भारत देश में कई अलग-अलग तरह की साड़ियां मिलती हैं। इन्हीं में से दो ऐसी साड़ियां हैं जिनका काफी नाम सुनने को मिलता है, हम बात कर रहे हैं पटोला और इकत साड़ियों की। जब भी किसी शाही शादी, बड़े उत्सव या सेलिब्रिटी लुक की बात आती है, तो पटोला और इकत साड़ियों का नाम सबसे पहले आता है। इन साड़ियों की सबसे बड़ी पहचान है इनका चमकदार कपड़ा और दोनों तरफ एक जैसे दिखने वाले डिजाइन और रंग।

जब बाजार में इनकी कीमत की बारी आती है, तो असली पटोला या डबल इकत साड़ी की शुरुआती कीमत ही हजारों से शुरू होकर लाखों रुपये तक जाती है। जी हां, आपने सही सुना है, ये दोनों साड़ियां सबसे महंगी साड़ियों में से एक मानी जाती हैं। अक्सर लोग यह सोचकर हैरान हो जाते हैं कि बिना किसी सोने-चांदी के तारों के भी यह साड़ी इतनी महंगी क्यों होती है? आइए जानते हैं इसके पीछे की मुख्य वजह।

इकत साड़ियों को बनाने की खास तकनीक

साधारण साड़ियों में कपड़े पर प्रिंटिंग या एम्ब्रॉयडरी की जाती है, लेकिन इकत और पटोला साड़ियों को पूरी तरह अलग तरीके से बनाया जाता है -

  • इकत साड़ी में बुनाई से पहले धागों को बांधकर रंगा जाता है। जिस हिस्से पर रंग नहीं चढ़ाना होता, वहां धागे को कॉटन या प्लास्टिक की डोरी से कसकर बांध दिया जाता है। इसके बाद रंगों में डुबोने की यह प्रक्रिया एक के बाद एक कई बार दोहराई जाती है।
  • सिंगल इकत में केवल लंबाई वाले धागे या सिर्फ चौड़ाई वाले धागे में से किसी एक धागे को डिजाइन के हिसाब से रंगा जाता है।
  • यह दुनिया की सबसे मुश्किल बुनाई तकनीकों में से एक मानी जाती है। इसमें ताने और बाने दोनों ही रंगे हुए धागों का इस्तेमाल होता है। बुनाई के दौरान जब ये दोनों रंगे हुए धागे आपस में मिलते हैं, तब जाकर यह खास कपड़ा तैयार होता है।
  • डबल इकत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस साड़ी का उल्टा या सीधा हिस्सा नहीं होता। यह दोनों तरफ से बिल्कुल एक जैसी दिखाई देती है। 

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इकत और पटोला साड़ी के बीच का अंतर

अंतर का आधार इकत साड़ी (Ikat Saree) पटोला साड़ी (Patola Saree)
उत्पत्ति (कहां की है) यह मुख्य रूप से ओडिशा (पोचमपल्ली,तेलंगाना में भी) से जुड़ी है। यह गुजरात की विश्व प्रसिद्ध पारंपरिक साड़ी है।
डाई करने की तकनीक इसमें आमतौर पर सिंगल इकत तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल होता है। यह डबल इकत तकनीक से बनती है, जो बेहद जटिल होती है।
डिजाइन और फिनिशिंग इसके पैटर्न के किनारे थोड़े धुंधले या हैजी नजर आते हैं। इसके डिजाइन के किनारे बहुत ही शार्प, सटीक और स्पष्ट होते हैं।
दोनों तरफ पहनने योग्य इसे आमतौर पर एक ही तरफ से सही माना जाता है। यह दोनों तरफ से एक जैसी दिखती है और इसे दोनों तरफ से पहना जा सकता है।
कीमत यह पटोला के मुकाबले किफायती और बजट-फ्रेंडली (₹2,000 से ₹15,000 और ज्यादा) होती है। यह बहुत महंगी और रॉयल (₹50,000 से कई लाख रुपये तक) होती है।

आखिर क्यों पटोला और इकत साड़ियां इतनी महंगी होती हैं?

गुजरात के पाटन में बनने वाली असली पाटन पटोला, तेलंगाना की पोचमपल्ली और ओडिशा की संबलपुरी इकत साड़ियां बाजार में बहुत ज्यादा कीमत रखती हैं। इनके महंगे होने के पीछे ये खास कारण हैं -

  • एक साधारण मशीन से तैयार होने वाली साड़ी कुछ ही घंटों में बनकर तैयार हो जाती है, लेकिन पटोला और इकत साड़ियों को हाथ से बनाने में कम से कम 4 महीने से लेकर 1 साल तक का समय लग जाता है।
  • इस बुनाई में धागे की जरा सी भी चूक या गलती पूरे डिजाइन को खराब कर सकती है। यही वजह है कि इसे बुनते वक्त एक-एक धागे को आपस में मिलाना बहुत ही सावधानी का काम होता है।
  • इनमें इस्तेमाल होने वाला सिल्क और रंग बहुत ही उच्च गुणवत्ता का होता है, जो सालों-साल खराब नहीं होता। 

निष्कर्ष: असली पटोला और इकत साड़ियां सिर्फ 6 गज का कपड़ा नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय कारीगरों की लगन और मेहनत से बनाई गई एक नायाब कलाकृति हैं। ये किसी मशीन से नहीं बल्कि एक-एक धागे को जोड़कर बनने वाली साड़ियां होती हैं। यही वजह है कि इनकी कीमत बाकी साधारण साड़ियों के मुकाबले थोड़ी महंगी होती है, लेकिन इनका रॉयल लुक और टिकाऊपन इसे हर महिला के लिए बेहद खास बना देता है। यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहे हर जिंदगी से। 

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