कुछ महिलाएं पुलिस में शिकायत करने से डरती हैं, तो कुछ को यह भी नहीं पता होता है कि गर्भपात या मिसकैरेज जैसी कंडीशन में कानून उनके लिए क्या कहता है?
महिलाओं के पास कौन से कानूनी अधिकार होते हैं?
ऐसे में अपने अधिकारों की जानकारी होना बहुत जरूरी है। भारतीय कानून महिलाओं को घर में रहने, संपत्ति में हिस्सा पाने, पुलिस में शिकायत करने और अपनी सेहत से जुड़े फैसले लेने जैसे कई अधिकार देता है। हालांकि, हर अधिकार के साथ कुछ नियम और शर्तें भी होती हैं। इसी बारे में जानने के लिए हमने इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता नीतेश पटेल से बात की। उन्होंने इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी है। आइए जानते हैं-
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1. पति के घर में रहने का अधिकार
शादी के बाद अगर किसी महिला को ससुराल में रहने से रोका जाता है या उसे घर से निकालने की धमकी दी जाती है, तो कानून कुछ कंडीशन में उसके साथ है। अगर किसी महिला के साथ घरेलू हिंसा (मारपीट या प्रताड़ना) होती है, तो उसे उस घर में रहने का पूरा हक है जहां वह पति के साथ रह रही थी। सिर्फ इसलिए उसे घर से नहीं निकाला जा सकता कि वह मकान पति के नाम पर नहीं है।
चाहे मकान पति का हो, किराए का हो या ससुराल में किसी और के नाम पर हो, महिला कानूनन उस घर में रहने की मांग कर सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि महिला को हर हाल में वहां हमेशा रहने की छूट मिल ही जाएगी। कोर्ट दोनों पक्षों की बात और हालात देखकर ही इस पर आखिरी फैसला सुनाती है।
2. रात में गिरफ्तारी को लेकर खास नियम
कानून महिलाओं की गिरफ्तारी को लेकर भी खास सुरक्षा देता है। आमतौर पर किसी भी महिला को सूरज ढलने के बाद और सूरज निकलने से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। इमरजेंसी या बहुत गंभीर मामले में रात को गिरफ्तारी के लिए महिला पुलिस अधिकारी की लिखित रिपोर्ट और मजिस्ट्रेट की परमिशन भी होना जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि गिरफ्तारी हो ही नहीं सकती, बस प्रक्रिया कानून के हिसाब से होनी चाहिए। अगर नियमों का पालन न हो, तो महिला तुरंत वकील की मदद से शिकायत कर सकती है।
3. गर्भपात से जुड़े कानूनी अधिकार
गर्भपात को लेकर भारत में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून लागू है। इसके अंडर शर्तों और डॉक्टर की राय के आधार पर गर्भपात कराया जा सकता है। प्रेग्नेंसी कितने हफ्ते की है और महिला की कंडीशन क्या है, इसके आधार पर नियम अलग हो सकते हैं। अगर महिला बालिग है, तो सिर्फ उसकी अपनी मंजूरी ही काफी है। इसके लिए पति या माता-पिता की अलग से साइन या सहमति की कोई कानूनी जरूरत नहीं है। इसके लिए समय सीमा के नियम लागू हैं। जैसे-
- 20 हफ्ते तक के गर्भपात के लिए कानून की तय शर्तें लागू होती हैं।
- 20 से 24 हफ्ते के बीच कुछ खास या गंभीर स्थितियों में ही गर्भपात की इजाजत मिलती है।
- 24 हफ्ते के बाद बहुत गंभीर मेडिकल मामलों में ही 'मेडिकल बोर्ड' की मंजूरी से यह संभव है।
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4. मिसकैरेज होने पर छुट्टी का अधिकार
काम करने वाली महिलाओं के लिए कानून में एक बहुत बड़ी राहत दी गई है। अगर किसी वर्किंग वुमेन का मिसकैरेज हो जाता है या फिर किसी मेडिकल परेशानी की वजह से प्रेगनेंसी खत्म करानी पड़ती है, तो मातृत्व लाभ कानून के तहत उसे ऑफिस से पूरे वेतन (Paid Leave) के साथ पूरे 6 हफ्ते की छुट्टी पाने का अधिकार है। बस इस बारे में जरूरी बातें जान लेनी चाहिए-
- छुट्टी की सुविधा के लिए संबंधित कानून के नियम और वैलिडिटी पूरी होनी चाहिए।
- कंपनी या दफ्तर महिला से जरूरी मेडिकल सर्टिफिकेट मांग सकता है।
- अगर छुट्टी देने से मना किया जा रहा है, तो महिला अपने ऑफिस के HR या श्रम विभाग से जानकारी ले सकती है।
ऐसे समय में महिला को अपनी हेल्थ पर ही फोकस करना चाहिए और छुट्टी के नियम समझकर अपने हक की बात रखनी चाहिए।
5. पिता की प्रॉपर्टी में बेटी का हिस्सा
पिता की प्रॉपर्टी में बेटी का हक एक अहम कानूनी मुद्दा है। हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत पिता की प्रॉपर्टी में बेटी को बेटे के बराबर अधिकार मिल सकता है। शादी होने के बाद भी सिर्फ इस वजह से बेटी का यह अधिकार खत्म नहीं हो जाता है।
- बेटी की शादी हो जाने के बाद भी पैतृक संपत्ति में उसका अधिकार खत्म नहीं होता, वह अपना हिस्सा मांग सकती है।
- पिता की खुद खरीदी हुई संपत्ति पर यह नियम लागू नहीं होता है। उस संपत्ति को पिता जिसे चाहे दे सकता है या उसकी वसीयत बना सकता है।
- अगर संपत्ति को लेकर कोई आपसी विवाद हो, तो किसी अच्छे वकील को कागजात दिखाकर सही राय जरूर लें।
6. जीरो एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार
अगर किसी महिला के साथ कोई क्राइम होता है, तो वह शिकायत दर्ज कराने के लिए सिर्फ उसी पुलिस स्टेशन तक सीमित नहीं है, जिसके इलाके में घटना हुई है। वह दूसरे पुलिस स्टेशन में भी जीरो एफआईआर दर्ज करा सकती है। बाद में शिकायत को उस थाने में भेजा जा सकता है, जिसके इलाके में घटना हुई थी।
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