उम्र से चाहे कितने ही बड़े क्यों न हो जाएं, पेरेंट्स के लिए बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं। "कमरे का क्या हाल बना रखा है, कोई भी चीज सही ढंग से रखी नहीं होती, इतनी लापरवाह लड़की, पता नहीं ऑफिस में कैसे काम करती होगी..." यह रोज की आदत बन गई है। यही बड़बड़ाती हुई मां अपनी कामकाजी बेटी का कमरा व्यवस्थित कर रही हैं। जबकि उन्हें भी यह मालूम है कि हाल ही में उनकी बिटिया को कंपनी ने प्रमोशन दिया है और वह जल्द ही अमेरिका जाने वाली है। फिर भी मां का दिल ऐसा ही होता है। वह छोटी-छोटी बातों पर बच्चों के साथ रोक-टोक करने से बाज नहीं आतीं। इसके लिए हमने क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. संजना सर्राफ से भी बात की है। जानते हैं आगे...

संभलकर संभालें इन्हें

उन्नीस-बीस की आयु के बाद कानूनी तौर पर बच्चे भले ही वयस्क हो जाते हैं, फिर भी उनमें वह भावनात्मक परिपक्वता नहीं होती, जो धीरे-धीरे अनुभवों के साथ ही आती है। इस उम्र में कुछ बच्चे पहली जॉब में होते हैं, तो कुछ उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए घर से दूर किसी दूसरे शहर या देश में होते हैं, वहीं कुछ अपने माता-पिता के साथ रहकर ही पढ़ाई या जॉब की तलाश कर रहे होते हैं।

भले ही ये युवा बाहर से बहुत कॉन्फिडेंट और स्मार्ट दिखते हैं, पर इन्हें अब भी पेरेंट्स के सहयोग और मार्गदर्शन की जरूरत होती है। हालांकि, इन बच्चों में भी अहम की भावना होती है और उन्हें ऐसा लगता है कि "अब तो मैं बड़ा हो गया हूं, मुझे सही-गलत की पहचान है और अपने सभी निर्णय स्वयं ले सकता हूं।" इसीलिए जब भी पेरेंट्स इन्हें किसी बात के लिए टोकते हैं, तो ये नाराज हो जाते हैं।

ऐसे में जब भी आपकी युवा संतान परेशान नजर आए, तो उस वक्त उससे कोई पूछताछ न करें। थोड़ी देर बाद जब वह सहज हो जाए, तो उससे बातचीत करते हुए उसकी समस्या के बारे में जानने की कोशिश करें। 

ब्रेकअप से जुड़ी समस्या

उम्र के इस दौर में अधिकतर युवा रिलेशनशिप के दौरान ब्रेकअप जैसी समस्याओं से जूझ रहे होते हैं। अगर आपकी संतान इस मुद्दे पर आपसे बात नहीं करना चाहती, तो पहले उसे थोड़ा समय दें। परिवार का माहौल सहज और खुशनुमा बनाएं। भाई-बहनों या करीबी दोस्तों से उसकी समस्या के बारे में जानने की कोशिश करें।

आप उसे समझाएं कि जिंदगी के सफर में मिलने-बिछड़ने का सिलसिला चलता ही रहता है। आने वाले समय में तुम्हें इससे भी अच्छा पार्टनर मिलेगा/मिलेगी। इसलिए पुरानी बातों को भुलाकर अपनी पढ़ाई या करियर पर ध्यान दो।

प्रोफेशनल जीवन से जुड़ी परेशानियां

अगर आप अपने बच्चे को प्रोफेशनल जीवन से जुड़ी समस्याओं से बचाना चाहते हैं, तो दसवीं कक्षा के बाद से ही उसके रुझान को देखते हुए उसे मनपसंद स्ट्रीम में आगे पढ़ाई का मौका दें। उस पर अपनी तरफ से कोई दबाव न बनाएं कि तुम्हें साइंस या कॉमर्स ही पढ़ना है।

