सविता जी किसी से कम नहीं थी, उन्होंने पोस्ट-ग्रेजुएशन किया था। शादी के बाद उनका सपना था कि वह पीएचडी करें और कॉलेज में Lecturer बनें, लेकिन परेश जी ने उनकी इस इच्छा में मदद करना तो दूर, इसमें कभी कोई दिलचस्पी भी नहीं दिखाई। वह कहते, “अब गाइड, लाइब्रेरी और इन सब झंझटों में क्यों पड़ोगी? मुझे भी तुम्हारे साथ इधर-उधर घूमना पड़ेगा। फिर नौकरी करके भी क्या हासिल कर लोगी? घर में तो आराम से हो। खुद भी आराम से रहो और हमें भी आराम से रहने दो।” उस दिन के बाद से आज तक सविता जी ने अपनी पढ़ाई और पढ़ाने की इच्छा को दोबारा कभी सामने नहीं आने दिया। हर बार दूसरों की इच्छाओं के आगे झुकते-झुकते वह खुद ही भूल गई थीं कि उनकी अपनी भी कोई इच्छा और अपनी कोई पहचान है, लेकिन आज जब डॉक्टर ने उनसे कहा, “झुकना मत...” सविता जी यही सोच-सोचकर परेशान थीं कि क्या सच में लगातार झुकते रहने से रीढ़ की हड्डी अपनी जगह से खिसक जाती है? क्या उसकी हड्डियों के बीच कोई गैप या खाली जगह बन जाती है?
डॉक्टर की बात सच ही तो लग रही थी। बचपन से लेकर आज तक उनकी जिंदगी से भी तो न जाने कितनी चीजें खिसकती चली गई थीं। उनके अंदर कितना कुछ खाली होता चला गया था। उनके मन के अंदर न जाने कितनी जगहों पर खालीपन आ गया था, लेकिन उन्हें कभी इसका एहसास ही नहीं हुआ। दूसरों के सामने लगातार झुकते-झुकते उनका अपना अल्हड़पन और चुलबुलापन कब उनसे दूर हो गया, उन्हें पता ही नहीं चला। सविता जी लंबी और खूबसूरत थीं। उन पर हर रंग और हर तरह के कपड़े अच्छे लगते थे, लेकिन उन्हें खुद हल्के और सादे रंग पहनना ज्यादा पसंद था। बिना किसी मेकअप के भी उनके चेहरे की सादगी और खूबसूरती किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती, लेकिन परेश जी चाहते थे कि सविता जी हर समय पूरी तरह सजी-धजी और सुहागिन के रूप में रहें। उन्हें पसंद था कि वह चटख रंगों के कपड़े पहनने चाहिए, गले में लंबा-सा मंगलसूत्र होना चाहिए, हाथों में भर-भरकर रंग-बिरंगी चूड़ियां होनी चाहिए, मांग पूरी तरह सिंदूर से भरी हो, माथे पर बड़ी-सी बिंदी हो, पैरों में छम-छम करती पायल और बिछुए हों और शरीर पर ढेर सारे गहने हों। इस तरह सजी-धजी सविता जी को देखकर ऐसा लगता था जैसे वह कोई कठपुतली हों, लेकिन इस तरह रहने में उन्हें अंदर से घुटन महसूस होती थी। काश! कहीं से ताजी हवा का झोंका आए और वह खुलकर सांस ले सकें। ऐसा सोचते हुए सविता जी ने गहरी सांस लेकर हवा को अपने अंदर भरने की कोशिश की, लेकिन घर में बने मांसाहारी खाने की गंध से उन्हें उल्टी जैसा महसूस होने लगा।
ऐसा नहीं था कि उनके मायके में मांसाहारी खाना नहीं बनता था। वहां भी बनता था, लेकिन कभी-कभार। सबसे अच्छी बात यह थी कि वहां हर किसी को अपनी पसंद का खाना खाने की आजादी थी। किसी पर कोई दबाव नहीं था, लेकिन ससुराल आने के बाद जब उनके घरवालों ने उनकी खाने की पसंद-नापसंद पर भी सवाल उठाना शुरू किया, तो उन्हें बहुत हैरानी हुई। खासकर उनके पति परेश जी को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि सविता अपने लिए अलग से दाल-सब्जी बनाएं। वह कहते थे कि, “सारे घरवाले मजे से चिकन और फिश खाते हैं और तुम ये घास-फूस लेकर बैठ जाती हो। हम तुम्हें अच्छा और पौष्टिक खाना ही तो खिलाना चाहते हैं। जब तुम इसे खाओगी ही नहीं, तो तुम्हें कैसे पता चलेगा कि क्या स्वादिष्ट है और क्या नहीं?”
