पेरेंट्स और बच्चों का रिश्ता दुनिया के सबसे खास रिश्तों में गिना जाता है, लेकिन क्या हर रिश्ता उम्र बढ़ने के साथ मजबूत होता जाता है? आज कई युवा ऐसे भी हैं, जो बड़े होने के बाद अपने माता-पिता से दूरी बना रहे हैं। कोई बार-बार होने वाले झगड़ों से परेशान है, तो किसी को लगता है कि उसके पेरेंट्स उसकी भावनाओं और फैसलों को समझ नहीं पा रहे हैं। ऐसे में कुछ युवा अपनी मेंटल पीस के लिए लिमिटेशन तय कर रहे हैं, थेरेपी की मदद ले रहे हैं और कुछ मामलों में पूरी तरह संपर्क खत्म करने का फैसला भी कर रहे हैं।

यंग एडल्ट्स पेरेंट्स से हो रहे हैं दूर

पहले परिवार में होने वाली अनबन को अक्सर नजरअंदाज करके रिश्ते निभाने की सलाह दी जाती थी। आज की नई पीढ़ी रिश्तों में अपनी भावनाओं, सम्मान और मेंटल पीस को भी अहमियत देती है। यही वजह है कि कुछ युवा अपने माता-पिता के साथ रिश्ते को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रहे हैं। कोई बातचीत के लिए कुछ सीमाएं तय कर रहा है, कोई काउंसलिंग का सहारा ले रहा है, तो कोई लगातार तनाव और भावनात्मक तकलीफ से बचने के लिए दूरी बना रहा है। आइए एम्स दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉक्‍टर विधि पिलनिया से इसके पीछे की वजह के बारे में जानते हैं।

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हर छोटी बात पर टोकना और ताने मारना

जब पेरेंट्स बच्चों के हर फैसले पर सवाल उठाते हैं, जैसे- क्या काम करना है, क्या पहनना है, किससे मिलना है; तो बच्चों को लगता है कि उनकी कोई इज्जत नहीं है। अगर हर बार दूसरों से तुलना की जाए या हर बात पर ताना मारा जाए, तो धीरे-धीरे प्यार कम होने लगता है और झगड़ा बढ़ जाता है। ऐसे में कई बच्चे खुद को दुखी होने से बचाने के लिए माता-पिता से थोड़ी दूरी बना लेते हैं, ताकि मन को शांति मिल सके।

बड़े होने पर अपने फैसले खुद लेने की चाहत

जब बच्चा बड़ा हो जाता है, तो वह अपने करियर, शादी, कहां रहना है, जैसे बड़े फैसले खुद लेना चाहता है। यह हर इंसान के साथ होता है। कई बार माता-पिता यह मानने को तैयार नहीं होते और हर बात में दखल देते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चा वही करे, जो वे कहें। इससे घर में रोज बहस होने लगती है। युवा अपने माता-पिता से प्यार तो करते हैं, पर वे अपनी अलग पहचान भी बनाना चाहते हैं। इसलिए, वे लड़ने के बजाय अपनी एक सीमा तय कर देते हैं कि इस मामले में वे खुद फैसला लेंगे।

बचपन की बुरी यादों का असर

बचपन में जो होता है, वह बड़े होने तक याद रहता है। अगर बचपन में माता-पिता ने ध्यान नहीं दिया, घर में हमेशा लड़ाई होती थी या बच्चे को डांटा-मारा गया तो वह दर्द मन में बैठ जाता है। बड़ा होने पर जब युवा उन पुरानी बातों को नए तरीके से समझता है, तो उसे लगता है कि उसके साथ सही नहीं हुआ। इसी वजह से वह अपने माता-पिता से दूर होने लगता है, क्योंकि पुरानी यादें उसे आज भी दुखी करती हैं।

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थेरेपी से रिश्तों को समझने में मदद मिलती है

आजकल बहुत से युवा मन को ठीक रखने के लिए काउंसलर या डॉक्टर से बात करते हैं, इसे थेरेपी कहते हैं। थेरेपी में वे बताते हैं कि उन्हें किस बात से तकलीफ होती है और परिवार में क्या-क्या होता है? डॉक्टर उन्हें समझने में मदद करता है कि कब बात करनी चाहिए, कब चुप रहना चाहिए और कैसे अपनी हदें तय करनी चाहिए? कई लोग सोचते हैं कि थेरेपी का मतलब माता-पिता से रिश्ता तोड़ना है, पर ऐसा नहीं है। इसका मकसद है खुद को समझना और सही फैसला लेना ताकि मन शांत रहे।

क्या पेरेंट्स और बच्चों का रिश्ता दोबारा ठीक हो सकता है?

हां, बिल्कुल ठीक हो सकता है, लेकिन इसके लिए दोनों को कोशिश करनी पड़ेगी। सिर्फ बच्चे के करने से कुछ नहीं होगा। माता-पिता को भी अपनी गलती माननी होगी, बच्चे की बात ध्यान से सुननी होगी और जो नियम तय हुए हैं उनका सम्मान करना होगा। पुरानी बातों को भूलकर नई शुरुआत करनी होगी। अगर दोनों चाहते हैं तो पूरे परिवार के साथ थेरेपी भी ली जा सकती है, जिससे बात करना आसान हो जाता है। एक बात याद रखनी जरूरी है, अगर घर में मार-पीट होती है या जान को खतरा है, तो वहां दूरी बना लेना ही सबसे सही और सुरक्षित फैसला है।

पेरेंट्स से दूरी बनाने का फैसला हर युवा के लिए एक जैसा नहीं होता। इसके पीछे लंबे समय से चले आ रहे मतभेद, भावनात्मक तकलीफ या अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने की जरूरत होती है। इसलिए, हर मामले को एक ही नजरिए से देखना सही नहीं है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।