जनवरी से मार्च माह के दौरान हम एक चीज को लेकर सजग हो जाते हैं, वह है टैक्स। उसके बाद अप्रैल से पुनः एक प्रकार की निश्चिंतता का भाव रहने लगता है, पर जैसे ही वित्तीय वर्ष की समाप्ति का समय नजदीक आता है, लोग परेशान हो उठते हैं। आनन-फानन में अपने सीए को कॉल करते हैं। इनकम टैक्स रिटर्न से संबंधित उन कागजों पर हस्ताक्षर कर देते हैं, जिन्हें ठीक से पढ़ा तक नहीं होता। कई बार वे उन उत्पादों में भी धन लगा देते हैं जो उनके लिए उचित नहीं होते; इसके पीछे वजह सिर्फ इतनी होती है कि वित्तीय वर्ष खत्म होने से पहले टैक्स बचत के लिए कुछ लोगों ने ऐसा करने की सलाह दी थी।

मुझे एक स्कूल शिक्षिका याद आती हैं। उन्होंने लगातार छह साल तक मार्च में नई एंडोमेंट (लाइफ इंश्योरेंस व बचत दोनों के लिए) पॉलिसी ली। हर बार किसी एजेंट ने फरवरी में कॉल करके टैक्स बचत के फायदे गिनाते हुए उन्हें पॉलिसी खरीदने का सुझाव दिया, जिसे उन्होंने मान लिया। जब किसी ने उन्हें समझाया कि वास्तव में उस पॉलिसी में क्या निहित है, तब जाकर उसकी खरीद का क्रम रुका। हालांकि तब तक उनके पास छह ऐसी पॉलिसी थीं, जिनके बारे में वे ज्यादा कुछ नहीं बता सकती थीं, जबकि छह साल की उस अवधि में मासिक निवेश से उनका बेहतर पोर्टफोलियो बन सकता था। पॉलिसी खरीद से उन्हें टैक्स में छूट मिली, पर उसकी वजह से उन्होंने बेहतर रिटर्न के अवसर गंवा दिए।

इस स्तंभ का उद्देश्य है कि आपके साथ ऐसा कुछ न हो।

निवेश पर टैक्स किस प्रकार देय होता है, इसकी चर्चा पूर्व में हम कर चुके हैं। कैपिटल गेन क्या होता है, लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन किस प्रकार काम करते हैं, म्यूचुअल फंड या प्रॉपर्टी बेचने पर कितना टैक्स देना पड़ता है, इन सब बातों की चर्चा हम इस स्तंभ में पहले कर चुके हैं। आज निवेश से होने वाली आय पर टैक्स से इतर पहलू की बात करेंगे। सही निवेश से आय पर लगने वाले टैक्स को बचाने के विकल्पों के बारे में जानना चाहिए।

आयकर अधिनियम के सेक्शन 80सी के अंतर्गत आप प्रत्येक वित्तीय वर्ष में अपनी कमाई में से डेढ़ लाख रुपये तक की आय पर टैक्स से छूट प्राप्त कर सकते हैं, पर शर्त यह है कि उस राशि को आपने कुछ खास जगहों पर निवेश किया हो। यदि आप 20 प्रतिशत देय आयकर श्रेणी में आते हैं तो इससे आप 30 हजार रुपये तक टैक्स बचा सकते हैं, वहीं यदि 30 प्रतिशत आयकर श्रेणी में आते हैं तो करीब 45 हजार रुपये तक की बचत हो जाएगी।

यहां एक बात जानना महत्वपूर्ण है कि ओल्ड इनकम टैक्स रिजीम के तहत ही इनकम टैक्स भरने पर 80सी के तहत छूट पाई जा सकती है। यदि आपने न्यू टैक्स रिजीम का चयन किया है तो आप इस छूट के पात्र नहीं होंगे। इसलिए पहले यह जांचें कि इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने के लिए किस टैक्स रिजीम का चयन किया है, उसके बाद टैक्स से छूट के लिए निवेश को चुनें। यदि आप इसे लेकर सुनिश्चित नहीं हैं तो अपने सीए या कंपनी के पे-रोल डिपार्टमेंट से इस विषय में पूछ सकते हैं।