अगर आपके बेटे या बेटी ने पहली बार ऑफिस जाना शुरू किया है, तो रोजाना शाम को उससे ऑफिस के बारे में ज्यादा पूछताछ न करें और न ही बेवजह सलाह दें। उसे अपने अनुभवों से सीखने का मौका दें। हां, अगर कभी वह खुद ही बॉस या सहकर्मियों के व्यवहार से होने वाली परेशानियों को आपसे शेयर करता है, तो आप उसकी बातें ध्यान से सुनें और यथोचित मार्गदर्शन भी करें।

वित्तीय मामलों में सहजता

अधिकतर परिवारों में जब युवाओं की पहली जॉब लगती है, तो शुरुआती कुछ वर्षों तक वे शॉपिंग, घूमने-फिरने और करीबी लोगों को गिफ्ट देने में बहुत पैसे खर्च करते हैं। कुछ समय तक उन्हें ऐसा करने से न रोकें और उन्हें नई आर्थिक आजादी का सुख उठाने दें।

फिर उन्हें प्यार से समझाना शुरू करें कि "अभी तुम्हारे पास घर-गृहस्थी की कोई जिम्मेदारी नहीं है, बचत और निवेश की दृष्टि से यह सुनहरा अवसर है और तुम्हें इसका सदुपयोग करना चाहिए।"

मन में न हों दूरियां

आजकल पहली जॉब मिलने के बाद कुछ युवा घर से दूर दूसरे शहरों में या विदेश चले जाते हैं। ऐसे में घर की याद आना स्वाभाविक है, क्योंकि वहां उन्हें ब्रेकफास्ट से लेकर डिनर तक तैयार मिलता था। अलमारी में सारे कपड़े सहेजकर रखे होते थे, लेकिन घर से दूर जाने के बाद यह सारा प्रबंध उन्हें खुद ही करना पड़ता है।

अपने देश में तो फिर भी कुकिंग और सफाई जैसे कार्यों के लिए घरेलू सहायक मिल जाते हैं, पर विदेश में यह सुविधा आसानी से नहीं मिलती। बच्चों को ऐसी परेशानियों से बचाने के लिए बचपन से ही घरेलू कार्यों में उनका सहयोग लें।

घर से बाहर आपकी युवा संतान ऑफिस के कामकाज या दोस्तों के साथ आउटिंग में व्यस्त होती है, लेकिन माता-पिता को उनकी बहुत याद आती है और वे उनके बारे में सोचकर अक्सर चिंतित रहते हैं, जिससे कई बार वे अनिद्रा जैसी समस्याओं से परेशान हो जाते हैं। ऐसी समस्या से बचाव के लिए बेहतर यही होगा कि आप अपने बच्चे से बातचीत करके यह जान लें कि किस दिन और किस वक्त उसके पास फुर्सत होती है, और वही समय वीडियो कॉल के लिए निर्धारित रखें।

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आप भी बनें जिम्मेदार

माता-पिता के प्रति युवा संतान की भी कुछ जिम्मेदारियां होती हैं, जिनका निर्वाह उनके लिए जरूरी हो जाता है। अतः आप भी इन बातों का ध्यान रखें-

  • माता-पिता के प्रति केयरिंग व्यवहार अपनाएं और नई टेक्नोलॉजी सीखने में उनकी मदद करें।
  • कभी अपने घर पर दोस्तों और कलीग्स को बुलाएं, उनसे मिलकर आपके पेरेंट्स को बहुत अच्छा लगेगा।
  • कभी उन्हें प्यारा सा सरप्राइज गिफ्ट देकर चौंका दें, तो कभी उनकी मनपसंद जगह पर आउटिंग के लिए साथ निकल पड़ें।
  • उम्र के साथ अगर उनकी सेहत में गिरावट आ रही है, तो उन्हें रूटीन चेकअप के लिए लेकर जाएं।
  • उनके साथ बातचीत के दौरान हमेशा शालीनता और सम्मान बरतें।

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लेखिका: विनीता

Images: magnific