बचपन से ही हमारे समाज में लड़के और लड़कियों को अलग-अलग सोच और दायरों में बड़ा किया जाता है। लड़कियों को सिखाया जाता है कि रिश्ते कैसे संभाले जाते हैं, समझौते कैसे किए जाते हैं और पूरे परिवार को खुश रखना ही उनका सबसे बड़ा धर्म है। इसके उलट, लड़कों को यह महसूस कराया जाता है कि शादी के बाद भी उनकी जिंदगी, उनकी प्राथमिकताएं और उनके अपने परिवार के रिश्तों में कोई बदलाव नहीं आना चाहिए।
यही वजह है कि शादी के बाद ससुराल वालों के प्रति बहू के हर फर्ज को तो गिनाया जाता है, लेकिन पति की जिम्मेदारियों को अक्सर सिर्फ पैसे कमाने तक ही सीमित मान लिया जाता है। आखिर क्यों एक बहू का समझौता करना संस्कार कहलाता है, जबकि एक बेटे का अपनी पत्नी का साथ देना परिवार के खिलाफ जाना मान लिया जाता है? इसके लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं इसके बारे में...
शादी के बाद तालमेल बिठाने का दबाव सिर्फ पत्नी पर ही क्यों?
समाज में बचपन से ही दोनों को दो अलग-अलग तरह की सीख दी जाती है, जो आगे चलकर उनकी मैरिड लाइफ में कई समस्याएं खड़ी करती है-
- जीवनसाथी का दर्जा: लड़की से कहा जाता है कि पति ही उसका सब कुछ है, जबकि लड़के को सिखाया जाता है कि माता-पिता से बढ़कर कोई नहीं है, पत्नी भी नहीं।
- घर की जिम्मेदारियां: लड़की को सिखाया जाता है कि बच्चे, घर और रिश्ते संभालना उसका प्राथमिक कर्तव्य है। वहीं लड़के को लगता है कि अगर वह पैसे कमा रहा है, तो वह अपने परिवार पर कोई एहसान कर रहा है।
- घरेलू काम: लड़कियों के लिए घर के काम सीखना जरूरी बना दिया जाता है, जबकि लड़कों के मन में यह बैठा दिया जाता है कि घर के काम करने से पुरुषों का सम्मान कम होता है।
- प्राथमिकताओं का चुनाव: लड़की को पति के हर सुख-दुख में साथ निभाने की सीख दी जाती है, जबकि लड़के को सिखाया जाता है कि पत्नी की भावनाएं बाद में आती हैं, पहले परिवार की खुशी जरूरी है।
- सम्मान और बराबरी: लड़की को पति को अपने सिर का ताज समझने को कहा जाता है, वहीं लड़के को हिदायत दी जाती है कि पत्नी को कभी सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए।
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बेटों और बेटियों को बचपन से क्या सिखाना जरूरी है?
शादी दो अलग-अलग व्यक्तियों का एक ऐसा खूबसूरत रिश्ता है, जिसमें दोनों की बराबर की जिम्मेदारियां होती हैं। सिर्फ एक तरफ से त्याग और दूसरी तरफ से केवल वफादारी की उम्मीद करके कभी भी एक मजबूत या सुखी रिश्ता नहीं बनाया जा सकता।
सदियों से महिलाओं को यह सिखाया जाता रहा है कि उन्हें कैसे जीना चाहिए और कैसे हर मोड़ पर चुप रहकर तालमेल बिठाना चाहिए, लेकिन आज जब महिलाएं अपने हक, सम्मान और बराबरी के सवाल पूछ रही हैं, तो समाज के पास परंपराओं के अलावा कोई दूसरा ठोस जवाब नहीं बचता।
अगर हम अपनी मैरिड लाइफ और आने वाली पीढ़ी के रिश्तों को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो हमें अपनी सोच बदलनी होगी। बेटियों को रिश्ते संभालना सिखाने के साथ-साथ बेटों को भी रिश्तों में बराबरी, सम्मान और जिम्मेदारी निभाना सिखाना बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष
परवरिश का यह दोहरा पैमाना शादीशुदा जिंदगी में तनाव और कड़वाहट की सबसे बड़ी वजह बनता है। एक सुखी और स्वस्थ मैरिड लाइफ के लिए दोनों साथियों का एक-दूसरे का सम्मान करना और जिम्मेदारियों को बराबर बांटना जरूरी है।
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