जो लोग ओल्ड रिजीम के तहत 80सी के अंतर्गत छूट चाहते हैं, वे निवेश के लिए पीपीएफ, ईएलएसएस म्यूचुअल फंड्स, टैक्स सेविंग फिक्स्ड डिपॉजिट्स, एनएससी और ईपीएफ योगदान का चयन कर सकते हैं। यदि आप किसी कंपनी में मासिक सैलरी पर कार्यरत हैं, तो संभवतः नियोक्ता द्वारा 80सी के तहत ईपीएफ कटौती की व्यवस्था होगी, जिसके लिए आपको अलग से कुछ नहीं करना होगा। यह योगदान कितना है, यह अपनी सैलरी स्लिप पर दर्ज विवरण से जाँच सकते हैं। मासिक ईपीएफ कटौती का 12 से गुणा कर दें तो उस वित्तीय वर्ष में जमा कुल राशि सामने आ जाएगी। अब उसे डेढ़ लाख से घटा दें तो पता चल जाएगा कि शेष राशि कितनी बचती है, जिसका अन्यत्र निवेश किया जाना है। बहुत से लोगों को अंदाज़ आएगा कि इस मद में राशि डालने के बाद बहुत ज्यादा निवेश की गुंजाइश ही नहीं बचती है।

इंश्योरेंस प्रीमियम को लेकर भी एक बात की स्पष्टता महत्वपूर्ण है। लाइफ इंश्योरेंस प्रीमियम पर भी 80सी के तहत छूट मिलती है, हालांकि इस स्तंभ में हम हमेशा से कहते आए हैं कि इंश्योरेंस और निवेश को आपस में मिलाना नहीं चाहिए। यदि लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी का एकमात्र उद्देश्य टैक्स बचत है, तो यह गलत निर्णय है। यदि आपको परिवार की सुरक्षा के लिए जरूरत महसूस होती है तो लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदनी चाहिए। इसके बाद यदि 80सी के तहत कोई छूट मिलती है तो यह अच्छी बात होगी।

अब छूट के अन्य विकल्पों की बात करते हैं। यह समझना चाहिए कि उनमें सर्वाधिक उपयुक्त क्या है?

पीपीएफ सबसे सुरक्षित और टैक्स बचत के लिहाज से बेहतरीन विकल्प है। उस पर मिलने वाला ब्याज टैक्स-मुक्त होता है। मैच्योरिटी पर मिलने वाली राशि टैक्स-मुक्त होती है। हालांकि इसका लॉक-इन पीरियड 15 वर्ष का होता है और ब्याज दर का निर्धारण सरकार करती है। बाजार की गति से यहां कोई लाभ नहीं होता।
टैक्स सेविंग फिक्स्ड डिपॉजिट्स में एक निश्चित ब्याज दर पर आपका धन पांच साल के लिए लॉक हो जाता है। यहां ब्याज राशि पर टैक्स देय होता है, जिसकी वजह से वास्तव में हाथ में आने वाली राशि घट जाती है। लॉक-इन पीरियड भी ईएलएसएस के मुकाबले लंबा होता है और संभावित रिटर्न भी कम होता है।

ईएलएसएस का अर्थ है- इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम। इस म्यूचुअल फंड में निवेशित राशि इक्विटी बाजार में लगाई जाती है और उस पर 80सी के अंतर्गत छूट मिलती है। इसमें लॉक-इन पीरियड सबसे कम मात्र तीन साल होता है। जो लोग टैक्स में बचत करना चाहते हैं और इक्विटी बाजार में निवेश की चाह भी रखते हैं, उनके लिए ईएलएसएस दोनों लिहाज से सटीक है।

