भारतीय सिनेमा का इतिहास दशकों पुराना है। मूक फिल्मों से लेकर पहली बोलती फिल्म, ब्लैक एंड व्हाइट से लेकर कलर्ड फिल्म्स के अलावा कंटेट, कहानी, अदायगी के तरीके और गानों समेत लगभग हर चीज में बदलाव हुआ है। पहले की फिल्मों के मुकाबले आज कंटेट काफी बोल्ड हो चुका है, वहीं नई फिल्मों में गाने पुरानी फिल्मों से काफी कम होने लगे हैं। आज की तारीख में बॉलीवुड फिल्मों की कल्पना भी बिना गानों के करना बहुत मुश्किल है। रोमांस हो, एक्शन हो, ब्रेकअप हो या किसी और इमोशन को जुबां देनी हो, गानों के बिना ये थोड़ा मुश्किल ही लगता है। यही वजह है कि बॉलीवुड में एक्टर्स के साथ ही प्लेबैक सिंगर्स की भी खास जगह है।
लता मंगेशकर, किशोर कुमार और मोहम्मद रफी हों या सोनू निगम, अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल, फिल्मी दुनिया में सिंगर्स ने प्लेबैक सिंगिग के दम पर गायकी को एक अलग मुकाम तक पहुंचाया है, लेकिन क्या आपको पता है कि हमेशा से फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग नहीं होती थी, बल्कि एक वक्त पर एक्टर्स डायलॉग की तरह गानों को गाया करते थे। चलिए आपको बताते हैं इंडियन सिनेमा में प्लेबैक सिंगिंग के इतिहास की दिलचस्प कहानी।
फिल्मों में पहले ऐसे गाए जाते थे गाने
सिनेमा की शुरुआत के वक्त चीजें काफी अलग थीं। उस वक्त न तो इतनी तकनीक थीं और न ही शूटिंग या एडिटिंग इतनी आसान होती थी। उस वक्त एक ही एक्टर मेल और फीमेल किरदार प्ले करता था। यहां तक कि गाने भी एक्टर्स ही गाते थे। साल 1931 में बनी पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' के वक्त कोई प्लेबैक तकनीक नहीं थी। उस समय गानों के लिए स्टूडियो और सिंगर्स नहीं हुआ करते थे। एक्टर्स की फिल्म के गानों को डायलॉग की तरह गाते थे और संगीतकार उसी के पीछे म्यूजिक देते थे।
ये काफी मुश्किल था क्योंकि अगर कोई भी गलती हो जाए, तो पूरा सीन और पूरा गाना फिर से शूट करना पड़ता था। इस समय पर आवाज की क्वालिटी भी बहुत अच्छी नहीं होती थी, क्योंकि एक ही माइक्रोफोन का इस्तेमाल होता था। कहा जाता है कि फिल्म की शूटिंग के दौरान ही एक्टर्स कैमरे के पीछे या सीधे लाइव गाना गाते थे और कंपोजर्स कैमरे से छुपकर म्यूजिक दिया करते थे ताकि वो कैमरे में कैद न हो।
इस फिल्म से हुई थी प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत
कहा जाता है कि प्लेबैक सिंगिंग की भारतीय फिल्मों में शुरुआत फिल्म 'धूप छांव' से हुई थी। इस फिल्म का गाना 'मैं खुश होना चाहूं' बॉलीवुड का पहला प्लेबैक सॉन्ग माना जाता है। इसे संगीतकार राय चंद बोराल और निर्देशक नितिन बोस ने तैयार किया था। इस गाने के बाद से प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत हुई और एक्टर्स परदे के आगे लिंप सिंक करने लगे। इसके बाद एक्टर्स को केवल अदायगी पर ध्यान देना होता था और सुरीली आवाज वाले लोग सिंगिंग में जाने लगे। कहा जाता है कि आजादी से पहले पाकिस्तानी सिंगर नूरजहां और केएल सहगल ने भारत में इस सिंगिंग को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई और फिर साल 1950 के बाद लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी समेत कई सिंगर्स ने प्लेबैक सिंगिंग को आगे बढ़ाया।
अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी हो तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
