अक्सर लोगों को लगता है कि तलाक या ब्रेकअप का फैसला अचानक किसी एक दिन लिया जाता है, लेकिन असलियत यह है कि कानूनी कागजों पर दस्तखत करने या अलग होने से कई साल पहले ही रिश्तों में दूरी आनी शुरू हो जाती है। इसकी शुरुआत होती है बार-बार होने वाले वही पुराने झगड़े, अनसुनी जरूरतें, बेनतीजा बातें और वे समस्याएं जो दिखती तो हैं पर कभी सुलझती नहीं। ऐसे में रिश्ते में कड़वाहट का सफर शुरू हो जाता है। इसी परिस्थिति के बारे में समझने के लिए हमने काउंसलर एंड इमोशनल वेलनेस अंकिता कोल से भी बात की है। जानते हैं आगे...
रिश्ते में कड़वाहट का सफर कैसे शुरू होता है?
जब किसी रिश्ते में दिक्कतें आती हैं, तो वह एक तय ढर्रे से गुजरता है। ये निम्न प्रकार है-
1. शिकायत और उम्मीद
शुरुआत शिकायत से होती है, जहां दोनों में से कोई एक अपनी तकलीफ खुलकर बताता है। इसके बाद बातचीत होती है, बदलाव के वादे किए जाते हैं और उम्मीद जगती है कि सब ठीक हो जाएगा।
2. लाचारी और समझौता
महीने या साल बीत जाने के बाद भी जब कुछ नहीं बदलता, तो धीरे-धीरे निराशा और बेबसी हावी होने लगती है। इसके बाद इंसान स्थिति को स्वीकार कर लेता है या तो वे बिना किसी शिकायत के उस समस्या के साथ जीना सीख लेता है या फिर रिश्ते से बाहर निकल जाता है।
3. खामोशी का दौर
कई जोड़े इनमें से कोई रास्ता नहीं चुनते। वे सबसे आखिरी पड़ाव में पहुंच जाते हैं, जिसे खामोशी कहते हैं। वे मुद्दों पर बात करना ही बंद कर देते हैं और तकलीफों को मन में दबा लेते हैं। यहीं से शुरुआत होती है रिश्तों में "इमोशनल बर्नआउट" की।
क्या है इमोशनल बर्नआउट?
रिश्ते में इमोशनल बर्नआउट का मतलब लगातार बहस करना नहीं है, बल्कि पूरी तरह उम्मीद छोड़ देना है। यह वह दौर होता है जब पार्टनर के साथ रहने से ज्यादा सुकून अकेले रहने में मिलने लगता है। साथ वक्त बिताने के बजाय आप अंदर ही अंदर यह चाहने लगते हैं कि सामने वाला काम में या दोस्तों के साथ व्यस्त रहे, क्योंकि दूरी उस बेनतीजा बातचीत से ज्यादा हल्की लगती है।
साइलेंट डिवोर्स के मुख्य संकेत
जब रिश्ता दिल से खत्म होने लगता है, तो उसमें से प्रयास गायब हो जाते हैं।
- बातचीत का दायरा सीमित होना: डेट नाइट्स और छोटे-छोटे प्यारे पल बंद हो जाते हैं। बातें केवल जरूरतों तक सिमट जाती हैं, जैसे "बिल भरा या नहीं?" या "खाने में क्या बना है?"
- झगड़ों का खत्म हो जाना: बहस न होना हमेशा मजबूत रिश्ते की निशानी नहीं होती। कई बार इसका मतलब यह होता है कि दोनों ने एक-दूसरे से उम्मीद करना छोड़ दिया है।
- भावनात्मक दूरी: साथ में घूमना या छुट्टियां बिताना भी थकाऊ लगने लगता है, क्योंकि दोनों शारीरिक रूप से साथ होकर भी मानसिक रूप से मीलों दूर होते हैं।
प्यार का शांत अंत
रिश्ते की सबसे दुखद बात यह है कि बाहर से सब कुछ सामान्य नजर आता है, क्योंकि कोई बड़ा हंगामा या विवाद नहीं होता, लेकिन अंदर ही अंदर दो लोग एक-दूसरे का साथ चुनना बंद कर चुके होते हैं। प्यार हमेशा शोर-शराबे के साथ खत्म नहीं होता, यह अक्सर अनसुलझी बातों की खामोशी में धीरे-धीरे गायब हो जाता है।
निष्कर्ष
कोई भी रिश्ता उस दिन खत्म नहीं होता जिस दिन दो लोग अलग होते हैं। रिश्ता उस दिन खत्म होता है जिस दिन वे एक-दूसरे को समझना, संभालना और जुड़ने की कोशिश करना छोड़ देते हैं। अगर समय रहते इन संकेतों को समझ लिया जाए, तो बातचीत के जरिए रिश्ते को टूटने से बचाया जा सकता है।
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