भारत के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई का नाम ऐसी वीरांगना के तौर पर लिया जाता है, जिसने बहुत कम उम्र में अंग्रेजों के खिलाफ डटकर मुकाबला किया था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका तांबे था और प्यार से उन्हें मनु कहा जाता था। 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में जन्मी मनु ने बचपन से ही घुड़सवारी और हथियार चलाने की ट्रेनिंग ली थी। ये तो आपने सबने रानी लक्ष्मीबाई पर आने वाले सीरियल्स में देखा ही होगा।
रानी लक्ष्मीबाई की कहानी क्या है?
बता दें कि उनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से हुई थी और तभी से वह लक्ष्मीबाई बन गईं। जब पति की मौत हुई तब अंग्रेजों ने उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया। ऐसे में रानी ने अंग्रेजों के सामने झुकने के बजाय उनका मुकाबला करने का फैसला किया। 1857 के विद्रोह के दौरान उनकी बहादुरी की कहानी पूरे देश में फैल गई। आइए जानते हैं कि वो कैसे पीठ पर अपने बच्चे को बांधकर युद्ध लड़ी थीं और उनकी कहानी क्या है?
बचपन में ही मां का छूट गया था साथ
रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे और मां का नाम भागीरथी बाई था। जब मनु करीब 4 साल की थीं, तभी उनकी मां की मौत हो गई। इसके बाद उनके पिता ने ही उनकी परवरिश की। बताया जाता है कि मोरोपंत पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार से जुड़े हुए थे। इसी वजह से मनु का बचपन बिठूर में बीता और उन्हें उस माहौल में रहने का मौका मिला जहां उन्होंने घुड़सवारी और हथियार चलाना सीख लिया।
शादी के बाद बनीं झांसी की रानी
मनु की शादी 14 साल की उम्र में ही हो गई थी। 1842 में झांसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी के रूप में वो जानी गईं। शादी के बाद उनका नाम लक्ष्मीबाई रख दिया गया। कुछ समय बाद उन्हें एक बेटा हुआ, लेकिन उसकी भी मौत हो गई। फिर राजा गंगाधर राव की तबीयत भी खराब रहने लगी। उनके निधन से पहले दंपति ने एक बच्चे को गोद लिया, जिसका नाम दामोदर राव रखा गया। यही बच्चा बाद में झांसी के भविष्य को लेकर अंग्रेजों और रानी के बीच विवाद की बड़ी वजह बना था।
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अंग्रेजों ने दामोदर राव को वारिस मानने से कर दिया था इनकार
उस दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी की Doctrine of Lapse यानी हड़प नीति के तहत अंग्रेज कई राज्यों को अपने कब्जे में ले रहे थे। ऐसे में वो किसी दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी बनने को लेकर मान्यता नहीं देते थे। इसी कारण अंग्रेजों ने गंगाधर राव की मौत के बाद उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया। फिर झांसी को भी अपने कब्जे में लेने लगे। इस बात का रानी लक्ष्मीबाई ने खंडन किया। इसी वजह से अंग्रेजों और रानी लक्ष्मीबाई के बीच युद्ध शुरू हो गया।
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1857 में झांसी की लड़ाई तेज हुई
1857 की बात है जब देश के अलग-अलग जगहों पर अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू हुआ था, तब झांसी भी इसकी चपेट में आ गया। रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सेना को तैयार किया और झांसी को बचाने का प्रण लिया। कुछ ही समय बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने झांसी को घेर लिया। ऐसे में रानी ने अपने सैनिकों के साथ जमकर मुकाबला किया, लेकिन धीरे-धीरे कई सेनाओं ने अपनी जान गंवा दी और इनकी संख्या कम होने लगी। इसके बावजूद रानी लक्ष्मीबाई ने हार नहीं मानी।
पीठ पर दामोदर राव को बांधकर की लड़ाई
रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ी सबसे मशहूर कहानियों में उनके घोड़े पर बैठकर झांसी से निकलने की कहानी भी शामिल है। बताया जाता है कि उन्होंने अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपनी पीठ पर बांधा और घोड़े पर सवार होकर झांसी से निकल गईं। रानी घुड़सवारी में ट्रेंड थीं और इसी वजह से झांसी से निकलकर उन्होंने आगे भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी।
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झांसी से पहुंचीं कालपी और फिर ग्वालियर
झांसी से निकलने के बाद रानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुंचीं। वहां उन्होंने तात्या टोपे और दूसरे विद्रोही नेताओं के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी। इसके बाद सेनाओं ने ग्वालियर पर कब्जा कर लिया, लेकिन अंग्रेजों ने जल्द ही जवाबी हमला किया। जून 1858 की बात है जब ग्वालियर के पास रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सेना से लड़ते हुए गंभीर रूप से घायल हो गईं और 18 जून 1858 को उनकी मौत हो गई।
सिर्फ 29 साल की उम्र में हो गईं अमर
अब तो आप जान ही गई होंगी कि रानी लक्ष्मीबाई बहुत ही कम उम्र में अमर हो गई थीं। उन्होंने इतनी कम उम्र में ऐसा साहस दिखाया कि उनका नाम इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
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रानी लक्ष्मीबाई की कहानी सिर्फ तलवार चलाने की कहानी नहीं है। यह उस समय की एक ऐसी महिला की कहानी है जिसने अपने राज्य और अपने अधिकार के लिए अंग्रेजों से युद्ध किया। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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