टैक्स की खबरों पर निगाह जाते ही बहुत से लोग अखबार का पन्ना पलट देते हैं, क्योंकि उन्हें यह विषय जटिल लगता है। अधिकांश लोग अपने इनकम टैक्स प्रबंधन की जिम्मेदारी दूसरों को सौंप देते हैं। कहीं पिता यह जिम्मेदारी संभालते हैं, तो कुछ लोग पति को यह कार्य सौंपकर राहत महसूस करते हैं। साल में एक बार सीए को संबंधित दस्तावेज सौंपने के बाद हमें लगता है कि वे सही निर्णय लेंगे। उससे जुड़ी भाषा, आकलन वर्ष, टीडीएस, एडवांस टैक्स, सरचार्ज और सेस के बारे में हमें कभी बताया ही नहीं गया, इसलिए हम इन्हें जटिल समझते हैं और इनसे दूर रहना पसंद करते हैं।
जिस पर आप विश्वास करती हों, उसे टैक्स रिटर्न फाइल करने की जिम्मेदारी सौंपने में कोई हर्ज नहीं है, पर एक बात है जो ठीक नहीं है। अपनी अज्ञानता के कारण निवेश से जुड़े निर्णयों को किसी और को सौंपना ठीक नहीं है। जब आप निवेश करना आरंभ करती हैं, तो वहीं से टैक्स आपके साथ हो लेता है। यदि आप यह नहीं समझेंगी कि चीजें किस तरह काम करती हैं, तो हो सकता है कि आपका कोई निर्णय आप पर ही भारी पड़ जाए।
इस स्तंभ में हम आपको भारतीय कर प्रणाली के बारे में सब कुछ समझाने का दावा नहीं करते। हो सकता है कि बहुत सी बातें आपके दैनिक काम न आएं। इसे पूरी तरह समझने के लिए काफी पढ़ना पड़ता है, पर हम कुछ ऐसी बातों की समझ बढ़ाने का प्रयास करेंगे, जिन्हें निवेशकों को समझना चाहिए कि जब आप निवेश से पैसा बनाते हैं और सरकार टैक्स लगाती है, तो आपका धन जाता कहां है।
वहीं से शुरुआत करते हैं, जिसे आप पहले से जानती हैं। मासिक सैलरी से आपका घर चलता है और उसी पर टैक्स लगाया जाता है। उसकी दर आपकी आय सीमा पर निर्भर करती है। न्यू टैक्स रिजीम वर्ष 2025-26 में चार लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं है। चार से आठ लाख की आय पर पांच प्रतिशत टैक्स है। आठ से 12 लाख पर 10 प्रतिशत और 12 से 16 लाख की आय पर 15 प्रतिशत टैक्स देय होता है। आय सीमा बढ़ने के साथ ही टैक्स भी बढ़ता है। 24 लाख से अधिक की आय पर 30 प्रतिशत तक टैक्स लगता है। यहां कुछ छूट भी मिलती है, जिससे 12 लाख तक की आय पर टैक्स से बचत हो जाती है। आपने इस विषय में सुना होगा, पर कुछ ऐसी बातें भी हैं, जिनके बारे में कम लोग जानते हैं। वह जानकारी काफी मायने रखती है।
जब आप निवेश करती हैं, तो आपका धन बढ़ता है। जब आप उसे बेचती हैं, तो जो लाभ अर्जित होता है, उसे काम से होने वाली आय में शामिल नहीं किया जाता। यह उससे बहुत अलग है। इस लाभ के लिए 'कैपिटल गेन' शब्द इस्तेमाल होता है, जिस पर अलग से टैक्स लगता है। आमतौर पर कैपिटल गेन पर टैक्स की दर कम होती है या कई बार यह शून्य होती है।
इसे यूं समझें। आपने एक लाख रुपये म्यूचुअल फंड्स में तीन साल पहले लगाए। आज उनका मूल्य बढ़कर 1.60 लाख हो गया। आप उसे बेचने का निर्णय लेती हैं। इस तरह आपने 60 हजार रुपये का लाभ कमाया, यह राशि कैपिटल गेन है। टैक्स उसी 60 हजार की राशि पर लगेगा, न कि पूरे 1.60 लाख रुपये पर। जो मूल राशि आपने निवेश की, उस पर कभी टैक्स नहीं लगता। उससे जो लाभ आप कमाती हैं, सिर्फ उस पर टैक्स लगता है।
