भारत में जब कोई परिवार प्रापर्टी खरीदता है, तो रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के दौरान एक क्षण आता है जब ये निर्णय लेना पड़ता है कि दस्तावेजों पर किसका नाम दर्ज होगा। बहुत से घरों में ये निर्णय लेते समय ज्यादा सोच-विचार नहीं किया जाता। होम लोन पति के नाम पर होता है, आय भी मुख्यत: उसकी ही होती है इसलिए प्रापर्टी पर नाम भी उसका नाम ही दर्ज हो जाता है। पत्नी गवाह या सह ऋणी के रूप में हस्ताक्षर करती है। परिवार की जो सबसे मूल्यवान परिसंपत्ति होती है, उस पर कहीं भी उसका नाम नहीं होता। ये सब बेहद सामान्य लगता है।
अधिकांश राज्यों में संपत्ति की रजिस्ट्री के लिए पुरुषों की तुलना में महिलाओं को स्टांप शुल्क कम देना पड़ता है। दिल्ली में महिलाओं को चार प्रतिशत जबकि पुरुषों को छह प्रतिशत स्टांप शुल्क देना पड़ता है। हरियाणा में महिलाओं को पांच प्रतिशत जबकि पुरुषों को सात प्रतिशत स्टांप शुल्क देना पड़ता है। उत्तर प्रदेश में एक करोड़ तक की संपत्ति पर महिलाओं को स्टांप शुल्क में एक प्रतिशत की छूट दी गई है। यानी 60 लाख के फ्लैट को यदि महिला के नाम पर खरीदा जाता है तो स्टांप शुल्क में 60 हजार तक की तात्कालिक बचत हो जाएगी। प्रापर्टी पर महिला का नाम दर्ज होने पर ये धन परिवार के पास ही रह जाएगा।
स्टांप शुल्क तो बस एक शुरुआत है।
प्रापर्टी पर महिला का नाम दर्ज होने के कानूनी मायने हैं। उससे जो अधिकार सुनिश्चित होते हैं वो सह ऋणी या गवाह को नहीं प्राप्त होते। यदि शादी समाप्त होती है या जीवनसाथी की मृत्यु हो जाती है, परिवार में संपत्ति को लेकर कोई विवाद है तो जिस महिला के नाम पर दस्तावेज हैं, उसके अधिकार स्पष्ट रूप से परिभाषित होते हैं और उनकी कानूनी बाध्यता होती है। संपत्ति के स्वामित्व से क्रेडिट के लिए स्वतंत्र पात्रता सुनिश्चित होती है। संपत्ति को आधार बनाकर वह व्यवसाय के लिए लोन प्राप्त कर सकती है, उसके लिए अन्य किसी के हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होगी। किसी भी आपात स्थिति में वह परिवार को आर्थिक मजबूती देने के लिए संपत्ति को आधार बनाकर निर्णय ले सकती है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत संपत्ति पर सह स्वामित्व में किसी महिला का नाम होना अनिवार्य माना गया है। आवेदन की श्रेणी के अनुरूप महिला को लाभ प्रदान किए जाते हैं। यह कोई नौकरशाही से जुड़ा निर्णय नहीं है, बल्कि महिलाओं के हित में कल्याणकारी नीतियों का हिस्सा है। महिला के नाम पर मकान होने से परिवार व बाहर की दुनिया में उसकी स्थिति सुदृढ़ होती है। जिन परिवारों ने प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत आवेदन नहीं किया है, उन्हें भी इसका निहितार्थ चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण बात से बहुत सी महिलाएं इस बात से अनभिज्ञ होंगी कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 में बेटियों को पुश्तैनी संपत्ति में बराबरी का अधिकार दिया गया है। जिसकी पुष्टि 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी की। भले ही पिता की मृत्यु 2005 से पूर्व हो गई हो, पर संपत्ति पर बेटियों का अधिकार निर्विवाद है। जो महिलाएं ये सोचती हैं कि पुश्तैनी संपत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं, क्योंकि उन्हें इस बाबत किसी संवाद का कभी हिस्सा नहीं बनाया गया, उन्हें शांत भाव से विचार करना चाहिए कि वास्तव में कानून क्या कहता है।
यदि संपत्ति अकेले पत्नी के नाम पर दर्ज नहीं हो सकती तो वहां उसके नाम पर सह स्वामित्व अच्छा विकल्प हो सकता है। दस्तावेजों पर सह स्वामित्व से उत्तराधिकार, संपत्ति विवाद और सरकारी योजनाओं के लाभ के लिहाज से कानूनी तौर पर स्थिति मजबूत होती है। हालांकि ये संपूर्ण स्वामित्व से काफी अलग है, लेकिन किसी भी तरह का अधिकार न होने की तुलना में बहुत बेहतर है।
आपका नाम दस्तावेजों पर होना चाहिए इसकी जानकारी होना एक बात है। प्रापर्टी खरीदने लायक है ये समझना दूसरी बात है। दोनों बातें संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ी हैं, जिस पर बराबर से ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
