उम्र बढ़ने के साथ लोग अक्सर अपनी सेहत को बनाए रखने के लिए वर्कआउट, संतुलित खानपान, रूटीन मेडिकल चेकअप और मानसिक कसरत पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन एक अध्ययन से यह बेहद दिलचस्प बात सामने आई है कि मानसिक और शारीरिक सेहत के साथ-साथ आपके जीवन का उद्देश्य भी बुजुर्गों में अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी बीमारियों को टालने में अहम भूमिका निभाता है। जी हां, शोधकर्ताओं का मानना है कि जिन बुजुर्गों के जीवन में एक स्पष्ट लक्ष्य होता है, उनमें अल्जाइमर होने की संभावना देर से होती है और वे अधिक समय तक स्वस्थ जीवन जीते हैं। इसके लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते है आगे...

अल्जाइमर और डिमेंशिया के लिए कैसे हुआ शोध?

'द अमेरिकन जर्नल ऑफ जेरियाट्रिक साइकियाट्री' में प्रकाशित इस शोध में 2,558 बुजुर्गों को शामिल किया गया था, जिन्हें अध्ययन की शुरुआत में डिमेंशिया की कोई समस्या नहीं थी। वैज्ञानिकों ने 6.89 सालों तक इन बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन के उद्देश्यों की नियमित जांच की।

इस अध्ययन के दौरान कुल 520 लोगों में अल्जाइमर के लक्षण विकसित हुए। बता दें कि यहां जीवन के उद्देश्य से मतलब केवल किसी शौक से नहीं था, बल्कि रोज के जीवन के कार्यों में सार्थकता और एक खास लक्ष्य की भावना से था।

डिमेंशिया की शुरुआत में 6 साल का अंतर

शोध के परिणामों में जीवन के लक्ष्य और डिमेंशिया की शुरुआत के बीच एक साफ संबंध देखा गया-

  • उच्च लक्ष्य वाले लोग: जिन बुजुर्गों में जीवन जीने का उद्देश्य बहुत मजबूत था, उनमें अल्जाइमर के लक्षण लगभग 95 साल की आयु में देखे गए।
  • निम्न लक्ष्य वाले लोग: इसके विपरीत, जिन लोगों के जीवन में किसी खास उद्देश्य की कमी थी, उनमें यह समस्या औसतन 89 साल की आयु में ही शुरू हो गई।
  • मध्यम लक्ष्य वाले लोग: इस समूह के लोगों में बीमारी की शुरुआत लगभग 92.5 साल की उम्र में हुई।

लिंग, शिक्षा, डिप्रेशन का स्तर, मेडिकल स्थितियों आदि कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी यह 6 साल का अंतर बिल्कुल साफ दिखाई दिया।

लंबी उम्र और मानसिक मजबूती का जरिया

यह अध्ययन केवल डिमेंशिया तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसका असर जीवन पर भी देखा गया। जीवन का मजबूत उद्देश्य रखने वाले बुजुर्गों की मृत्यु आयु 88.9 वर्ष पाई गई, जबकि बिना किसी उद्देश्य वाले समूह में यह 85.1 साल थी। यानी जीवन का लक्ष्य करीब 4 साल ज्यादा जीने में भी मददगार साबित हो सकता है।

एक्सपर्ट का मानना है कि कोई लक्ष्य होना दिमाग के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जो बढ़ती उम्र में भी व्यक्ति को एक्टिव और मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखता है।

लक्ष्य का मतलब लगातार काम करना नहीं

एक्सपर्ट के मुताबिक, जीवन के उद्देश्य का अर्थ हर समय व्यस्त रहना, कड़ी मेहनत करना या कोई बहुत बड़ा मुकाम हासिल करना बिल्कुल नहीं है। बुजुर्गों के लिए उद्देश्य का मतलब इन छोटे-छोटे कार्यों से हो सकता है-

  • अपने पोते-पोतियों या नाती-नातिनों की देखभाल करना और उनके साथ समय बिताना।
  • किसी को अपनी कला, हुनर या ज्ञान सिखाना।
  • पेड़-पौधों की देखभाल करना या गार्डनिंग करना।
  • सामाजिक कार्यों में योगदान देना या समाज सेवा करना।
  • दोस्तों से संबंध बनाए रखना और रोजमर्रा की छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को खुशी से निभाना।

निष्कर्ष

यद्यपि यह एक ऑब्जर्वेशनल अध्ययन था जो सीधे तौर पर यह दावा नहीं करता कि लक्ष्य खोजने से बीमारी पूरी तरह रुक जाएगी, फिर भी यह मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को बतातता है। बढ़ती उम्र में स्वस्थ रहने का मतलब सिर्फ शरीर को बचाना नहीं, बल्कि हर सुबह उठने की एक अर्थपूर्ण वजह होना भी है।

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Main Images: magnific