Jitiya Vrat Lok Geet: जितिया व्रत में माताओं द्वारा अपने संतानों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाने वाला उपवास है। मुख्य रूप से यह पर्व बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के क्षेत्रों में यह तीन दिनों तक मनाया जाता है। साथ ही इस पर्व पर घर-आंगन और गलियों में जतिया से जुड़े पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं। आज के इस लेख में हम आपको एक ऐसे गीत के बारे में बताने जा रहे हैं, जो इस पर्व पर खासतौर से 'जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ' गीत गाया जाता है। नीचे लेख में पढ़ें इसका मतलब।

'जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ' लोकगीत के लिरिक्स

जुग-जुग जिए मोर,
जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ
जिउत वाहन देवता से करब हम अरजिया
ऐ हो सखी भुखीब, ऐ हो सखी भुखीब जितिया के परबिया...
बड़ा भारी होला सखी जितिया के बरतिया, बड़ा भारी होला
तीन दिन के होला सखी पावन परबिया
न खाये उपवास पारण के बा बिधिया
आसीन अनहरिया के अस्टमी तिथि के
जीवतिया पुजाला निरजल व्रत रख के
सासु जी से पूछब, सासु जी से...
सासु जी से पूछब कुल व्रत के नियमिया
ऐ हो सखी भुखीब, ऐ हो सखी भुखीब जितिया के परबिया...
बड़ा भारी होला सखी जितिया के बरतिया, बड़ा भारी होला
सप्तमी के दिने होला गंगा आसन्नवा
नवनि संग मडवा वर्ती खाये एहि दिनवा
नेनुवा के पात पर पुआ पकवनवा
चील सियारिन दिहल जाला भोगवा
गोतनि सग करब हम, गोतनि सग...
गोतनि सग करब हम भोर में सरगहिया
ऐ हो सखी भुखीब, ऐ हो सखी भुखीब जितिया के परबिया...
बड़ा भारी होला सखी जितिया के बरतिया, बड़ा भारी होला
लव कुश पुजला सखी अष्टमी के संझिया
कथा सुनीली बूढ़ होके चाहे कन्या
नवमी के भोर होला पारण के दिनवा
कांडा गिराउके बनेला भोजनवा
सईया से मगाइब हम...
सईया से मगाइब हम सोने के जिउतिया
ऐ हो सखी भुखीब, ऐ हो सखी भुखीब जितिया के परबिया...
बड़ा भारी होला सखी जितिया के बरतिया, बड़ा भारी होला...

'जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ' लोकगीत का मतलब

जुग-जुग: युग-युग तक, लंबी आयु तक (अनंत काल तक)
जिए: जीवित रहे, स्वस्थ रहे
मोर: मेरा
बबुआ: छोटा बच्चा, लाडला बेटा
दुलरुआ: दुलार किया हुआ, बहुत प्यारा, लाड़-प्यार से पला हुआ

इस पंक्ति का सीधा और सुंदर अर्थ है "मेरा लाडला और दुलारा बेटा युग-युग तक (लंबी आयु तक) जीवित रहे और खूब फले-फुले। यह किसी माता, दादी या परिवार की बुजुर्ग महिला के मन से उमड़ने वाले उस अगाध स्नेह और आशीर्वाद को दर्शाता है, जिसमें वे भगवान से बच्चे की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्जवल भविष्य की कामना करती हैं। नीचे समझें पूरा अर्थ-

गीत की शुरुआत में माता जीमूतवाहन (जिउत वाहन) देवता से हाथ जोड़कर प्रार्थना करती है कि उसका लाडला बेटा (बबुआ) युग-युग तक जिए और स्वस्थ रहे।

माताएं आपस में चर्चा करती हैं कि जितिया का यह पावन व्रत बहुत कठिन होता है, जो पूरे तीन दिनों तक चलता है जिसमें निर्जला (बिना पानी के) उपवास रखा जाता है।

फिर माताएं सप्तमी (नहाए-खाए के दिन) के दिन गंगा स्नान और सात्विक भोजन (जैसे मड़वा की रोटी, नोनी का साग) ग्रहण करने का बखान करती हैं।
भोग और सरगहिया- नेनुआ (तोरई) के पत्ते पर पुआ और पकवान रखकर चील और सियारिन को भोग अर्पित किया जाता है और सुबह उठकर 'सरगहिया' (व्रत से पहले खाया जाने वाला भोजन) किया जाता है।
अष्टमी- इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखकर भगवान जिउतवाहन की पूजा करती हैं, कथा सुनती हैं और लव-कुश का स्मरण करती हैं।
नवमी (पारण)- व्रत के समापन (पारण) के दिन विशेष पकवान बनाए जाते हैं और इस शुभ अवसर पर पति (सईया) से सोने का जितिया लॉकेट मंगवाने की परंपरा का जिक्र है।

जितिया व्रत पर क्यों गए जाते हैं संतान से जुड़े लोकगीत?

जितिया व्रत के दौरान संतान से जुड़े लोकगीत गाए जाने की परंपरा बहुत गहरी और भावनात्मक है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और रक्षा के लिए रखती हैं। चूंकि यह व्रत तीन दिन तक बिना पानी के (निर्जला) रखा जाता है, जो शारीरिक रूप से बहुत कठिन होता है, इसलिए इन गीतों के जरिए माताएं अपनी थकान और दर्द को भूल जाती हैं।

जब माताएं समूह में बैठकर "जुग-जुग जिए मोर बबुआ दुलरुआ" जैसे गीत गाती हैं, तो उन्हें एक आंतरिक शक्ति और मानसिक शांति मिलती है। इन गीतों के माध्यम से वे भगवान जीमूतवाहन से अपनी संतान के सुखी जीवन की प्रार्थना करती हैं। साथ ही, यह लोकगीत हमारी पुरानी संस्कृति, परंपराओं और एक मां के अटूट प्रेम को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का जरिया हैं।

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