दोस्त से अनबन हो जाना, पॉकेट मनी खो जाना या किसी बड़े से डांट पड़ना, ये ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें बच्चे अक्सर घर आकर नहीं बताते। जब यही छोटी समस्या कई दिनों बाद बड़ी मुसीबत बन जाती है और पेरेंट्स को पता चलता है, तो उनका पहला सवाल यही होता है कि तुमने यह बात पहले क्यों नहीं बताई?
आमतौर पर पेरेंट्स को लगता है कि बच्चा उन पर भरोसा नहीं करता, लेकिन सच्चाई यह है कि बच्चे बातें सिर्फ अविश्वास के कारण नहीं छिपाते, बल्कि वे पेरेंट्स के पिछले बर्ताव से मिली सीख के आधार पर यह तय करते हैं कि उन्हें सच बोलना चाहिए या नहीं। ऐसे में बाक छुपाने के पीछे के कारण के बारे में पता होना जरूरी है। इसके लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं आगे...
बच्चे खुद तय करने लगते हैं कि कौन सी बात बतानी है
जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, वे यह समझने लगते हैं कि अपनी हर छोटी बात माता-पिता को बताना जरूरी नहीं है। बच्चे अलग-अलग मामलों में पेरेंट्स से बातें शेयर करने के अलग-अलग नियम बनाते हैं। कुछ बच्चे पेरेंट्स की नाराजगी के डर से चुप रहते हैं, तो कुछ इसे अपनी निजी बात समझते हैं या फिर उन्हें लगता है कि मुद्दा इतना बड़ा नहीं है कि उस पर चर्चा की जाए।
- इससे अलग बच्चा सोच सकता है कि वह खुद इस समस्या से निपट लेगा।
- उसे लगता है कि इस बात को बताने पर घर में बेवजह की बहस या बड़ा बखेड़ा खड़ा हो जाएगा।
- कई बार खुद से मामला सुलझाने की यह कोशिश उल्टी पड़ जाती है और समस्या बढ़ जाती है।
जब बच्चा सच बताए तो पेरेंट्स क्या करें?
एक्सपर्ट के अनुसार, जब बच्चा काफी समय बाद कोई बात बताए, तो उस समय पेरेंट्स की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है। तुमने पहले क्यों नहीं बताया कहने के बजाय कहें कि अच्छा हुआ तुमने मुझे बताया, अब बताओ कि क्या हुआ था।
- बच्चे से पूछें कि क्या वह सिर्फ अपनी बात कहना चाहता है या उसे आपकी मदद चाहिए।
- अगर मामला छोटा है, तो तुरंत सारे फैसले खुद लेने के बजाय बच्चे की बात सुनें।
- बच्चे से जानें कि उसने इस समस्या को हल करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए हैं।
- बच्चे को यह अहसास कराएं कि बात बताने का मतलब यह नहीं है कि उसकी आजादी छीन ली जाएगी।
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हर बात का रिपोर्ट कार्ड जरूरी नहीं
माता-पिता को यह समझना होगा कि बच्चों को अपनी हर छोटी गलती, शर्मिंदगी या बहस का हिसाब देने की जरूरत नहीं है। मुख्य बात यह है कि जब भी वे किसी मुश्किल में फंसें, तो उन्हें यह भरोसा होना चाहिए कि वे अपने माता-पिता के पास जा सकते हैं।
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अगर कोई बच्चा कहता है कि मैंने बात इसलिए नहीं बताई क्योंकि मैं इसे खुद ठीक करना चाहता था, तो यह उसकी आत्मनिर्भरता को दर्शाता है, लेकिन अगर बच्चा कहे कि मैंने बात इसलिए छुपाई क्योंकि आप गुस्सा करते, तो यह संकेत है कि उसे सच बोलने में डर लगता है। कई बार समस्या कितनी बड़ी है, इससे फर्क नहीं पड़ता, बात बताने के बाद क्या होगा, यही तय करता है कि बच्चा मुंह खोलेगा या चुप रहेगा।
निष्कर्ष
बच्चों का बातें छुपाना सिर्फ उनकी नदानी नहीं, बल्कि पेरेंट्स के प्रतिक्रिया देने के तरीके का परिणाम भी हो सकता है। जब घर में डर के बजाय समझदारी और शांति का माहौल होता है, तो बच्चे बड़ी से बड़ी बात भी बिना झिझक के शेयर करते हैं।
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