भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि आते ही चारों तरफ 'गणपति बप्पा मोरया' के जयकारे गूंजने लगते हैं। ढोल-नगाड़ों के साथ बप्पा का स्वागत किया जाता है और पूरे 10 दिनों तक देश भर में भक्ति का माहौल बना रहता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि विघ्नहर्ता गणेश जी को 10 दिनों तक ही घर में स्थापित क्यों किया जाता है और इसके बाद उनका विसर्जन क्यों होता है? इसके पीछे गहरी पौराणिक मान्यताएं और कथाएं छिपी हैं। इस लेख में दिए गए इनपुट वृंदावन के अनंतदास जी महाराज द्वारा दिए गए हैं। ऐसे में जानते हैं, क्या कहते हैं महाराज जी...
गणेश जी 10 दिनों तक मिट्टी के रूप में क्यों होते हैं विराजमान?
गणेश उत्सव का सबसे मुख्य संबंध महाभारत ग्रंथ के निर्माण से जुड़ा है। पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत जैसा महाकाव्य लिखने के लिए एक ऐसे लेखक की तलाश थी जो बिना रुके लगातार लिख सके। इसके लिए उन्होंने बुद्धि के देवता भगवान श्री गणेश से प्रार्थना की।
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जब मान गए बप्पा
गणेश जी लिखने के लिए तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि उनकी कलम एक पल के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए। महर्षि वेदव्यास जी ने भी चतुरता से शर्त रखी कि गणेश जी हर श्लोक का अर्थ समझने के बाद ही उसे लिखेंगे। जब बप्पा कठिन श्लोकों का गूढ़ अर्थ समझते, उतने समय में वेदव्यास जी अगला श्लोक रच लेते। यह लेखन कार्य लगातार 10 दिनों तक बिना रुके चलता रहा।
बढ़ गया शरीर का तापमान
लगातार लिखने के कारण गणेश जी के शरीर का तापमान बहुत बढ़ गया। शरीर की तपन को कम करने के लिए उनके शरीर पर मिट्टी का लेप लगाया गया। अनंत चतुर्दशी यानी दसवें दिन जब ग्रंथ पूरा हुआ, तब वेदव्यास जी ने बप्पा को जल में स्नान कराकर उनके शरीर को शीतलता प्रदान की। इसी याद में 10 दिनों तक मिट्टी के बप्पा बिठाए जाते हैं और दसवें दिन उनका विसर्जन किया जाता है।
कैलाश से पृथ्वी पर बप्पा का आगमन
एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ था। माना जाता है कि इन 10 दिनों के लिए गणपति जी अपने धाम कैलाश पर्वत से उतरकर पृथ्वी लोक पर अपने भक्तों के बीच रहने आते हैं।
इन दस दिनों में भक्त बप्पा को अपने परिवार का सदस्य मानकर उनकी सेवा करते हैं। उन्हें मोदक, लड्डू और विभिन्न पकवानों का भोग लगाया जाता है। दसवें दिन बप्पा भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर वापस कैलाश पर्वत लौटने की तैयारी करते हैं, इसलिए भारी मन से लेकिन अगले बरस जल्दी आने की कामना के साथ उन्हें जल में विसर्जित किया जाता है।
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निष्कर्ष
10 दिनों तक बप्पा को घर में विराजित करने की यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भगवान गणेश के अथक परिश्रम और उनके प्रति भक्तों के अगाध प्रेम का प्रतीक है। मिट्टी के रूप में बप्पा की स्थापना हमें प्रकृति से जोड़ती है और 10 दिनों की सेवा के बाद विसर्जन यह सिखाता है कि जो इस संसार में आया है, उसे अपने लोक वापस लौटना ही है।
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