इस बात की स्पष्टता से आपका काफी तनाव दूर हो जाएगा। बहुत से लोग निवेश पर टैक्स के बारे में सोचते हैं, तो उन्हें लगता है कि पूरा फोलियो ही उसके दायरे में है और टैक्स देने के बाद कुछ बचेगा ही नहीं, जबकि यह सच नहीं होता। आप सिर्फ लाभ पर टैक्स देते हैं। इसकी दर दो बातों पर निर्भर करती है कि आपने किस तरह का निवेश चुना है और वह कितने समय के लिए है। हो सकता है कि उस पर टैक्स आपकी सैलरी पर देय टैक्स से कम या शून्य हो।
निवेश पर टैक्स को लेकर महत्वपूर्ण बातें
सरकार दो प्रकार के कैपिटल गेन में फर्क करती है, जिसका आधार एक सरल सा सवाल है कि निवेश को बेचने से पहले आपने उसे कितने समय तक अपने पास रखा या जारी रखा है। यदि कुछ ही समय अपने पास रखने के बाद उसे बेच दिया, तो जो लाभ होगा वह 'शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन' कहलाएगा। वहीं, लंबे समय के बाद बेचकर लाभ कमाया है, तो उसे 'लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन' कहा जाएगा। शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन पर टैक्स की दर अधिक, जबकि लॉन्ग टर्म में कम होती है और कुछ मामलों में अतिरिक्त लाभ भी मिलते हैं। यह निवेश के प्रकार पर निर्भर करता है कि किसे शॉर्ट टर्म और किसे लॉन्ग टर्म कहा जाएगा। इक्विटी म्यूचुअल फंड्स, डेट म्यूचुअल फंड्स, गोल्ड और प्रॉपर्टी, सभी में विभिन्न समय सीमाएं होती हैं, जिस पर निर्भर करता है कि निवेश किस श्रेणी में आएगा। अगले हफ्ते हम प्रत्येक के बारे में विस्तार से बात करेंगे।
एक बात को सिद्धांत बना लें निवेश में समय मायने रखता है, क्योंकि वहां चक्रवृद्धि का नियम काम करता है। इसका महत्व इसलिए भी है कि आप गेन पर कितना टैक्स देंगे, यह भी समय सीमा पर निर्भर करता है। किसी निवेश को यदि आप एक निश्चित अवधि तक अपने साथ रखती हैं, तो संभव है कि ऊंची टैक्स दर के बजाय कम टैक्स देना पड़े या वह टैक्स मुक्त हो जाए। यहां कोई झोल या तिकड़म वाली बात नहीं है। यह हमारी कानूनी व्यवस्था में है। यहां आप टैक्स से बचने की जुगत नहीं लगाते, बल्कि यह तो टैक्स को लेकर एक समझदारी भरा निर्णय होता है।
अधिकांश लोग सारी जिंदगी सोचते रह जाते हैं कि टैक्स बहुत जटिल विषय है और यह एकाउंटेंट्स, पतियों या सरकारी फॉर्म तक ही सीमित रहना चाहिए, जबकि निवेश पर टैक्स की शब्दावली इतनी जटिल नहीं है। इसे समझने के लिए स्वयं से दो सवाल करें—आपने कहां निवेश किया है और कितने समय तक उसे जारी रखा है? इसके बाद सब कुछ स्पष्ट होता जाएगा।
अगले हफ्ते, हम निवेश उत्पादों की बात करेंगे इक्यूटी फंड्स, डेट फंड्स, गोल्ड, फिक्स्ड डिपॉजिट्स, पीपीएफ इत्यादि। उन पर क्या नियम लगते हैं, उन्हें कितने समय तक पास रखना चाहिए और किसमें पूर्ण छूट मिलती है। यह समझने के बाद स्वाभाविक रूप से आपके मन में बचत करने की इच्छा पनपेगी।
आपके पास क्या है, ये जानना जितना जरूरी है, उतना ही ये समझना भी महत्वपूर्ण है कि उसे कैसे बढ़ाएं। यही लक्ष्मी का मूल है।
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