इक्विटी में निवेश पर मिलने वाला रिटर्न फिक्स्ड रेट वाले विकल्पों की तुलना में काफी अधिक होता है, हालांकि इसके साथ बाजार का जोखिम भी जुड़ा है। ईएलएसएस निवेश लॉक-इन पीरियड के दौरान बाजार के अनुरूप घटता-बढ़ता है। चूंकि इसे तीन साल से पहले बेचा नहीं जा सकता, इसलिए आवेश में बिकवाली से राहत रहती है; फलस्वरूप अधिकांश निवेशकों के लिए बेहतर रिटर्न की संभावनाएं प्रभावित नहीं होतीं। लॉक-इन पीरियड से एक बंधन का अहसास होता है, पर वास्तव में यह इसकी एक विशेषता है।

तीन साल का लॉक-इन पीरियड जब खत्म होता है, तो भी उसे बेचना जरूरी नहीं है। वह धन उसके बाद भी निवेशित रखा जा सकता है, जिससे रिटर्न का क्रम पूर्ववत बना रह सकता है, साथ ही टैक्स बचत का उद्देश्य भी पूरा हो जाएगा। प्रारंभिक तीन साल के बाद कोई नया लॉक-इन पीरियड नहीं होगा। आप उसे कभी भी बेच सकते हैं। उस पर मिलने वाले ब्याज पर इक्विटी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की भांति टैक्स लगेगा- शुरुआती सवा लाख रुपये राशि कर-मुक्त होगी, उसके ऊपर की राशि पर 12.5 प्रतिशत टैक्स देय होगा।

यदि आप मासिक एसआईपी से ईएलएसएस में निवेश करते हैं, तो निवेश तिथि से तीन साल का लॉक-इन पीरियड होगा। अप्रैल में निवेश से तीन साल बाद अप्रैल माह में और मई में प्रथम एसआईपी से तीन साल बाद मई में ही लॉक-इन पीरियड समाप्त होगा। इसी आधार पर उसे रिडीम करने की योजना बनानी चाहिए।

यदि आप ईएलएसएस एसआईपी के माध्यम से साढ़े बारह हजार रुपये मासिक निवेश करते हैं, तो उस वित्तीय वर्ष के अप्रैल-मार्च के दौरान 1.5 लाख रुपये राशि का कुल निवेश होगा और 80सी के अंतर्गत अधिकतम जितनी राशि पर टैक्स से छूट मिलती है, वह निवेशित हो जाएगी। इस प्रकार अंतिम समय पर हड़बड़ी में टैक्स बचत के उत्पादों पर कोई निर्णय नहीं लेना पड़ेगा।

इस हफ्ते अपनी सैलरी स्लिप पर नजर डालें, कुल ईपीएफ कटौती को देखें। उसे डेढ़ लाख से घटाएं। जो घटी राशि दिखेगी, उसे 80सी के अंतर्गत अन्य विकल्पों में निवेश किया जा सकता है। यदि आपने रिटर्न फाइल करने के लिए ओल्ड टैक्स रिजीम का चयन किया है और तीन साल के निवेश को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना चाहते हैं, तो ईएलएसएस एक विचारणीय विकल्प हो सकता है।

80सी के अंतर्गत टैक्स बचत के उत्पादों में निवेश का सबसे अच्छा समय वित्तीय वर्ष का अप्रैल माह होता है, उसके बाद दूसरा उपयुक्त समय वर्तमान है।

टैक्स का मामला नितांत व्यक्तिगत होता है। किसी व्यक्ति के लिए कौन सी चीजें काम करेंगी, यह उसकी आय, टैक्स रिजीम, मौजूदा निवेशों और लक्ष्यों पर निर्भर करता है। इस स्तंभ में हम सिर्फ अवधारणाओं को स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं, जबकि निर्णय आपके होते हैं। आपकी वित्तीय परिस्थितियों को समझने वाले किसी वित्तीय जानकार के मार्गदर्शन में अपनी जरूरत के अनुरूप निर्णय सुनिश्चित करें।

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