एक रुपये भी अदा करने से पहले आपको कुछ चीजों की पुष्टि करनी चाहिए।
रेरा सजिस्ट्रेशन शुरुआती बिंदु होता है। रेरा यानी रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट एक्ट 2016 ने भारत में संपत्ति खरीद में व्यापक बदलाव किया है। पांच सौ वर्ग मीटर से बड़ी कोई भी आवासीय योजना राज्य रेरा प्राधिकरण के अंतर्गत पंजीकृत होनी चाहिए। उसके बाद ही उसका विज्ञापन दिया जा सकता है या बेचा जा सकता है। बिल्डर्स को खरीदार की 70 प्रतिशत प्रतिशत राशि उस प्रोजेक्ट के लिए चिन्हित अकाउंट में जमा करानी होती है। संपत्ति हस्तांतरित (पजेशन) देने में देरी होने पर अनिवार्य हर्जाना देना पड़ता है। प्रत्येक रजिस्टर्ड प्रोजेक्ट की रेरा संख्या होती है। जिसकी पुष्टि राज्य रेरा पोर्टल पर जाकर की जा सकती है। यदि प्रोजेक्ट की कोई रेरा संख्या नहीं है, तो चाहे उसका मूल्य कितना भी लुभावना प्रतीत हो, उससे दूर हो जाने में ही भलाई है।
अगला कदम है कारपेट एरिया और सुपर बिल्ट अप एरिया में अंतर को समझना। बिल्डर्स सामान्यत: सुपर बिल्ट-अप एरिया को विज्ञापित करते हैं, जिसमें लाबी, कारिडोर और कामन स्पेस शामिल होता है। जिस फ्लैट में आप वास्तव में रहते हैं वो कारपेट एरिया होता है जो सामान्यत: 30 से 40 प्रतिशत तक कम होता है। मान लीजिए किसी फ्लैट को 1200 वर्ग फीट का विज्ञापित किया गया है, संभव है कि उसका कारपेट एरिया 800 वर्ग फीट ही हो। रेरा के अनुसार संपत्ति का मूल्य कारपेट एरिया के अनुसार ही बताया जाना चाहिए। इसके बावजूद आपको एक सवाल अवश्य पूछना चाहिए कि कारपेट एरिया कितना है और उसका प्रति वर्ग फीट मूल्य क्या है? ये सामान्य प्रश्न ही स्पष्ट कर देगा कि डील वास्तव में उतनी ही लुभावनी है, जितना प्रथम दृष्टया प्रतीत हुई थी।
बिल्डर एग्रीमेंट पर साइन करने से पहले उसे बड़े ध्यान से पढ़ें। एग्रीमेंट में पजेशन देने की तिथि का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। साथ ही ये भी स्पष्ट उल्लेखित होना चाहिए कि यदि उसमें देरी होती है तो प्रतिमाह बिल्डर कितना हर्जाना अदा करेगा। फ्लैट से जुड़ी सभी जानकारियां उसमें लिखी होनी चाहिए जैसे फ्लोरिंग, फिटिंग, इलेक्ट्रिकल पाइंट्स इत्यादि। यदि इनके उल्लेख में कुछ भी गोलमोल होता है तो समय आने पर ये बात बिल्डर के पक्ष में जाएगी, वो उसे अपने हिसाब से तय कर सकता है।
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भूमि का स्वामित्व भी स्वतंत्र रूप से जांचना चाहिए। रेरा रजिस्ट्रेशन इस बात की पुष्टि नहीं करता कि उस भूमि पर बिल्डर का निर्विवाद स्वामित्व है, जिस पर प्रोजेक्ट तैयार किया जाना है। इसके लिए किसी वकील की सहायता लेना उपयुक्त होगा। भले ही वकील को आप कुछ हजार रुपये अदा करेंगी, लेकिन उपरोक्त बातों की पुष्टि हो जाने से आपकी जीवनभर की पूंजी बर्बाद होने से बच जाएगी।
यदि आप किसी निर्माणाधीन संपत्ति के लिए होम लोन ले रही हैं तो आपको संबंधित उद्देश्य के लिए धन जारी किए जाने से जुड़ी बातें समझनी चाहिए। बैंक स्वीकृत पूर्ण धनराशि एक बार में जारी नहीं करते। जैसे-जैसे निर्माण आगे बढ़ता है, उसके अनुरूप बैंक कई हिस्सों में धनराशि जारी करते हैं। यदि निर्माण बाधित हो जाता है तो धनराशि जारी करने की प्रक्रिया भी बाधित हो जाती है, लेकिन जो राशि जारी हो चुकी है, उस पर इएमआइ की देयता बन जाती है। इस बारे में जानकारी होने से आप मानसिक रूप से तैयार रहेंगी।
इस हफ्ते, यदि आपका परिवार संपत्ति खरीद के बारे में विचार कर रहा है, तो दो बातों पर बातचीत अवश्य करें। प्रथम: संपत्ति के दस्तावेज किसके नाम पर होंगे और क्यों। द्वितीय: क्या रेरा पोर्टल पर जाकर उस प्रोजेक्ट की पुष्टि की गई है।
अगले हफ्ते हम उन चेकलिस्ट की बात करेंगे, जिस पर निवेशक को विचार करना चाहिए जैसे बिल्डर का ट्रैक रिकार्ड, निर्माणाधीन मूल्य व रीसेल, संपत्ति स्वामित्व का वास्तविक मूल्य। साथ ही समझेंगे कि जब चीजें गलत हो जाएं तो क्या करना चाहिए।
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