परेश जी कभी प्यार से तो कभी जबरदस्ती उनकी प्लेट में नॉनवेज परोस देते थे। उनकी सास भी मुस्कुराते हुए कहतीं, “पहले मैं भी मांसाहारी खाना नहीं खाती थी। तुम्हारे ससुर जी ने जबरदस्ती करके मुझे भी सब खाना शुरू करवा दिया था।” सविता जी मन ही मन सोचतीं कि क्या सच में औरतों की अपनी कोई पसंद या नापसंद नहीं होती? क्या उन्हें सिर्फ दूसरों की बात मानने और हर बात पर समझौता करने के लिए ही बनाया गया है? या फिर भगवान ने उनके शरीर में रीढ़ की हड्डी इसलिए नहीं बनाई कि वे अपनी बात के लिए खड़ी हो सकें? लेकिन आज डॉक्टर की बात से तो साफ था कि उनके शरीर में रीढ़ की हड्डी है।
तो फिर...इन्हीं उलझे हुए सवालों के बीच सविता जी कभी कुछ सोचतीं तो कभी उन विचारों से बाहर निकलतीं। पता ही नहीं चला कि कब उन्हें गहरी नींद आ गई। दवा का असर कम हुआ तो उनकी नींद खुल गई। तभी मंजू किसी काम से कमरे में आई। सविता जी को जागा हुआ देखकर वह हैरान हो गई। “अरे, आप कब उठीं? थोड़ी देर पहले मैं चाय के लिए पूछने आई थी, तब आप सो रही थीं। अब चाय बना दूं? बाकी सब तो चाय पी चुके हैं।”सविता जी ने बस इतना कहा, “हूं।” मंजू वहां से जाने लगी, तभी सविता जी को अचानक कुछ याद आया। उन्होंने कहा, “सुन, मेरे लिए ग्रीन टी बना देना और उसे यहीं बैठक में ले आना।” हाथ-मुंह धोकर और फ्रेश होकर जब सविता जी बैठक में पहुंचीं, तो उन्होंने देखा कि केटरर जा चुका था। बेटी और दामाद उसी की दी हुई लिस्ट को फाइनल कर रहे थे। वहीं परेश जी अपने किसी दोस्त से मोबाइल पर बात कर रहे थे।
“...दोहिती का रिश्ता तय हुआ है और उसी की शादी की तैयारियों के लिए यहां आए हुए हैं... हां, बात तो कई जगह चल रही थी, लेकिन रिश्ता फाइनल करने से पहले अच्छी तरह देखना-समझना तो पड़ता ही है। एक बहुत अच्छा लड़का और परिवार मिला था। लेकिन उनकी इच्छा थी कि लड़की वेजिटेरियन हो, क्योंकि उनके पूरे परिवार में सभी लोग वेजिटेरियन हैं। अब यह भी कोई बात हुई? बच्ची अपनी पसंद का खाना-पीना भी न कर सके? एक और अच्छे रिश्ते के लिए हमें मना करना पड़ा, क्योंकि लड़के वाले पहनने-ओढ़ने को लेकर थोड़े ज्यादा पुराने विचारों वाले थे। अब आजकल के बच्चों के पहनने-ओढ़ने पर भी इतनी पाबंदी तो नहीं लगाई जा सकती। लेकिन अब जो रिश्ता मिला है, वह हर तरह से ठीक है।”
“कैसी हो मां? अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रही हो? इधर दीवान पर लेट जाओ। अरे-अरे, झुको मत!” प्राची ने अपनी मां की तबीयत के बारे में पूछा। तभी मंजू उनके लिए ग्रीन टी लेकर आ गई और उनके हाथ में कप थमा दिया। “ग्रीन टी? यह कैसे? आप तो हमेशा मसाला चाय पीती हैं? डॉक्टर ने कहा है क्या?” प्राची ने हैरानी से पूछा। “डॉक्टर ने कुछ नहीं कहा। मुझे यही पसंद है।” कुशन के सहारे अपनी कमर सीधी करके बैठते हुए सविता जी ने पूरे आत्मविश्वास से जवाब दिया। उन्होंने देखा कि उनकी बात सुनकर परेश जी थोड़े चुप और परेशान-से हो गए थे। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी गंभीर बात के बारे में सोच रहे हों। उधर मोबाइल में व्यस्त बबली अपनी नानी के पास आकर बैठ गई। “नानी, मैंने अपने लिए ये दो ड्रेसेज पसंद की हैं। एक यह लाइट ब्लू वाली और दूसरी यह बेज कलर की...”
“कलर और वर्क थोड़ा हल्का नहीं लग रहा?” प्राची ने बीच में बोलते हुए अपनी राय दी। “मुझे तो खुद भी लाइट वर्क और हल्के रंग ही पसंद हैं।” सविता जी ने अपनी नातिन की पसंद से सहमति जताई। यह सुनते ही बबली का चेहरा खुशी से खिल उठा। “नानी, यह देखो। यह पीच कलर वाली ड्रेस आपके लिए कैसी रहेगी?” “मां ऐसे रंग कहां पहनती हैं? उन्हें तो लाल, संतरी और पीला रंग पसंद है। उन पर चटख रंग बहुत अच्छे भी लगते हैं।”प्राची ने बचपन से लेकर अब तक अपनी मां को जैसा देखा था, उसके हिसाब से उसकी बात भी गलत नहीं थी।
“बबली, अपनी नानी की पसंद के रंग और पसंद के वर्क वाली दो-तीन ड्रेसेज पसंद करवा कर ऑर्डर कर दे। उन पर तो हर रंग और हर तरह का कपड़ा अच्छा लगता है।” परेश जी की गंभीर आवाज पूरे कमरे में गूंजी। सविता जी ने चौंककर उनकी तरफ देखा। उन्हें अपने पति की आंखों में प्यार तो साफ दिखाई दे रहा था, लेकिन उसी प्यार के पीछे कहीं छिपा हुआ अपराधबोध भी नजर आ रहा था। उस एहसास ने सविता जी के मन को अंदर तक छू लिया। ईश्वर ने हर इंसान के शरीर में रीढ़ की हड्डी बनाई है। बस हम ही कई बार उसका सही इस्तेमाल करना भूल जाते हैं।
ऐसा सोचते हुए सविता जी ने भरपूर अंगड़ाई ली और अपनी कमर सीधी कर ली। उन्हें अब अपनी पीठ का दर्द भी पहले से कम महसूस हो रहा था।
सविता जी की इस कहानी से समझ आता है कि अपनी पसंद और इच्छाओं को दबाकर रखना ही समझदारी नहीं है। हर इंसान को अपनी पसंद का खाना, पहनावा और जीवन जीने का अधिकार है। दूसरों की खुशी के लिए हमेशा अपनी इच्छाओं से समझौता करते रहना जरूरी नहीं।
यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।
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लेखक- संगीता माथुर
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